वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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महावाक्य तो—'अहंब्रह्मास्मि' 'अयमात्माब्रह्म' 'प्रज्ञानंब्रह्म' 'तत्त्वमसि'
'सोऽयमात्मा' आदि आप्त वाक्य हैं ।
एकस्यानेकार्थे विनियोगादर्थ बाहुल्यम् ।
वेदे बहुशः स्वीकृतमत्र त्वेकत्र विनियोगात् ॥ १५६ ॥
अखिलार्थबोधनियमो नियमादृष्टं प्रकल्पयति ।
सिद्धे प्रमाणदार्थ्ये सकलं कल्प्यं हि तदविरोधाय ॥ १५७ ॥
(मन्त्र-विनियोग की दो दिशाएँ)
वेद में इस तथ्य को अनेक प्रकार से स्वीकार किया गया है कि एक मंत्र
का अनेक प्रसङ्गों में विनियोग करने पर उसके अनेक अर्थ हो जाते हैं किन्तु इस
प्रसङ्ग में जहाँ कि मंत्र का विनियोग केवल एक संदर्भ में होता है—उस विनियोग
से ॥ १५६ ॥
('निगमन' के प्रमाणार्थ मुख्योपाय)
समस्त अर्थों को बोधित करने का नियम नियमादृष्ट की रचना करता है ।
(एक बार किसी भी कथन के) सिद्ध या प्रस्थापित हो जाने के बाद उसके प्रमाण्य
की दृढ़ता के लिए शेष सभी (तर्क या प्रमाण) उसके अनुकूल स्वीकृत (अङ्गीकृत)
किये जाने चाहिए ॥ १५७ ॥
* प्रकाश *
पदपक्षे ऽनेकार्थतादोषपरिहारवद्वाक्यपक्षे ऽपि संभवति, पुरुषसूक्तस्य
तद्देवतापूजायां विनियोगेनानेकार्थत्वस्येष्टत्वात् । इयांस्तु विशेषः—तत्तत्पूजायां
तस्य तस्यैवार्थस्य स्मरणं पुरुषसूक्ते; प्रकृते तु सर्वेषामर्थानां स्मरणेनैवादृष्टोत्पत्तिरिति
भावः ॥ १५६-१५७ ॥
* सरोजिनी *
वेदों में विनियोगों के वैविध्य से मंत्रों के अर्थों में भी वैविध्य पाया जाता है ।
प्रस्तुत प्रसङ्ग में एक ही प्रसङ्ग में प्रयुक्त मंत्र के भी अनेक अर्थ होते हैं । इसका
नियमन नियमादृष्ट द्वारा हुआ करता है । ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में पृथक्-पृथक्
देवताओं के विनियोग-वैविध्य के कारण उन सभी मंत्रों के पृथक्-पृथक् अर्थ ग्रहण
किये गए हैं । पुरुषसूक्त में उन-उन देवताओं की पूजा में उन-उन अर्थों का ग्रहण
किया जाता है । प्रकृत प्रसङ्ग में समस्त अर्थों के स्मरण से ही अदृष्टोत्पत्ति हो
जाती है । समस्त संभाव्य अर्थों को बोधित करने का नियम नियमादृष्ट आविर्भूत
करता है ।
प्रस्थापित नियम सिद्धान्त की पुष्टि का आधार बनता है और निगमन को पुष्ट
करता है ।