वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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द्वितीयोऽंशः ३८१
- सरोजिनी *
'शक्त्यालक्षणाया' = लक्षणा शब्द शक्ति के द्वारा । शब्दों से अर्थावगाहन
कराने वाली शक्तियों को साहित्य में 'शब्द-शक्ति' कहते हैं । ये तीन प्रकार की
हैं— १. अभिधा शक्ति = अभिधेयार्थ, सङ्केतितार्थ, शक्यार्थ
२. लक्षणा शक्ति = लक्ष्यार्थ
३. व्यञ्जना शक्ति = व्यंग्यार्थ
'लक्षणा' के निम्न भेद हैं—
१. जहल्लक्षणा ॥ २. अजहल्लक्षणा ॥ ३. जहज्जहल्लक्षणा ॥
किसी भी पद का अभिधा शक्ति से अर्थावगाहन हो पाना संभव न होने पर
वहाँ लक्षणा शक्ति का प्रयोग किया जाता है ।
ये पुनरिह भावार्थादयः षडर्था मनोरुक्ताः ।
तेषु यदि शक्तिभक्ती न हि संभवतस्तदापि का हानिः ॥ १४९ ॥
(भावार्थादिक अर्थ-प्रकारों का महत्व)
जो यहाँ पुनः मंत्र के भावार्थ आदि छः अर्थ कहे गए हैं यदि उनमें
शक्ति-भक्ति (अभिधेयार्थ-लक्ष्यार्थ) (का ग्रहण) संभव न भी हो तथापि क्या हानि
है? ॥ १४९ ॥ - प्रकाश *
शक्तिग्राहकव्याकरणाद्यभावान्न शक्तिः; अत एव च न शक्यसंबन्धरूपा
भक्तिरपि । व्यक्तिरूपा तृतीया वृत्तिर्भविष्यति,
'वक्तृबोद्धव्यकाकूनामन्यसंनिधिवाच्ययोः ।
प्रस्तावदेशकालादेवैशिष्ट्यात् प्रतिभाजुषाम्' ॥
इत्यत्रादिपदेनोपासनापि ग्रहीष्यत इत्याशयेन समाधत्ते—का हानिरिति ॥ १४९ ॥ - सरोजिनी *
ग्रन्थकार का कथन है कि यदि भावार्थ प्रभृति जो छः अर्थ बताए गए हैं
यदि अभिधा एवं लक्षणा शब्द शक्तियों द्वारा उनका अर्थ-साङ्गत्य सिद्ध न भी
हो सके तथापि किसी असङ्गति अनौचित्य एवं अप्रामाणिकता की दोषापत्ति नहीं
आएगी ॥ १४८ ॥
व्यञ्जनाया बहुभिरनङ्गीकारादाह—
आस्तामन्या वृत्तिर्विलक्षणा तद्ग्रहस्तु मनोः ।
शिववचनेन भविष्यति यद्वैषा शक्तिरेवास्तु ॥ १५० ॥