वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽंशः ३९५
श्रीविद्या के अङ्ग
बाह्य अङ्ग आन्तरिक अङ्ग
ऋषि छन्द देवता विनियोग बीज शक्ति कीलक न्यास ध्यान नियम पूजा
विद्या के विद्या का काल उच्चारण स्थान प्रयत्न रूप विभिन्न आकार
वर्णों की उद्धार (मात्रा) स्थितियाँ
संख्या
ऋषयश्च्छन्दो दैवतविनियोगा बीजशक्तिकीलािन ।। १६० ।।
न्यासा ध्यानं नियमाः पूजादीनि बहिरङ्गानि ।
बाह्यान्यङ्गानि पुनः प्रायो लोके प्रसिद्ध कल्पानि ।। १६१ ।।
'ऋषि' = हयग्रीव आदि ऋषि ।। 'छन्द' = पंक्ति आदि ।। 'दैवत' =
त्रिपुरसुन्दरी । 'विनियोग' = इष्टार्थजनन् । 'बीज' = वाग्भवादिक ।। 'शक्ति' परा
आदि ।। 'कीलक' = कामराज आदि ।। 'न्यास' = ऋष्यादिन्यास जाल ।।
'ध्यान' = 'अरुणां करुणातरंगिताक्षीम्' आदि ।। 'नियम' = पुण्ड्रेक्षु दण्डभक्षणवर्जन
सङ्कल्पादिक ।। 'पूजा' = पात्र, आसान आदि शान्ति स्तव, नित्य कर्म ; परा
पूजा । केवल पूजा । 'आदि' = होम-तर्पण-परिग्रह ।। 'अन्तर्मुख' = अनासक्त चित्त
वाले लोग ।।
'विद्या के वर्ण'—
(क) 'वाग्भवकूट'—अ + क, ए, ई, अ + ल = (६)
(ख) 'कामराजकूट'—ह + अ, स + अ, क + उ, ह + अ, ल + अ =(१०)
(ग) 'शक्तिकूट'—स + अ, क + अ, ल + अ = (६)
| वर्णों की संख्या | वर्ण | ह्रीं | योग | |||
|---|---|---|---|---|---|---|
| १. 'वाग्भवकूट' के वर्ण | ६ | + | १२ | = | १८ | 'ह्रीं' (लज्जा बीज) तीनों कूटों के अन्त में है अतः उसके १२ अवयव सभी कूटो में जोड़े जायेंगे । |
| २. 'कामराजकूट' के वर्ण | १० | + | १२ | = | २२ | |
| ३. 'शक्तिकूट' के वर्ण | ६ | + | १२ | = | १८ |