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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 530 में से

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पृष्ठ 489

द्वितीयोऽंशः ३८७
सिद्धे प्रमाणदार्ढ्य इत्यत्र दृष्टान्तमाह—
यागस्य स्वर्गं प्रति संसिद्धे हेतुहेतुमद्भावे ।
तदनुपपत्तिं निरसितुमलौकिकापूर्वमपि कॢप्तम् ॥ १५८ ॥
(अलौकिक अपूर्व प्रयोजन)
स्वर्ग-प्राप्ति के लिए यज्ञ के कारण-कार्यभाव के स्वसिद्ध (प्रमाणित) होने पर
भी उसकी अनुपपत्ति (प्रमाणाभाव) के दूरीकरण के लिए अलौकिक 'अपूर्व' की भी
रचना की गई ॥ १५८ ॥

  • प्रकाश *
    'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत' इत्यत्र तृतीयाश्रुत्या यागस्य जनकत्वे काम्यमान-
    तया स्वर्गस्य जन्यत्वे च बोधिते ऽपि भिन्नकालीनयोस्तदयोगाद्देवताप्रसाद्यागध्वंसादिना
    ऽत्र निर्वाहाभावादपूर्वेणैवानुपपत्तिनिरास इत्यादि तन्त्रान्तरेषु विस्तरः ॥ १५८ ॥
  • सरोजिनी *
    'याग' = यज्ञ ॥ 'यज्ञः सवोऽध्वरो यागः सप्ततन्तुर्मखः क्रतुः ॥'१ 'यज्ञः
    स्यादात्मनि मखे नारायणहुताशयोः ॥'२
    'सवो यज्ञे च संधाने ।'३ 'ऋतुर्यज्ञे गुणौ पुंसि' = याग (यज्ञ) ऋतु ॥४ 'यज
    देवपूजादौ' (भ्वा० ३० अ०) धातु से निष्पन्न ॥ 'स्वर्गे' = स्वरव्ययं स्वर्ग नाक
    त्रिदिवत्रिदशालयाः । सुरलोकोद्यो दिवौ द्वे स्त्रियां क्लीबे त्रिविष्टपम् ॥'५ स्वर्यतेस्तूयते
    इति स्वः । 'स्वः प्रेत्य व्योम्नि नाके च' ।
    “ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत्” स्वर्ग की आकांक्षा रखने वालों को
    ज्योतिष्टोम यज्ञ करना चाहिए । अतः योग के द्वारा स्वर्ग मिलना तो स्वतः सिद्ध है
    किन्तु देवतादिक के अप्रसन्न होने पर स्वर्ग का मिलना संभव भी नहीं रह जाता ।
    इसका कारण है—'अपूर्व' ॥६
    'कॢप्त' = कॄप् + क्त, लत्व । रचित, निर्मित, सजा हुआ, टुकड़े किया
    हुआ, उत्पन्न किया हुआ, स्थिर किया हुआ, आविष्कृत । 'कॢप्ति = पूर्णता,
    साकल्य, आविष्कार, सुव्यवस्था ।
    अस्मिन् प्रकरणे पूर्व वर्णितान् पञ्चदशार्थान् संगृह्यानुवदति—
    विद्यावर्णैयत्तोद्धारः कालस्तदुच्चारः ।
    उत्पत्तिस्थानं तद्यत्नो रूपं स्थितिस्थानम् ॥ १५९ ॥
    १. अमरकोष २. हैमकोष
    ३-४. मेदिनीकोष ५. अमरकोष
    ६. भास्करराय—'प्रकाश'