वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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एतस्मादयमर्थो बोद्धव्य इतीश्वरेच्छात्वात् ।
प्रतिपदमर्थविशेषाज्ञाने ऽप्यास्तामखण्डवाक्यस्य ॥ १५१ ॥
अर्थो ऽप्यखण्डरूपो विशिष्टमतिरिक्तमिति हि सिद्धान्तः ।
आसेचनकव्याप्त्यादिपदवदास्तां पदत्वमपि ॥ १५२ ॥
(मन्त्र के अर्थ के निर्णय के विषय में भगवान् शिव के वचनों की
निर्णायक भूमिका का प्रतिपादन)
(शक्ति-भक्ति-व्यक्ति से) भिन्न कोई अन्य विलक्षण प्रक्रियाशालिनी वृत्ति
मान ली जाय (किन्तु) मन्त्र के किसी ऐसे अर्थ का ग्रहण भगवान् शिव के
वचनानुसार ही (मान्य) होगा या तो इस शक्ति (अभिधा शक्ति) को ही गृहीत किया
जाय ॥ १५० ॥
(शब्द के अर्थग्रह में ईश्वरेच्छा की भूमिका)
अमुक-अमुक शब्द से अमुक-अमुक अर्थ (ही) बोधित हो—यह (मात्र) ईश्वर
की इच्छा के कारण (ही होता है।) प्रत्येक पद का विशेषार्थ न भी परिज्ञात हो तो
क्या अन्तर पड़ता है यदि समस्त वाक्य का समस्त भाव (हस्तामलकवत) परिज्ञात
हो जाय तो ॥ १५१ ॥
(वर्ण एवं उनके अर्थ का अन्तर्संबंध)
(इस संदर्भ में) प्रस्थापित सिद्धान्त यही है कि अखण्डरूप अर्थ वर्णों से
नितान्त भिन्न है । यदि आवश्यक हो तो समस्त मंत्र को एक इकाई के रूप में
गृहीत कर लिया जाय तथा 'आसेचनक' 'व्याप्ति' आदि पदों (के संबंध) में (किया
जाता है ।) ॥ १५२ ॥
- प्रकाश *
अन्या शक्तिभक्तिव्यक्तिभ्यो विलक्षणा शक्त्यादित्रितयप्रक्रियातो विलक्षण-
प्रक्रियाशालिनी । उच्छृङ्खलस्य पन्थानं परित्यज्याह—यद्वेति । शिवनैवास्यायमर्थ इति
स्पष्टमुक्तत्वादिति भावः ॥ १५० ॥
इदं पदमिममर्थं बोधयत्वितीच्छायामर्थबोधजनकत्वनिष्ठप्रकारतानिरूपितविशेष्य-
ताशालित्वेन पदस्यापि विषयत्वात् प्रकृते प्रतिपदमर्थानुक्तेः कथं शक्तिरिति चेन्न; इदं
वाक्यमिममखण्डार्थं बोधयत्वित्याकारिकाया एवेच्छायाः कल्पनात् । वाक्यस्याखण्डत्वं
वैयाकरणानामिष्टमेव । अर्थस्याखण्डत्वम् 'प्रकृष्टप्रकाशश्चन्द्रः' इत्यादिवाक्यार्थं वर्णय-
तामौपनिषदानामिष्टमेव । तच्च विचार्यमाणे विशिष्टस्यातिरिक्तत्व एव पर्यवस्यति । तथा
च यत्र प्रतिपदमर्थविवेकस्तत्रेयं रीतिः; यत्र यत्र न स तत्र संपूर्णस्यैकपदत्वमेवास्तु । न
चैकस्य पदस्य विशिष्टबह्वर्थवाचकत्वमदृष्टमिति वाच्यम्, घटत्वघटसमवायानां घटपद-
वाच्यत्वात्, 'तदासेचनकं तृप्तेर्नास्त्यन्तो यस्य दर्शनात्' इति कोशात्, हेतुसमानाधि-
करणात्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यसामानाधिकरण्यस्य व्याप्तिपदार्थत्वाच्चेत्याह—