वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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द्वितीयोंऽशः ३८३
आसेचनकेति । आदिनोपाधिपरिग्रहः । तेनेश्वरेच्छायां पदस्यैव विशेष्यत्वे ऽपि न
प्रकृतनिर्वाहाय विलक्षणेच्छाकल्पनापत्तिः ॥ १५१-१५२ ॥
- सरोजिनी *
ग्रन्थकार का कथन है कि अर्थ-ग्रहण का नियमन भगवान् शिव ने किया है
अतः उनके नियमों को आधार मान कर ही किसी भी शब्द से उसका अर्थ-ग्रहण
प्रामाणिक होगा अन्यथा नहीं ।
वैयाकरण वाक्य के अखण्डत्व को तो मानते ही हैं । अर्थ का भी
अखण्डत्व भी मान्य है । 'प्रकृष्टप्रकाशश्चन्द्रः'—इत्यादि वाक्य के अर्थ को वर्णित
करने में उपनिषदों में भी अर्थ के अखण्डत्व की पुष्टि की गई है ॥ १५० ॥
प्रत्येक शब्द के अर्थ का निर्धारण या प्रत्येक शब्द से किसी अर्थ विशेष का
ग्रहण ईश्वरेच्छा के कारण ही हुआ करता है—मानवीय इच्छा या प्रयास से नहीं ।
शब्द का विशेष अपरिज्ञात भी हो तथापि कोई व्यवधान उपस्थित नहीं होता किन्तु
वाक्य का भाव अवश्य ज्ञात होना चाहिए ॥ १५१ ॥
वैयाकरण लोग वाक्यों के अखण्डत्व की बात तो स्वीकार ही करते है—
'वाक्यस्याखण्डत्वं वैयाकरणानामिष्टमेव ॥'१ इसी प्रकार अर्थ के अखण्डत्व को भी
स्वीकार करना चाहिए ॥
'प्रकृष्ट प्रकाशश्चन्द्रः' इत्यादि वाक्यार्थ की व्याख्या करते हुए उपनिषदों में अर्थ
के अखण्डत्व का भी प्रतिपादन (व्याख्याकारों द्वारा) किया ही गया है । जहाँ एक
एक पद के अर्थ की विवक्षा अपरिहार्य हो वहाँ तो उसका उसी प्रकार खण्डित
अर्थ ग्रहण करना चाहिए किन्तु जहाँ यह अनिवार्य न हो वहाँ शब्द-समुदाय या
वाक्य का अखण्ड अर्थ ग्रहण करना समीचीन ही है ॥ १५२ ॥२
नन्वस्य पदत्वे ऽनेकार्थत्वं दोष इत्यत आह—
एकस्यानेकार्था दृष्टा हरिसैन्धवादिषु पदेषु ।
अन्यतमैकावगतौ प्रकरणातात्पर्ययोर्विशेषकता ॥ १५३ ॥
प्रकृते तु सर्वबोधस्येष्टत्वान्नो विशेषाकाङ्क्षा ।
अथ वा सकलार्थेष्वपि शक्त्यैक्यं पुष्पवन्तपदवदिह ॥ १५४ ॥
(अनेकार्थी शब्दों से विशेषार्थ-ग्रहण के कारक तत्त्व)
'हरि' 'सैन्धव' आदि शब्दों में एक शब्द के अनेक अर्थ देखे जाते हैं । (इन
विभिन्न अर्थों में से) एक अर्थ को ग्रहण करने में प्रकरण एवं तात्पर्य (एक निश्चित
अर्थ मात्र को ही ग्रहण करने के) निश्चायक चिन्ह हैं ॥ १५३ ॥
१-२. भास्करराय—'प्रकाश'