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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 530 में से

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पृष्ठ 495

द्वितीयोंऽशः ३९३
कार्य-पद्धति को उपलब्ध करना ही उस साधन-पद्धति का 'देवता तत्त्व'
है। उसके बाद उस जाग्रत शक्ति को उद्देश्य साधन में नियुक्त करके
उद्देश्य को सफल करना 'विनियोग तत्त्व' है। ये ही हैं पूजा के प्रारंभिक
मूल तत्त्व ।३ 'कामधेनुतंत्र' में नौ तत्त्वों का विधान किया है जिसमें देवता
तत्त्व भी अंतर्भुक्त है—'देवतत्त्वं प्राणतत्त्वं बिन्दुतत्त्वं च सुन्दरि । ज्ञान तत्त्वं
शक्तित्त्वं योनितत्त्वं तथैव च ।।'५
५. बीजतत्त्व—बीज से ही देवता का आविर्भाव या जन्म होता है—देवतायाः
शरीरं तु बीजादुत्पद्यते ध्रुवम् ।।'६
६. ध्यान—ध्यान से ही सिद्धि होती है—ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं
समुपस्थितम् । तदेव परमेशानि ! मंत्रार्थं विद्धि पार्वति ।।७ 'ध्यान' है
अभीष्टदेव का एकनिष्ठ, संयमप्राणित अनुचिन्तन—"यावदिन्द्रियसन्तापमनसा
संनियम्य च । स्वातेनाभीष्टदेवस्य चिन्तनं ध्यानमुच्यते ।।''८
७. 'शक्ति'—शतकोटिमहादिव्य योगिनी प्रतिकारणात् । तीव्रस्फूर्ति प्रदानाच्च
शक्तिरित्यभिधीयते ।।९
८. 'न्यास'—न्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषु विनिवेशनात् । सर्वरक्षा कराद्देवि! 'न्यास'
इत्यभिधीयते ।। 'न्यास' समस्त प्रकार की रक्षा करने की एक आध्यात्मिक
पद्धति है जिसमें कि मंत्र के प्रत्येक अक्षर को उपासक के प्रत्येक अङ्ग में
सथापित किया जाता है ।
'नि' पूर्वक 'अस्' धातु से न्यास शब्द साधित होता है ।
'अस्क्षेपणे स्थापने च', धातु से न्यास शब्द निर्मित होता है । अस्
धातु = क्षेपण करना एवं स्थापन करना । जिसका जो स्थान नहीं है यदि
वह बलपूर्वक वहाँ बैठ जाय तो उसको उस स्थान से हटाकर वहाँ के
प्रकृत स्वामी को बैठाने का नाम है—'न्यास' ।। 'स्वर्गात् निराकृता देवा
इन्द्रोऽभूत् महिषासुरः ।' (इन्द्र को स्वर्ग से निकाल कर महिषासुर स्वयं
इन्द्र बन गया) इसी प्रकार हमारी देह एवं इसके प्रत्येक अवयव एवं
सृजनतत्त्व हमारे नहीं भगवान् के हैं क्योंकि इनके स्वामी वही हैं हम
नहीं । मानव इन्हें 'मेरा' अपना, कहकर, मिथ्या कर्तृत्व का आवरण
डालकर उनसे अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है जिससे कि बंधन में
पड़ जाता है । 'अङ्गन्यास' इस अज्ञानात्मक बंधन को दूर करके शरीर के
प्रत्येक अङ्ग में विभिन्न देवों, भगवत्शक्तियों एवं मंत्राक्षरों की स्थापना करने
का विधान है । यथा—१. करन्यास—ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं
३. पूजा के त्रिविध रूप हैं—(क) नित्य, (ख) नैमित्तिक, (ग) काम्य-'नित्यं
नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं पूजनं स्मृतम् ।। (शा० त०)
४-५. कामधेनु तन्त्र ६. यामल
७. भूतशुद्धि तन्त्र ८-९. कुलार्णव तन्त्र