वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
द्वितीयोंऽशः ३२१
सहस्रार में शिव 'शून्य' रूप एवं कोटि विद्युतसमा कुण्डलिनी इन्दुरूपा है और
'परमकुण्डली' कही जाती है ।१
यह नादरूपा, योनिरूपा एवं सनातनी शक्ति है ।२ यह हुङ्कार शब्द से उत्पन्न
होती है ।३ 'परदेवता', 'कुण्डली', 'महादेवी' के नाम वाली यह 'रूपवती' देवी
अपने मुखारविन्द के परिमल से शिव को प्रसन्न कर देती है एवं शिव के ऊपर
निवास करती हुई क्षणभर के लिए उन्हीं सदाशिव के साथ रमण करती है जिससे
कि उसी क्षण लाखारस के समान रङ्ग वाला अमृत क्षरित होता है । वह शिव के
ऊपर लेटकर उनके मुख का चुम्बन भी लेती है । जो लाखारस क्षरित होता है
उसी अमृत से परदेवता एक षट्चक्रों के देवों को सन्तृप्त करना चाहिए । पिण्ड
ही कुण्डलिनी है । स्वयंभूलिङ्ग के साथ रमण करने वाली इस कुल शक्ति को
मूलाधार से सहस्रार में लाना चाहिए और वहाँ उसे शंभु के साथ एकीकृत
(अभिन्न) रूप में देखकर एवं पीनोन्नत पयोधरा, षोडशवर्षीया, नवयुवती,
सर्वाभरणभूषिता, पूर्णचन्द्रनिभा, नानारत्नयुता, नूपुर शोभिता, कन्दर्पकोटिलावण्या,
रक्तकङ्कणमण्डिता, किंकिणी-शोभिता, मधुर-हासिनी कामिनी के रूप में कल्पित
करना चाहिए ।४
स्वायंभुवलिङ्ग के मध्य में अग्निरूप महान तेज स्थित है । वायुयोग के संपर्क
से यही अग्नि ब्रह्माण्ड में प्रज्वलित होती है । इसलिए वह कुण्डलिनी देवी इस
छिद्र को संछादित करके स्थित है—'लिङ्गच्छिद्रं समाकृष्य संस्थिता कुण्डली कथं?
(तोडल०) 'पृथ्वीचक्रस्य मध्ये तु स्वयंभूलिङ्गमद्भुतं । सार्द्धत्रिवलयाकार कुण्डल्या
वेष्टितं सदा । लिङ्गच्छिद्रं स्ववक्त्रेण कुण्डल्याच्छाद्य संस्थिता ।।' (तो० तं०) शक्ति
के पाँच रूप हैं—१. निजा २. परा ३. अपरा ४. सूक्ष्मा ५. कुण्डली । 'निजा
पराऽपरा सूक्ष्मा कुण्डलीतासु पंचधाशक्तिचक्रक्रमेणैव जातः पिण्डः परः शिवे ।।
(सि०सि०सं०) कुण्डलिनी 'प्रकृति' है—'प्रकृतिः कुण्डलिनीनित्यालिङ्गमाश्रिता
संस्थिता' कुण्डलिनी 'चित्कला' है—'तमो रजस्सत्त्वसाम्यावस्थेयं चित्कलास्मृता' ।
कुण्डलिनी की तीन अवस्थायें हैं—१. 'कुमारी' २. 'योषित' ३. 'पतिव्रता' ।।
'द्वादश-षोडश-दशाभिस्तपन-शशि-दहन कलाभिः'
सूर्य की बारह, चन्द्रमा की सोलह एवं अग्नि की दस कलाओं द्वारा ।। सूर्य
१. कुब्जिका तन्त्र—'शून्य रूपं शिवं साक्षादिन्दुं परम कुण्डलीम् ।'
२. यामल—'नादरूपेण सा देवी योनिरूपा सनातनी ।'
३. गंधर्वमालिका—'हुंकार वर्ण संभूता कुण्डली परदेवता ।'
४. शाक्तानन्द तरंगिणी—"ध्यायेत कुण्डलिनी तत्र इष्टदेवस्वरूपिणीम् । सदा
षोडशवर्षीयां पीनोन्नतपयोधराम् । नवयौवन सम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् । मुखारबिन्दगन्धेन
मोदितं परमं शिवम् । प्रबोध्य परमेशानि पत्रोपरि वसेत् प्रिये ।। शिवस्य मुखपद्म पद्मं हि
चुचुम्बे कुण्डली शिवे । अमृतं जायते देवि तत्क्षणात् परमेश्वरि ।। तद्भवमृतं देवि !
लाखारसमोपमम् ।।"
२१ वरि.
३२२ वरिवस्यारहस्ये
की 'तापिनी' आदि, चन्द्रमा की 'अमृता' आदि एवं अग्नि की 'धूम्रार्चिरादि' कलायें
हैं ।
१. सूर्य की १२ कलाओं का ककारादि १२ अक्षरों से सम्बंध है ।
२. चन्द्र की १६ कलाओं का १६ स्वरों से सम्बंध है ।
३. अग्नि की १० कलाओं का यकारादि १० वर्णों से सम्बंध है ।
'कुण्डलिनी' 'पंचाशद्भिर्वर्णैरभिन्न देहा' इसलिए कही गई है क्योंकि वह
मातृकारूपिणी है ।
मंत्र के ३ खण्ड हैं—
१. 'सूर्यखण्ड'— क से म पर्यन्त वर्णों का द्योतक है ।
२. 'सोमखण्ड'— समस्त स्वरों का द्योतक है ।
३. अग्निखण्ड'— मंत्र का अग्नि खण्ड—य, र, ल, व, श, ष, स,
का द्योतक है ।
४. 'बैन्दवखण्ड'— मंत्र का बैन्दवखण्ड—यह 'क्ष' का द्योतक है । इस
प्रकार समस्त मातृकाएँ पंचदशी मंत्र के एवं
कुण्डलिनी के रूप हैं ।
भगवती का त्रिखण्डात्मक रूप
| खण्ड | मंत्र का भाग | यंत्र का भाग | छःकमल | कुण्डलिनी |
|---|---|---|---|---|
| सोम | शक्तिकूट | शिव के<br>चार चक्र | आज्ञा तथा<br>विशुद्ध | सोमकुण्डलिनी |
| सूर्य | कामकूट | चतुर्दशार तथा<br>बहिर्दशार | हृदय एवं<br>मणिपूर | सूर्यकुण्डलिनी |
| अग्नि | वाग्भवकूट | अन्तर्दशार,<br>अष्टार एवं बिन्दु<br>सहित त्रिकोण | स्वाधिष्ठान<br>एवं मूलाधार | अग्निकुण्डलिनी |
| १. वाग्भवकूट | आग्नेय खण्ड | भगवती का मुख । |
|---|---|---|
| २. कामकूट | सौर खण्ड | भगवती का कण्ठ से कटिपर्यन्त देह । |
| ३. शक्तिकूट | चान्द्र खण्ड | भगवती का कटि से नीचे का देह । |
'अभिन्नवर्णैरभिन्नदेहा'—कुण्डलिनी देवी वर्णात्मिका है—
१. सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः । (शारदातिलक)
द्वितीयोंऽशः ३२३
२. क्रमेणानेन सृजति कुण्डलिनी वर्णमालिकाम् । (शा०ति०)
अकारादि सकारान्तां द्वि चत्वारिंशदात्मिकाम् ॥ ११० ॥१
पंचाशद्वार गुणितां पंचाशद्वर्ण मालिकाम् ।
सूतेऽतद्वर्णताऽभिन्ना कला रुद्रादिकान् क्रमात् ॥ (शा०ति०)
२. 'कुलीन कुण्डलिनी' = पृथ्वीतत्व में लयीभूत कुण्डलिनी । कु = पृथ्वी
तत्त्व में । 'लीन' = लयीभूत ॥ भूतत्वस्थिता कुण्डलिनी ।
३. 'प्रवाहयन्ती सुधापूरम्'—अमृतप्रवाह को प्रवाहित करने वाली 'नित्यानन्द-
परम्परातिविगलत्पीयूषधाराधरा ॥ (ष०च०नि०)
४. 'तपन शशि दहन कलाभिः'—सूर्य-चन्द्र-अग्नि की कलाओं से ।
कुण्डलिनी सूर्यचन्द्राग्निरूपा है—'गुणयुक्ता कुण्डलिनी चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी ॥"
(मातृकाभेद तंत्र)
कुण्डलिनी वाणी की देवी है—'वाग्देवी बीजसंज्ञका' (शिव संहिता)
'बिसतन्वी तडिदाभा'—कमल नाल के तन्तु के समान सूक्ष्म एवं विद्युत के
समान प्रकाश वाली—'तस्योर्ध्वे बिसतन्तु सोदर लसत् सूक्ष्मा जगन्मोहिनी' 'नवीन
चपलामालाविलासास्पदा ।।' (षट्चक्र निरूपण)
'कुलीन कुण्डलिनी'—'क' पृथ्वी तत्त्व । 'कु' = पृथ्वी तत्त्व में अर्थात्
पृथिवीतत्त्व प्रधान चक्र 'मूलाधारचक्र' में लयीभूत कुण्डलिनी शक्ति ।। कुण्डलिनी
जगत् की योनि है, वह तुटिस्वरूपा एवं सर्वप्राणप्रेरिका, जीवभूता । बीजमयी एवं
चिद्रूपिणी है—'या सा कुण्डलिनी सात्र जगद्योनिः प्रकीर्तिता । तुटिरूपा तु सा ज्ञेया
जीवभूता जगत्यपि । बीजरूपा समाख्याता चिद्रूपापि प्रकीर्तिता ॥'२ यह ५० वर्णों
से अभिन्न, बिसतन्तु तनीयसी, तडित्कोटिप्रख्या कुण्डलिनी मूलाधारपद्म में स्थित
शृङ्गार से मूलाधार की कर्णिका में विद्यमान शृङ्गार से त्रिकोण के ऊपर सार्ध
त्रिवलय आकार द्वारा अधोमुखी होकर स्थित योगमार्ग के द्वारा योगियों की साधना
में ऊर्ध्वस्तर पर उत्थापित की जाती है । यह मूलाधार, अनाहत एवं आज्ञाचक्रों में
विद्यमान वह्नि, सूर्य एवं चन्द्र मण्डलों का वेधन करती है ।३
'व्योमनि'—
'द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं कपालोर्ध्वावसानकम् ।
द्व्यङ्गुलोर्ध्वं शिरोदेशं परं व्योम प्रकीर्तितम् ॥'
इस लक्षण वाले व्योम में विद्यमान चिच्छशिमण्डल के अधोमुख सहस्रार
कर्णिका के मध्य स्थित अकुल के साथ कुण्डलिनी मिलकर एवं फिर अमृत का
स्राव करके डाकिनी आदि मण्डलों को आप्लावित करती हुई स्वयं भी उसके ताप
१. षट्चक्रनिरूपण २. तन्त्रालोक—'विवेक' टीका
३. भास्करराय—'प्रकाश'
३२४ वरिवस्यारहस्ये
से मदोन्मुख होकर पुनः उसी सुषुम्णामार्ग के द्वारा प्रत्यावृत होकर अपने मूलाधार
धाम में सोती है ।¹
कुण्डलिनी के रूप निम्न हैं—१. 'अग्निकुण्डलिनी' २. 'सूर्यकुण्डलिनी' ३.
'सोमकुण्डलिनी' ४. 'समष्टिकुण्डलिनी'
'त्रिकोण' एवं 'कुण्डलिनी'—
(१) वज्राख्या वक्त्रदेशे विलसति सततं कर्णिकामध्यसंस्थं ।
कोणंतत् त्रैपुराख्यं तडिदिव विलसत् कोमलं कामरूपम् ।।
कन्दर्प नाम वायुर्निवसति सततं तस्यं मध्ये समन्ताज् ।
जीवेशो बंधुजीव प्रकरमभिहसन् कोटिसूर्य प्रकाशः ।।²
(२) तन्मध्ये परमाऽतिकुशला सूक्ष्मातिसूक्ष्मापरा ।
नित्यानन्द परम्परातिविगलत पीयूषधारा धरा ।।
ब्रह्माण्डादिकटाहमेव सकल यदभासया भासते ।
सेयं श्रीपरमेश्वरी विजयते नित्य प्रबोधोदया ।।³
“मूलाधारस्थ कुल कुण्डलिनी एवं महामन्त्र” को आगे पृष्ठ ३२५ पर
दर्शाया गया है ।
साक्षाद्विद्यैवैषा न ततो भिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ।। १०७ ।।
(कुल कुण्डलिनी एवं श्रीविद्या का रहस्यार्थ)
यह कुण्डलिनी साक्षात् श्रीविद्या एवं (पराभट्टारिका महात्रिपुरसुन्दरी) जगन्माता
अभिन्न है । इससे कुण्डलिनी एवं श्रीविद्या से अपने को अभिन्न समझना ही
श्रीविद्या का 'रहस्यार्थ' है ।। १०७ ।।
- प्रकाश *
ईदृश्याः कुण्डलिन्या मातृविद्यायाः स्वस्य चाभेद इति रहस्यरूपोऽप्रकाश्योऽर्थ
इत्यर्थः ।। १०७ ।। - सरोजिनी *
'कुण्डलिनी साक्षात् श्रीविद्या है एवं साथ ही जगन्माता है ।' देवी भागवत
पुराण में कहा गया है कि—महाकुण्डलिनी सच्चिदानन्दरूपिणी, प्राणाग्निहोत्र विद्या
है दीपशिखा है—'महाकुण्डलिनी रूपे सच्चिदानन्दरूपिणी । प्राणाग्निहोत्र विद्ये ते
नमो दीपशिखात्मिके ।। (स्कंध ४।अ०१५।१३) कुण्डलिनी परब्रह्म है—'ॐ नमस्ते
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१. नित्यानन्द—'महिम्नस्तोत्र' २-३. षट्चक्रनिरूपण
द्वितीयोऽंशः ३२५
मूलाधारस्थ कुल कुण्डलिनी एवं महामन्त्र
'शब्दब्रह्मणि निष्णातः
परब्रह्माधिगच्छति ।'
'परब्रह्म' : 'महाबिन्दु'
(अतितुर्य 'परप्रणव')
संहारक्रम ↑ शब्दब्रह्म ↓ सृष्टिक्रम
'अपरप्रणव' शब्दब्रह्म
शब्दब्रह्म (तुर्य) (तुर्य)
ॐ
(शब्दब्रह्म) अधोमुख स्वयंभूलिङ्ग
(मूल महाप्रकृति) मूलाधार पद्म की कर्णिका के गह्वर में स्थित कुण्डलिनी
परमाकला का निलय (तन्मध्ये परमाकला)
परावाक्
परब्रह्म
(शब्दातीत)
पश्यन्ती (अतितुर्य)
वाक् 'कंदर्पवायु'
का स्थान ↓
त्रिकोण
मध्यमा
वाक् चित्शक्ति
परावाक्
(शब्दब्रह्म)
त्रिकोण योनि
वैखरी ↓
वाक् 'वज्रा' के अधोभाग पर पश्यन्ती
में पद्म कर्णिका के
↓ मध्य में त्रिपुरसुन्दरी सूक्ष्म पश्यन्ती
का अधिष्ठानरूप
'त्रिकोण' =
'त्रैपुरकोण'
अन्तर्मातृका बहिर्मातृका मदनागार स्थूल पश्यन्ती
(सूक्ष्मवर्णमाला) (स्थूलवर्णमाला) योनिरूप त्रिकोण
३२६ वरिवस्यारहस्ये
परं ब्रह्म कुण्डलिनी स्वरूपिणे निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सद्रूपाय नमो नमः ॥१
योगशिखोपनिषद् में इसे 'चिच्छक्ति परमा देवी 'शिवा' कहा गया है—'ब्रह्मरंध्रे
महास्थाने वर्तते सततं शिवा। चिच्छक्तिः परमादेवी मध्यमे सुप्रतिष्ठिता ।२ यामल में
इसे 'चित्कला' कहा गया है—'चित्कलां यां कुण्डलिनीं तेजोरूपां जगन्मयीम् ॥''
कुण्डलिनी वाग्देवता है । परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी ये वाणी चतुष्टय
कुण्डलिनी के ही विभिन्न रूप हैं और मंत्र इसी परा पश्यन्ती मध्यमा रूपी नाद का
अपर पर्याय हैं अतः देवी मंत्रमयी, नादमयी एवं वर्णमयी कही जाती है । 'सा
प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ॥' 'क्रमेणानेन सृजति कुण्डलिनी वर्ण-
मालिकाम् ।। अकारादिसकारान्तां द्विच चत्वारिंशदात्मिकाम्' ।३ वह साक्षात् विद्या है
और जगन्माता है—'या विद्या भुवनेशानी त्रैलोक्यपरिपूजिता । सादेवी कुण्डली माता
त्रैलोक्यं पाति सर्वदा ॥४ कुण्डलिनी मातृका देवी हैं । 'कामधेनु तंत्र' में समस्त
वर्णों को कुण्डलिनी रूप कहा गया है यथा—'ईकारं परमेशानि स्वयं पर कुण्डली'।
यही कुण्डलिनी मातृका, विद्या, वर्ण एवं मंत्र सभी कुछ है । 'पंचाशन्मातृका
देवी नानाविद्यामयी सदा । नानाविद्यामयीं देवी महाविद्यामयीं तथा । सर्ववर्णमयीं देवी
सर्वदेवमयीं परा ।५ सर्वदेवमयीं सौम्यां ब्रह्माण्डजननी परा ।।' 'अकारादिक्षकात्तरान्ता
मातृकाबीज रूपिणी ॥' 'समस्त जननी देवी मातृका जननी परा ॥' 'मातृका
परमेशानि काली साक्षान्न संशयः ॥'६
यही जगन्माता भी है । सारांश यह कि अकारादि क्षकारान्त समस्त वर्ण
परमकुण्डली के व्यक्त रूप है—'अकारादि क्षकारान्तं स्वयं परम कुण्डली ।' इन्हीं
वर्णों से समस्त जगत् उत्पन्न होता है—'सर्व चराचरं विश्व वर्णान्तु जायते ध्रुवम्''
अतः कुण्डलिनी जगन्माता भी है ।७ 'तोडलतंत्र' में भी कुण्डलिनी को ५० वर्णों
से समलंकृत कहा है—'सदा कुण्डलिनी देवी पंचाशद्वर्णभूषिता ।।'८ सहस्रार में यही
महाकुण्डलिनी के रूप में शिव के साथ निवास करती है—'सहस्रारे महापद्मे
विश्वरूपः परः शिवः । महाकुण्डलिनी तत्र स्थिता नित्या सुरेश्वरि ।।'९ यहाँ शिव
बिन्दुरूप में स्थित है—'सहस्रारे महापद्मे बिन्दुरूपं परं शिवम् ।।'१०
कुण्डलिनी 'परा', 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' रूप में अपने को
अभिव्यक्त करती है जो निम्न हैं—
पश्यन्तीवाक्—शब्द की जो चार अवस्थायें (परा, पश्यन्ती, मध्यमा और
वैखरी) होती है उनमें 'महाबिन्दु' के विस्फोट के पूर्व शब्द की जो अवस्था होती है
उसे 'परा' एवं (किसी विशेष अर्थ की अभिव्यञ्जना न करने वाला एवं मात्र
स्पन्दनस्वरूप) उसमें उत्पन्न सामान्य स्पंद 'पश्यन्ती' कहलाता है । इसका स्थान
मूलाधार से मणिपूर चक्र तक है । यहीं इसका मन से संयोग होता है । ये दोनों
१. महानिर्वाण तन्त्र २-३. शारदातिलक
४. रुद्रयामल ५-७. कामधेनु तन्त्र
८-१०. तोडल तन्त्र
द्वितीयोऽंशः ३२७
अवस्थायें शब्दब्रह्म के ईश्वररूप की अवस्थायें हैं । प्राचीन वैयाकरण 'परावाक्' का
उल्लेख नहीं करते क्योंकि उसमें स्पंद या गति नहीं है । 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' में ठीक
ही कहा गया है कि वैयाकरणों की दृष्टि में पश्यंती ही परम तत्व है--'ननु
पश्यन्त्येव परंतत्वमिति जरद्वैयाकरण मन्यन्ते ।।' आचार्य भर्तृहरि ने भी 'वाक्यपदीय'
में त्रयीवाक् का समर्थन करते हुए परमवाक् के रूप में 'पश्यन्ती' को ही स्वीकार
किया है । अभिनवगुप्तपाद ने भी इस दिशा में सहमति प्रकट की है । सामान्य
स्पंदस्वरूपिणी 'पश्यंतीवाक्' निःस्पन्दात्मिका परावाक् से उद्भूत होती है । मध्यमा
से वैखरी, पश्यन्ती से मध्यमा एवं परा से पश्यंती का आविर्भाव होता है ।
वैखरीवाक् का उद्भव सूक्ष्मरूपा मध्यमा से एवं सूक्ष्मरूपा मध्यमा का उद्भव
पश्यंती से होता है । पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी सुषुप्ति, स्वप्न एवं जाग्रत
अवस्था के प्रतीक माने जाते हैं । सूक्ष्म शरीर में 'मध्यमावाक्' स्वप्नावस्था के
समान है और 'परावाक्' सुषुप्ति अवस्था के सदृश है । वैयाकरणों की दृष्टि में
'पश्यंती' ही परावस्था है ।
'पश्यन्ती' वाक् चैतन्यस्वरूप, अखण्ड, अद्वय, अभिन्न परम् तत्व है । उसमें
ग्राह्य-ग्राहक, देश-काल-क्रम का भेद नहीं है । कहीं वह क्रम-शून्य एवं कही
प्रतिसंहृतक्रमा है । इसे भी आत्मा भी कहा गया हैं । व्याकरणसिद्धान्त के अनुसार
पश्यन्ती—प्रतिलीनाकार, निराकार, चलाचल, संनिविष्टज्ञेयाकार, परिच्छिन्नार्थप्रत्यव-
भास, संसृष्टार्थप्रत्यवभास, प्रशान्तसर्वार्थप्रत्यवभास आदि विशेषणों से विभूषित है।
पश्यन्ती ही वैयाकरणों का ब्रह्मतत्व है । यह निराकार, देशकालादिपरिच्छेद से
शून्य, नियतरूप से शून्य, क्रमशून्यः अनवच्छिन्न अद्वैततत्व है । चूँकि क्रम एवं
भेदाभास ही प्रपंच का स्वरूप है अतः अक्रमा पश्यन्ती विश्वोत्तीर्ण है । शब्दयोग
का अवलम्बन लेकर चित्त का समाधान करनेवाले योगियों को पश्यन्तीवाक् अनावृत
एवं वाग्योग में सिद्धि प्राप्त न करने वाले (पश्यंती के शुद्धरूप का साक्षात्कार न
कर सकने वाले) लोगों के लिए पश्यंती आवृत्तस्वरूपा है । पश्यन्ती के स्वरूप में
शब्द एवं अर्थ का पारस्परिक पार्थक्य नहीं रहता । यही 'पश्यन्ती' अर्थप्रतिपादन
की इच्छा से 'मध्यमावाक्' बन जाती है । यही पश्यन्ती ही 'मध्यमा' एवं कण्ठादि
में से व्यक्त होने पर 'वैखरी' कहीं जाती है। 'सुभगोदय वासना' के अनुसार—
मूलाधार में उत्पन्न ('भूजन्मा') 'परा' वाक् की लता 'पश्यन्ती' है और सुगंध
'मध्यमा' है ।।
“शब्दपरब्रह्माद्वयवाद” मानने वाले शब्दाद्वैतवादी वैयाकरण भर्तृहरि एवं
व्याकरण-दर्शन 'पश्यन्तीवाक्' को ही परब्रह्म स्वीकार करता है—
(१) “अथास्माकं ज्ञानशक्तिर्य्यासदाशिवरूपता ।
वैयाकरण साधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः ।।'१
(२) इत्याहुस्ते परंब्रह्म यदनादि तथाक्षयम् ।
१. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (आ०-२)
३२८ वरिवस्यारहस्ये
तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती परा हि वाक् ॥१
सोमानन्दपाद का मत—काश्मीरीय शैवदर्शन के महान आचार्य एवं
प्रत्यभिज्ञादर्शन के प्रवर्तक आचार्य सोमानन्द शब्दाद्वैतवादियों के मत को अस्वीकार
करते हुए अनेक तर्कों के साथ यह भी तर्क प्रस्तुत करते हैं कि शास्त्रों में कहा
गया है कि—‘शब्दब्रह्म’ में निष्णातता प्राप्त करने के उपरान्त साधक परब्रह्म को
प्राप्त करता है ।१ (‘शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति’)—अतः अपने आप
सिद्ध हैं कि परावाक् या पश्यन्तीवाक् को शब्दब्रह्म स्वीकार कर लेने पर भी उससे
अतीत एवं भिन्न पद ‘परब्रह्मपद’ स्वीकार करना ही पड़ेगा अतः ‘पश्यन्तीवाक्’
परब्रह्म नहीं हो सकता ।
‘न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥’
‘पश्यन्तीवाक्’ ईश्वर तत्व है ! कारणबिन्दुरूप शब्दब्रह्म जब वायु से प्रेरित
होकर नाभिदेश में आकर विमर्शात्मक मन से युक्त होता है तब उसे सामान्य-
स्पन्दात्मक प्रकाशस्वरूप कार्यबिन्दात्मक ‘पश्यन्तीवाक्’ कहा जाता है—‘तदेव
नाभिपर्यन्तमागच्छता तेन पवनेनाभि व्यक्तं विमर्शरूपेण मनसा युक्तं सामान्यस्पन्द
प्रकाश रूपकार्य बिन्दुमयं सत्पश्यन्ती वागुच्यते ॥’२
मध्यमा माष (उड़द) की छीमी के समान क्रमात्मा होने पर भी एकत्वसंयुक्त
है जबकि पश्यन्ती वरधानिका (बीज) के सन्निभ है । तंत्र में पश्यन्ती का अपर
पर्याय ‘कार्यबिन्दु’ है ।
प्रकाश एवं विमर्श की दृष्टि से विचार करने पर—पश्यन्तीवाक् में स्थित
प्रकाशांश ‘वामाशक्ति’ एवं विमर्शांश ‘इच्छाशक्ति’ कहलाता है । योगिनीहृदयकार ने
कहा है कि बीजमावस्थित विश्व को पराशक्ति जब स्फुटीकृत करना चाहती है तब,
उसमें विश्व का वमन करने की इच्छा होने के कारण, उसे ‘वामा’ कहा जाता है
और वह अंकुशाकार में परिणत हो जाती है । इसके उपरान्त इच्छाशक्ति द्वारा वह
अपने को देखती है और उसका आत्मईक्षरम ‘पश्यन्ती’ कहा जाता है—
बीजभावस्थितं विश्व स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी । वामा विश्वस्य वमना दंकुशाकारतां
गता । इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुष स्थिता ॥
राजानक जयरथ ने तंत्रालोक की अपनी टीका में कहा है कि परमेश्वरी ‘परा’
ही अपने स्वातंत्र्य से जब बाह्यरूपों की उन्मिषित ‘वामा’ एवं इच्छाशक्ति में साम्य
से जिस बिन्दु का आविर्भाव होता है उसका अभिधान है—‘पश्यन्तीवाक्’ ॥ वाक्
तत्व का पश्यन्ती रूप वाक् की वह अवस्था है जो ग्राह्य-ग्राहकविभाग क्रमरहित
तथा अविभागा है एवं देश कालक्रम संहारवती है ।३
१. सोमानन्दपाद—‘शिवदृष्टि’ (२।२) २. सौभाग्यभास्कर
३. सोमानन्दपाद—‘शिवदृष्टि’ (२।११)
द्वितीयोऽंशः ३२९
'पश्यन्ती' स्फोट तत्व है—'स्फोट एव हि पश्यन्ती'१ 'पश्यन्ती' को पश्यन्ती
इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह इस स्तर पर आत्मा के द्वारा आत्मा को देखती
है—'स्वात्मानात्मानमथ चेत्पश्यन्ती सामविष्यति ॥'२
शिवाग्र योगीन्द्रज्ञानशिवाचार्य ने शैवपरिभाषा में अपने सिद्धान्तानुसार वाक्तत्व
का इस प्रकार निरूपण किया है— “अत्रशब्दवृत्तिश्चतुर्धा, सूक्ष्मापश्यन्ती मध्यमा
वैखरी चेति । तत्र ज्ञानैकाश्रया अर्थसामान्य प्रकाशिकावाणी 'सूक्ष्मा' । मयूराण्डरस-
वदविभक्तवर्णार्थविशेषबोधनाक्षमावाणी 'पश्यन्ती' ।” पौष्कर में 'पश्यन्ती' का स्वरूप
इस प्रकार निरूपित किया गया है—
“वर्णरूपानुसंधान विरहान्तः समुज्ज्वला ।
मयूराण्डरसो यद्वन्तर्विशेषार्थधारिका ।
पश्यन्ती वागियं ज्ञेया तृतीया शिवशासने ॥”३
तत्व की दृष्टि से पश्यन्तीवाक् का सम्बंध है—'शक्तितत्व' से है—
शिवतत्वविकारः शक्तितत्वम् । अत्रैव पश्यन्त्याख्याया वाग्वेत्तेः निवृत्यादिकलानां
चावस्थानम् ॥”४ इसी में निवृत्यादि कलाओं का अवस्थान है ।५ शिव-शक्ति से
अधिष्ठित होने के कारण इसे शक्तितत्वपद वाच्यता प्राप्त हुई है—
'अस्य च शिवशक्त्यधिष्ठानत्वेन शक्तितत्वपदवाच्यता ॥'६
लक्ष्मीधर ने 'सौन्दर्यलहरी' की टीका में 'परा' को गुणत्रय की साम्यावस्था
एवं 'पश्यन्ती' को वैषम्यावस्था का अभिधान दिया है—'एका परेति सत्व
रजस्तमोगुणसाम्यरूपा । तदन्या पश्यन्ती अन्यतरगुण वैषम्यरूपेत्यर्थः ॥'
पश्यन्तीवाक् के विविध स्वरूप—'पश्यन्ती' के तीन प्रकारों का निरूपण
किया गया है—
१. स्थूलापश्यन्ती—सप्तस्वरों के सम्मिलन या वर्गों के विभाजन से शून्य,
आलाप द्वारा सर्वातिशय आह्लाददायिनी प्रथमनादमात्र स्वभावा वाणी स्थूल पश्यन्ती
वाणी है—
'यत्र या स्वरसन्दर्भसुभगा नादरूपिणी ।
सा स्थूला खलुपश्यन्ती वर्णाद्यप्रविभागतः ॥'
२. सूक्ष्मापश्यन्ती—जिगासा का संधान ही सूक्ष्मा पश्यन्ती है ।
३. पर पश्यन्ती—परात्परचिद्रूपा, उपाधिशून्या पश्यन्ती का सूक्ष्मतम रूप ही
पर पश्यन्ती कहा जाता है ।
१. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।५८) २. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।६५)
३. पौ०बिन्दु०प० ४. शैवपरिभाषा
५-६. तत्रैव
३३० वरिवस्यारहस्ये
‘अस्मिन् स्थूलत्रये यत्तदनुसन्धानमादिवात् । पृथक्-पृथक् तत्रितयं सूक्ष्ममित्य-
भिधीयते । षडजं करोमि मधुरं वादयामि ब्रुवे वचः । पृथगेवानुसंधानत्रयं संवेद्यते
किल । एतस्यापि त्रय स्याद्यं यद्रूप मनुपाधिमत् । तत्परं त्रितयं तत्र शिवः
परचिदात्मकः ।।’
१. अभिनवगुप्त की दृष्टि के अनुसार पश्यन्ती के निम्न भेद हैं—
(क) पश्यन्ती (ख) महापश्यन्ती (ग) परममहापश्यन्ती
(क) ‘पश्यन्ती’ = ‘गृहात् निःसराभि’ आदि परामर्श, माया प्रमाता (जीव) ।
(ख) ‘महापश्यन्ती’ = सदाशिव एवं ईश्वर की दशा ।
(ग) परममहापश्यन्ती = परावाक् ।।
‘पश्यन्तीवाक्’ में ग्राह्य-ग्राहकगत देशकालक्रम स्फुटभाव से नहीं रहता क्योंकि
पश्यन्ती वाक् में निर्विकल्पात्मक विमर्श हुआ करता है । इसे प्रतिसंहृतक्रम’
इसलिए कहते हैं क्योंकि ग्राह्यग्राहकोत्पन्न क्रम पश्यन्ती में अस्फुट एवं लीन दशा
में रहता है । और क्योंकि वह स्वयमेव अक्रमात्मिका है अतः वह अन्तर्लीन एवं
अविभागात्मक क्रम को आवृत्त करके स्थित है । इसे ‘सूक्ष्म’ इसलिए कहा जाता है
क्योंकि—
२. वाक्यपदीयकार भर्तृहरि और पश्यन्ती के विविध रूप—
आचार्य भर्तृहरि अपनी ‘स्वोपज्ञ’ नामक टीका में पश्यंती के विविधात्मक
स्वरूपों का विवेचन किया है । वाक्यपदीयकार ने ‘परं तु पश्यन्तीरूपमनपभ्रंशम-
सङ्कीर्ण लोकव्यवहारातीतम्’ कहकर जहाँ अनपभ्रंश, असङ्कीर्ण, लोकव्यवहारातीत
‘परपश्यन्ती’ का उल्लेख किया है वहीं ‘चलाचला, आवृता, सन्निविष्टज्ञेयाकारा,
परिच्छिन्नार्थप्रत्यवभासा, संसृष्टार्थप्रत्यवभासा, प्रतिलब्धसमाधाना, विशुद्धा,
प्रतिलीनाकारा, निराकारा, प्रशान्त सर्वार्थप्रत्यवभासा आदि विशेषणों के द्वारा पश्यन्ती
के विभिन्न स्वरूपों की ओर भी सङ्केत किया है ।
आचार्य भास्करराय ‘ईक्षण’, ‘काम’, ‘तप’, एवं विचिकीर्षा' आदि शब्दों को
समानार्थक मानते हुए पश्यन्ती को इन्हीं का स्वरूप मानते है । राजानक जयरथ ने
‘तन्त्रालोक’ की टीका में कहा है कि परापरमेश्वरी जब स्वातंत्र्य शक्ति द्वारा बाह्य
रूपों को उन्मिषित करना चाहती है—अभिव्यक्त करना चाहती है तब उसकी
आख्या ‘पश्यन्ती’ होती है । उस समय वाच्यवाचकता का क्रम नहीं रहता तथा
चित्शक्ति के प्रकाश के प्राधान्य के के कारण वह द्रष्टा रूप में स्थित रहती है ।
“सैव हि परमेश्वरी स्वस्वातंत्र्यात् बहिरूपतामुल्लिलासयिषुर्व्याच्यवाचक क्रमानुदया
द्विभागस्यास्फुटत्वाच्चि ज्योतिष एवं प्राधान्यात् द्रष्टृरूपतया पश्यन्तीति शब्द-
व्यपदेश्या ।’’
‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ वाक्यांश में ईक्षण शब्द को आचार्य भास्करराय ने
‘काम’ ‘तप’ ‘विचिकीर्षा’ आदि का अपर पर्याय स्वीकार किया है अतः इस
द्वितीयोंऽशः ३३१
अवस्था को 'पश्यन्ती' संज्ञा देना अनुचित नहीं होगा—ततः
स्रष्टव्यपदार्थानालोचयति—"तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय" इति श्रुतेः । तादृशीमीश्वरममेव
प्रवृत्ति निमित्तीकृत्य तस्यां पश्यन्तीति पदं प्रवर्तते ॥ (वरिवस्या० प्रकाश)
३. सौभाग्यभास्करकार का कहना है कि चूँकि वाणी के इस स्तर पर
आत्मा अपने को देखती है अतः वाक् की इस अवस्था की आख्या 'पश्यन्ती'
है—'पश्यतीति पश्यन्ती ।' 'सौभाग्य सुधोदय' में कहा गया है—'पश्यति सर्वं
स्वात्मनिकरणानां सरणिमपि यदुत्तीर्णा । तेनेयं पश्यन्तीत्युत्तीर्णेत्यप्युदीर्यते मात। ॥'१
४. आचार्य सोमानन्दपाद और 'पश्यन्तीवाक्'—आचार्य सोमानन्द पश्यन्ती
को 'ज्ञानशक्ति' से अभिन्न स्वीकार करते हैं ।
आचार्य अभिनवगुप्त और 'पश्यन्तीवाक्'—तंत्र समाम्नाय एवं आचार्य
अभिनवगुप्त की दृष्टि में 'पश्यन्तीवाक्' 'इच्छाशक्ति' है ।२
५. आचार्य उत्पल और 'पश्यन्तीवाक्'—आचार्य उत्पलदेव ने शिवदृष्टि की
अपनी टीका में 'पश्यन्तीवाक्' में ज्ञानशक्ति को उपचरित स्वीकार किया है—
'पश्यन्तीति दर्शन प्राधान्यात् उपचरित ज्ञानशक्ति रूपत्वेप्याश्रीयमाणे परमशिवरूपतया
अत्यन्तदूरवर्तिनी, न तु पर्यन्तदशा सौ, ज्ञानशक्तेः सदाशिवरूपत्वात् परापर-
व्यवस्थात्र । सदाशिव रूपत्वे च क्रियाशक्तिरपि न परित्यक्ता ॥'३
६. 'पश्यन्ती' ज्ञानशक्ति है या इच्छाशक्ति?—आचार्य सोमानन्दपाद द्वारा
पश्यन्ती को ज्ञानशक्ति एवं आचार्य अभिनवगुप्तपादाचार्य द्वारा इसे इच्छाशक्ति के
रूप में स्वीकार करने पर भी इन मान्यताओं में तात्विक धरातल पर अन्तर्विरोध
नहीं है क्योंकि स्वयमेव इच्छाशक्ति ज्ञानस्वभावा एवं ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति से
युक्त है—आचार्य अभिनवगुप्त इच्छाशक्ति में बोध्यवस्तु के अवबोध की शक्ति होती
है । इच्छाशक्ति बोध्यबुभुत्सास्वभावा होती है तथा यह ज्ञान एवं क्रिया इन दोनों
शक्तियों की अनुग्राहिका है—"इयमेव च इच्छाशक्तिरूपेति दर्शयति कार्यचिकीर्षा
इति । बोध्यबुभुत्सास्वभावा अपि इयं भवति, अतश्च एवं—यदिच्छाशक्तिर्ज्ञानक्रिया-
शक्त्यो सुग्राहिका इति, किन्तु बुभुत्सा अपि बोधस्वभावैव तस्य वस्तुनस्तत्र अवभास-
परिपूर्णतया प्रकाशनात् ॥"४
७. व्याकरणागम, भर्तृहरि और 'पश्यन्तीवाक्'—अद्वैतवादी व्याकरणागम
शब्दाद्वैतवाद का प्रतिपादन करता हुआ पश्यन्तीस्वरूपा परावाक् को अनादिनिधन
शब्दब्रह्म मानता है । व्याकरण भर्तृहरि ने अपनी 'स्वोपज्ञ' नामक टीका में
'पश्यन्ती' को ही परावाक् स्थानीय स्वीकार करते हुए उसे वाणी का परात्पर
स्वरूप माना है । उनके अनुसार भी 'पश्यन्ती' विभागशून्या, संहृतक्रमा,
स्वरूपज्योतिस्वरूपा, अविनाशा, एवं स्वप्रकाशा है । आगन्तुक मलों से सङ्कीर्यमाण
१. सौभाग्यभास्कर २. ई० प्र० वि० (अ० १, वि० ५)
३. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।३७) ४. ई० प्र० वि० (अ० १, वि० ५)
३३२ वरिवस्यारहस्ये
होने पर भी सोम की चरमाकला के सदृश कभी इसका अत्याभिभव नहीं होता ।
इसके स्वस्वरूप का साक्षात्कार होने पर स्वर्गमुक्ति स्वरूप अधिकार निवृत्त हो जाता
है । षोडशकल पुरुष में इसे ही 'अमृतकला' कहा गया है—
'अविभागा तु पश्यन्ती सर्वतः संहृतक्रमा । स्वरूपज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा
वागनपायिनी । सैषा सङ्कीर्यमाणापि नित्यमागन्तुकैर्मलैः । अन्त्या कलेव सोमस्य
नात्यन्त मभिभूयते । तस्यां दृष्टरूपायामधिकारो निवर्तते । पुरुषे षोडशकले
तामाहुरमृतां कलाम् ।।'१
८. आचार्य सोमानन्दपाद की दृष्टि और 'पश्यन्तीवाक्'—प्रत्यभिज्ञादर्शन के
उद्भावक आचार्य सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टि' में व्याकरणागम में स्वीकृत शब्द
-परब्रह्माद्वयवाद का खण्डन करते हुए 'पश्यन्ती' का व्याकरणागमानुकूल स्वरूप इस
प्रकार प्रस्तुत किया है—
१. काश्मीरीय ईश्वराद्वयवाद में जो जो ज्ञानशक्ति अथवा सदाशिव का स्वरूप
है वही वैयाकरणों की पश्यन्ती है जिसे वे लोग परात्पर तत्व स्वीकार
करते हैं ।
२. यह अनादिनिधन शब्दब्रह्मस्वरूप पश्यन्ती ही 'परावाक्' है ।
३. यह शब्दब्रह्म सम्पूर्ण शरीरों में व्याप्त संवित् (आत्मा) है ।
४. ज्ञेयरूप, शून्य, चिद्रूप उस शब्दतत्व की ही 'भोक्ता' भी संज्ञा है ।
५. यह साक्षात्कार को निरतिशद स्थान या पराकोटि है ।
६. क्रमात्मक विश्व से अतीत, देशकालावच्छेद से विरहित, वाच्यवाचक-ग्राह्य
ग्राहक आकारों से शून्य, ऐन्द्रियवृत्तियों से परे स्थित यह पश्यन्ती वाक्
ही पराकाष्ठा, परमार्थ एवं परब्रह्म है—'अथास्माकं ज्ञानशक्तियर्या सदाशिव-
रूपता । वैयाकरणसाधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः । इत्याहुस्ते परं ब्रह्म
यदनादि तथाक्षयम् । तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती पराहि वाक् । स
एवात्मा सर्वदेहव्यापकत्वेन वर्तते । अन्तःपश्यदवस्थैव चिद्रूपत्वमरूपकम् ।
तावद्यावत्परा काष्ठा यावत्पश्यन्त्यनन्तकम् । अक्षादिवृत्तिभिर्हीनं देशकालादि-
शून्यकम् । सर्वतः क्रमसंहार मात्रमाकारवर्जितम् । ब्रह्मतत्वं पराकाष्ठा
परमार्थस्तदेव सः ।।२
जब विकारशून्या पराकला स्रष्टव्य पदार्थों का आलोचन करती है—'तदैक्षत
बहुस्यां प्रजायेय' (छा०उ०६-२-३) के अनुसार ईक्षण करती है तब उस
ईक्षणात्मिका परा कला को 'पश्यन्ती' की आख्या प्राप्त होती है । यह शक्ति समग्र
विश्व को अपने में अंतर्गर्भित देखती है इसीलिए इसे 'पश्यन्ती' और 'उत्तीर्णा' कहा
गया है ।३
१. 'वाक्यपदीय' की टीका २. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि'
३. सौभाग्यभास्कर
द्वितीयोंऽशः ३३३
परावाक् के अनन्तर वाच्यवाचकात्मक विश्वविकास की जो द्वितीय कोटि है
वहीं है 'पश्यन्ती'। यह अपने में समस्त विश्व को देखती है तथा अन्तः और
बाह्यकरणों के मार्ग से उत्तीर्ण है अतः इसे 'पश्यन्ती' और उत्तीर्ण कहते हैं -
'पश्यंति सर्व स्वात्मनि करणानां सरणिमपि यदुत्तीर्णा ।
तेनेयं पश्यन्तीत्युत्तीर्णेत्यप्युदीर्यते माता ।।'१
'पश्यन्ती' के स्तर पर असामान्य आन्तरभाव का उदय होता है जिसमें
प्रत्यवमर्शनकारी आत्मा वाच्यार्थ के परामर्श की दिशा में अर्थ को अहंभाव से
आच्छादित करके उसे अभिव्यंजित करती है । मध्यमा भूमि में अर्थ 'इदं' रूप में
प्रतीत होता है और साथ ही यह वाच्य एवं शब्द से पृथक् अवस्था में वाचक रूप
में प्रकट होता है । इसी स्तर पर समस्त शास्त्र वाचक शब्द का आश्रय लेकर
उदित होते हैं । और स्वयं आत्मा ही १. वक्ता एवं गुरु तथा २. श्रोता एवं शिष्य
के रूप में प्रकट होती है । पश्यन्ती भूमिपरा की भाँति वाच्य-वाचक विभाग से
शून्य है तथा इस भूमि में उपदेष्टा एवं उपदेश्य में कोई भेद नहीं रहा करता ।
परमेश्वर की पाँच शक्तियों में से आद्या परमा शक्ति "इच्छाशक्ति" ही पश्यन्ती
के रूप में शरीर धारण करती है—'इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा
स्थिता ।।'२ इच्छाशक्ति वामाशक्ति के साथ सामरस्य प्राप्त करके पश्यन्ती के रूप
में प्रकट होती है—'इच्छाशक्तिर्वामाशक्तिसामरस्यमापन्ना पश्यन्ती रूपेण स्थिता ।।'३
मध्यमावाक्— 'मध्यमा' शब्द का अर्थ है दो प्रान्तों का मध्यवर्ती । चूँकि
मध्यमा के एक प्रान्त में दिव्य पश्यन्तीवाक् स्थित है और दूसरे प्रान्त में पाशव
वैखरीवाक् और इन दोनों के मध्य सेतुस्वरूप मध्यमावाक् स्थित है इसीलिए इसको
'मध्यमा' कहते हैं । पशुभाव से दिव्यभाव में यात्रा करने का मार्ग 'मध्यमा' ही है ।
जहाँ 'वैखरी' वाक् में चैतन्य का आलोक आवृत रहता है वहीं मध्यमा वाक् में
प्रस्फुट रहता है । चैतन्यालोक की रश्मियाँ नादरूपी सूत्र का आश्रय लेकर निःसीम
व्योम में व्याप्त रहती है । 'मध्यमा' में वैखरी की भाँति व्यक्तता तथा परा की
भाँति अव्यक्तता दोनों नहीं है प्रत्युत् उसमें व्यक्तता एवं अव्यक्तता दोनों स्थित हैं ।
'वैखरी' वाक् में चिद्भाव गुप्त रहता है इसीलिए इस भूमि के वर्णों को मंत्रमयता
प्राप्त नहीं है किन्तु इसके विपरीत मध्यमा चिद्रश्मिभव होने के कारण मंत्र भूमि
है । 'वैखरी' भूमि में लक्ष्य नीचे मूलाधार की ओर (या बाहर की ओर) रहता है
जबकि 'मध्यमा' में लक्ष्य ऊपर गुरुधाम या सहस्रार की ओर होता है । मध्यमा
मंत्रमयी भूमि है क्योंकि मध्यमा वाक् मंत्ररूप में ही प्रस्तुत होती है । इसी स्थान
से मनःशोधन एवं उसके माध्यम से विज्ञान के द्वार का उद्घाटन संभव हो पाता
है । चूँकि वैखरी भूमि में चिदंश आच्छन्नप्राय रहता है अतः इस भूमि में मनोमय,
प्राणमय एवं अन्नमय इन तीनों कोशों की ओर आकर्षण रहता है । मध्यमा में
१. सौभाग्यभास्कर २. योगिनीहृदय
३. अमृतानन्द—'दीपिका'
३३४ वरिवस्यारहस्ये
नादात्मक चिद्रश्मि नित्य विद्यमान रहती है जबकि वैखरी में नहीं ।
स्थूलसृष्टि के आदि में 'मध्यमा' शब्द ही प्रकट होता है । उस समय उसका
कोई बाह्य अर्थ नहीं होता । 'मध्यमा' शब्द वह मानसिक गति है जो किसी वस्तु
की धारणा बनाती है । मध्यमा अर्थ स्थूल बाह्य वस्तु की मानसिक छाप है ।
मध्यमा शब्द और मध्यमा अर्थ, ज्ञाता और ज्ञेय (ग्राहक एवं ग्राह्य) रूप में सूक्ष्म
शरीर के विषय है । मध्यमा वाक् एवं उसका अर्थ, दोनों सूक्ष्म हैं और ये सूक्ष्म
(लिङ्ग) शरीर से सम्बद्ध हैं । किसी अर्थ-ग्रहण करने की क्रिया में मन दो कार्य
किया करता है ।
१. मन का एक अंश तो सूक्ष्मशब्द के साथ एकाकार हो जाता है ।
२. मन का द्वितीय अंश बाह्य वस्तु के रूप में आकार ग्रहण करता है ।
यही सूक्ष्म अर्थ है । सूक्ष्मशब्द एवं सूक्ष्म अर्थ मन के दो प्रतिरूप है । इस
प्रकार सूक्ष्म शब्द एवं सूक्ष्म अर्थ ग्राहक एवं ग्राह्य रूप में मन की ही अभिव्यक्तियाँ
है और दोनों सूक्ष्मशरीर के वशीभूत हैं । शब्द का स्थूल रूप जो वैखरीवाक् द्वारा
प्रकट होता है मध्यमा के स्तर पर सूक्ष्मरूप धारण करता है । वाणी का यह सूक्ष्म
रूप ही मध्यमावाक् का विषय है । सोमानन्दपाद के अनुसार क्रमशून्य, शब्दब्रह्म,
अर्थ प्रतिपादन की इच्छा से, विवक्षा के द्वारा उपलक्षित मनोविज्ञान का रूप ग्रहण
करता है किन्तु बिन्दु नाद नामक प्राणापानस्वरूपात्मक वायु के क्रम से उल्लसित
होने पर वही वाक् 'मध्यमावाक्' कहलाता है ।
'आस्ते विज्ञान रूपत्वे स शब्दोऽर्थविवक्षया ।
मध्यमा कथ्यते सैवबिन्दुनादमरुत्क्रमात् ।।'
'ज्येष्ठा' तथा ज्ञान के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है उसका नाम है—
'मध्यमावाक्' ।। 'मध्यमावाक्' वाक्तत्व का वह स्तर है जो अनाहत चक्र से
सम्बद्ध है, स्फुट होते हुए भी संयुक्त पत्तियों की भाँति भेदाभेद स्तर पर आरूढ़ है
तथा बुद्धि के साथ संश्लिष्ट है—सोमानन्दपाद ने इसका स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत
किया है—
अथ मध्यमया बाह्या भावा ग्राह्या ह्यविद्यया ।
तस्या एव हि संयोगो बुद्ध्या सङ्कल्पनात्मना ।।१
शिवाग्रयोगीन्द्रज्ञानशिवाचार्य ने 'शैवपरिभाषा' में मध्यमा को इस प्रकार
परिभाषित किया है—"बुध्युपारूढ़वर्णा तत्क्रम विशेषोपेता प्राणवृत्त्यगोचरीभूता सैव
मध्यमा" ।। पौष्कर० में इसका स्वरूप इस प्रकार नियपित किया गया है—
“बुध्या वर्णानुसंधानपूर्वमर्थस्य वाचिका ।
प्राणवृत्तिमतिक्रान्ता वागेषा मध्यमाह्वया ।।’’२
१. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।३७) २. पौ०बिन्दु०प०
द्वितीयोऽंशः ३३५
तात्त्विक दृष्टि से वाग्विभाजन—तात्त्विक दृष्टि से मध्यमावाक् का सम्बंध
'सदाशिव तत्व' है—
“शक्तितत्व विकारः सदाशिव तत्वम् । इदमेव मध्यमाभिधानाया वाण्या
अधिष्ठानम् ॥”१ कामिक आदि तंत्र भेद के कारणों प्रणवादिकों, सामीप्य आदि
मुक्ति प्राप्त लोगों एवं उनके भुवनादिक का यही कारण है ।२
अभिनवगुप्तपाद ने 'तंत्रालोक' में मध्यमा के अनेक भेदों का वर्णन किया
है—
'मध्यमा' के विभिन्न भेद—अभिनवगुप्त ने मध्यमा के तीन भेद किये हैं—
१. 'स्थूलमध्यमा' २. 'सूक्ष्ममध्यमा' ३. 'परमध्यमा'
१. स्थूलमध्यमा—अभिनवगुप्त इसका स्वरूपोद्घाटन करते हुए कहते हैं—
'यत्तु चर्मावनद्धादि किंचित्तयत्रैव यो ध्वनिः । स स्फुटास्फुटरूपत्वान्मध्यमा
स्थूलरूपिणी ॥'३
चमड़े से मढ़े हुए मृदङ्ग आदि को बजाने पर जो ध्वनि निकलती
है उसे स्थूल मध्यमा के सदृश समझना चाहिए । यह ध्वनि पश्यन्ती को
सूक्ष्मता की तुलना में अधिक स्फुट होती है किन्तु वर्णादि विभाग के न
होने से अस्फुट भी होती है । दो वाकों के मध्य में होने से ही 'मध्यमा'
कहा जाता हैं । यह स्थूल इसलिए होती है क्योंकि यह लोक श्रव्य होती
है ।
२. सूक्ष्ममध्यमा—बजाने की इच्छा के अनुसंधान का अभिधान ही सूक्ष्म
मध्यमा है जो कि संवेदनात्मक मात्र होती है ।
३. परमध्यमा—वाद्य बजाने की इच्छारहित चिदात्मक स्वरूप ही परमध्यमा
है ।
'महाभारत' के आश्वमेधिक पर्व में 'मध्यमा' का स्वरूप—इस प्रकार
निरूपित किया गया है—'केवलं बुद्ध्युपादान क्रमस्वरूपानुपातिनी । प्राणवृत्तिमतिक्रम्य
मध्यमा वाक् प्रवर्तते ॥' अर्थात् बुद्धि जिसका उपादान है । क्रमरूपात्मक, प्राणवृत्ति
से अतीत होकर मध्यमावाक् प्रवृत्त होता है ।”
भर्तृहरि की व्याख्यानुसार मध्यमा का स्वरूप इस प्रकार है—अन्तःसन्निवेश
-संयुक्त, क्रम न होने पर भी क्रम को ग्रहण किए हुए के समान, बुद्धि मात्र
उपादान वाली, सूक्ष्म प्राणवृत्ति के पीछे रहने वाली, वाणी ही मध्यमा वाणी है—
“मध्यमास्वन्तः सन्निवेशिनी परिगृहीतक्रमेव बुद्धिमात्रोपादान सूक्ष्मप्राणवृत्त्यनुगता ॥”
ईश्वर प्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी में मध्यमा के स्वरूप का निरूपण इस प्रकार
किया गया है—“अन्तःकरणं मनो बुद्धयहङ्कारलक्षणं मध्यभूमौ पुर्यष्टकात्मनि प्राणाधारे
१-२. शैवपरिभाषा ३. तन्त्रालोक (तृ०आ०)
३३६ वरिवस्यारहस्ये
विश्रान्तं या विमर्शशक्ति प्रेरयति सा मध्यमा वाक् ॥'' अर्थात् पुर्यष्टक युक्त
प्राणशक्ति की आश्रयभूता सुषुम्नानाड़ी में विश्रांति-प्राप्त मन, बुद्धि अहङ्कार युक्त
अन्तःकरण को जो विमर्श शक्ति प्रेरित करती है उसे 'मध्यमावाक्' कहते हैं ।
विमर्शिनीकार आगे कहते हैं कि उससे प्रेरित होकर अन्तःकरण चतुष्टय, सङ्कल्पन
निश्चयीकरण, अभिमनन एवं विकल्पन रूप कार्यों में प्रवृत्त होता है और उस समय
जब वह विमर्शमयी वाणी सङ्कल्पपूर्ण ग्राह्य एवं सङ्कल्पयितृ रूप ग्राहक एवं "मैं
चैत्र, घट की कल्पना कर रहा हूँ, आदिवाचक शब्दों के साथ भेदपूर्ण, स्फुटक्रम
से उपरुक्त होती है तब चिन्तन शब्दवाच्य वह ज्ञानशक्ति एवं मध्यमावाक् कही
जाती है ।
'कामकलाविलास' की दृष्टि में मध्यमा और उसका स्वरूप निम्नानुसार
है—'मध्यमा' के दो भेद हैं—१. सूक्ष्म, २, स्थूल । “द्विविद्या मध्यमा सा सूक्ष्म-
स्थूलाकृतिः स्थिता सूक्ष्मा । नवनादमयी स्थूला नववर्गात्मो च भूतलिप्यात्मा ।
आद्याकारणमन्याकार्य त्वनयोर्यत्तस्ततो हेतोः । सैवेयं नहि भेदस्तादात्म्यं हेतु
हेतुमदभीष्टम् ॥” (२७-२८) । सारांश यह कि—
१. मध्यमा के भेद हैं—(क) स्थूल (ख) सूक्ष्म ।
२. सूक्ष्मरूप में वह नित्या एवं नवनादमयी है ।
३. स्थूलरूप में वह भूतलिप्यात्मक एवं वर्णों का नववर्ग है ।
४. सूक्ष्म मध्यमा कारण है एवं स्थूल मध्यमा कार्य है ।
५. स्थूल (कारणरूपा) एवं सूक्ष्म (कार्यरूपा) मध्यमा से स्वरूपतः कोई भेद
नहीं है ।
'सूक्ष्मामध्यमा'—नवनादगर्भा है । नौ नाद निम्नांकित हैं—चिणि, चिणिचिणी,
घण्टानाद, शङ्खनाद, तंत्रीनाद, तालनाद, वेणुनाद, भेरीनाद, मृदङ्गनाद (हंसोपनिषद)।
—इन नादों को केवल समाधि द्वारा ही सुना जा सकता है—“तत्र सूक्ष्मा
समाधिबलेन अनुभूयमाना ॥'८ (का०)
'स्वच्छन्दतंत्र' के अनुसार नाद ८ हैं जो निम्न हैं घोष, राव, स्वन, शब्द,
स्फोट, ध्वनि, झाङ्कार ध्वंकृतिः—
'अष्टधा सतु देवेश व्यक्तः शब्दप्रभेदतः । घोषो रावः स्वनः शब्दः स्फोटाख्यो
ध्वनिरेव च । झाङ्कारो ध्वंकृतश्चैव अष्टौ शब्दाः प्रकीर्तिता । नवमस्तु महाशब्दः सर्वेषां
व्यापकः स्मृतः ॥'१
ये आठ नाद उस नवम नाद के प्रकार हैं जो कि व्यापक रूप से सर्वत्र
प्रसरणशील है । इनमें 'घोष' कान एवं उँगली के संयोग से उद्दीप्त वह्निजन्य शब्द
सदृश है । काँसे के टूटने से उत्पन्न रूक्ष शब्द जैसा शब्द 'राव' है । बाँस की
१. स्वच्छन्दतन्त्र (११ पटल)
द्वितीयोऽंशः ३३७
ध्वनि के सदृश एवं वातशून्यप्रदेश में होने वाली सौम्यवर्षा के सदृश ध्वनि ही
‘स्वन’ है । व्योम में भ्रमरी की ध्वनि के सदृश एवं सम्पूर्ण शब्दों की जन्मभूमि
रूप नाद ‘शब्द’ है । वाक्य को स्फुट रूप से सूचित करने वाला, वर्णभेद का
अवभासक नाद ही ‘स्फोट’ है । वीणा के पाँचवें तार से निःसृत ध्वनि के समान
‘ध्वनि’ है । वीणा के समस्त तारों के निनादित होने पर होने वाले ध्वनि के सदृश
ध्वनि-‘झाङ्कार’ है । आकाशारूढ़ मेघों की ध्वनि के सदृश घण्टानाद का अनुगमन
करने वाली ध्वनि ‘ध्वंकृति’ है । इन्हीं नादों से युक्त मध्यमा ‘सूक्ष्मामध्यमा’ कही
जाती है ।
स्थूल मध्यमा नववर्गात्मिका है । उपर्युक्त नव नादों द्वारा ही सूक्ष्म अ, क,
च, ट, त, प, य, श, ल के रूप में वर्तमान नववर्ग से युक्त मध्यमा
‘स्थूलमध्यमा’ कहलाती है । ये नववर्ग नव नादों से उद्भूत हुए हैं ।
पद्मपादाचार्य की दृष्टि में ‘मध्यमा’ और उसका स्वरूप—आचार्य पद्मपाद की
व्याख्यानुसार मध्यमा का स्वरूप इस प्रकार है—
१. यह बाह्य अन्तःकरण आदि से युक्त है ।
२. यह हिरण्यगर्भरूपात्मक है एवं बिन्दुतत्वमय है ।
३. नाभि से लेकर हृदयपर्यन्त स्थान में अभिव्यक्त ।
४. विशेष स्पंद सङ्कल्पादिरूपात्मक ।।
५. परिभाषा—‘मध्ये मा बुद्धिर्यस्याः सा मध्यमा’ ।¹
१. भास्करराय एवं पद्मपाद के विचारों में मतभेद—भास्करराय के मत में
‘मध्यमा’ नादमयी है—‘‘अथतदेव शब्दब्रह्म तेनैव वायुना हृदयपर्यन्त भ्रमि व्यज्यमानं
निश्चयात्मिकया बुद्ध्या युक्तं विशेष स्पन्द प्रकाशरूप नादमयं सन्मध्यमा
वागित्युच्यते ।।’’²
२. पद्मादाचार्य के मत में ‘मध्यमा’ बिन्दुमयी है—प्रपंचसार० प्रथम
पटल ४३ श्लोक में कहा गया है—‘स बिन्दुनाद बीजत्वभेदेन च निगद्यते’’ । इस
कथन के साथ मध्यमा को ‘बिन्दुमयी’ मात्र कहना आत्मविरोधी कथन है । राघव
भट्ट के मतानुसार मध्यमा ‘नादबिन्दुमयी’ है । राघवभट्ट द्वारा उद्धृतांश में कहा
गया है कि मध्यमा ‘नादरूपिणी’ है—‘सैब हृत्पङ्कजं प्राप्य मध्यमा नादरूपिणी ।
पद्मपादाचार्य ने ‘मध्यमा’ को बिन्दुरूपात्मक एवं ‘पश्यन्ती’ को नादात्मक भी कहा
है । वस्तुतः ‘बिन्दु’ ‘पश्यन्ती’ का एवं ‘नाद’ मध्यमा का सङ्केतक है ।
नित्याषोडशिकार्णव में मध्यमा के स्वरूप का निरूपण इस प्रकार किया गया
है—‘ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमा वागुदीरिता ऋजुरेखामयी विश्वस्थितौ प्रथित-
विग्रहा ।।’ सारांश यह कि ‘ज्ञानशक्ति’ एवं ‘ज्येष्ठा’ मध्यमावाक् के मूल उपादान
१. प्र०सा०तं०वि० २. सौभाग्यभास्कर (पृ०९९)
२२ वरि.
३३८ वरिवस्यारहस्ये
हैं। यह ऋजुरेखामयी वाक् विश्वस्थिति का अधिष्ठान एवं कारण है । 'महात्रिकोण'
में यह ऋजु रेखा का कार्य सम्पादन करती है ।
मध्यमावाक् को हिरण्यगर्भशब्द' या 'नाद' पद से भी अभिहित किया गया
है। वायु के सहकार से नाभि से हृदयपर्यन्त अभिव्यज्यमान एवं निश्चयात्मिका बुद्धि
से उपहित 'शब्दब्रह्म', विशेषस्पन्दात्मक' प्रकाशरूपात्मक एवं नादप्राण 'मध्यमावाक्'
पद वाच्य है । भास्करराय ने नव नादों की समष्टि को ही 'मध्यमा' का अभिधान
दिया है ।१ पद्मपादाचार्य ने इसे बिन्दुत्वमयी एवं हिरण्यगर्भरूपिणी संज्ञा दी है ।
'कामकलाविलास' में 'मध्यमा' के स्वरूप का निरूपण इस प्रकार किया गया
है—पराभूर्जन्य पश्यन्ती वल्लीगुच्छसमुद्भामध्यमा सौरभा वैखर्यक्षमाला जयत्यसौ ।।
अर्थात्—
१. 'परा' = बीजधारिका मूल भूमि है ।
२. 'पश्यन्ती' = उस बीजोत्पन्न वृक्ष का वल्लीगुच्छ है ।
३. 'मध्यमा' = उस पादप के पुष्पों का सौरभ है ।
४. 'वैखरी' = अक्षमाला है ।
'सौभाग्यभास्कर' में ठीक ही कहा गया है कि 'मध्यमा' का अन्य वाणियों से
यह भेद है कि न तो 'मध्यमा' पश्यन्ती की भाँति केवल 'उत्तीर्ण' है और न तो
वैखरी की भाँति बाह्यवर्ती है ।
“तदुक्त 'पश्यन्ती न केवलमुत्तीर्णा न वैखरी वहिः । स्फुटतर निखिलावयवा
वांग्रूपा मध्यमा तयोस्मात् ।।''
इस भूमि में समस्त शास्त्र नित्याविर्भूत हैं । इसका स्वल्प अंश वैखरीवाक् के
रूप में ऐन्द्रिय-विषय बनकर उपस्थित होता है किन्तु शेष ज्ञान, अवबोध एवं
रहस्यमय शास्त्र वाणी के ऊर्ध्व धरातलों पर ही रह जाते हैं । योगी एवं ज्ञानी
मध्यमा के स्तर पर आरूढ़ होकर शेष (अव्यक्त) ज्ञान प्राप्त किया करते हैं । इस
स्तर पर अनन्त एवं अपरिमेय ज्ञान-विज्ञान का रत्नाकर लहरें मार रहा है ।
मध्यमा के स्तर पर वाच्यार्थ वाच्य-वाचक स्वभाव से प्रकट हुआ करता है । किन्तु
यह उल्लासन प्रपंच के वेद्य-वेदक प्रथा से भिन्न है । इसी मध्यमा भूमि के स्तर पर
परमात्मा अपने स्वरूप को गुरु एवं शिष्य के रूप में विभाजित करके आत्मकल्पित
गुरुशिष्य भाव का आश्रय लेकर गुप्त ज्ञान का प्रकाशन किया करते हैं । इस तरह
'सदाशिव' नामक गुरु एवं 'ईश्वर' नामक शिष्य का प्रकटीकरण होता है ।
परमेश्वर गुरु या सदाशिव में पाँच शक्तियों (चित्, आनन्द, इच्छा, एवं क्रिया
नामक शक्तियाँ) को पाँच मुख रूप में प्रकट करते हैं । सदाशिव के पाँच मुखों से
१. अथ बाह्यान्तःकरणाद्यात्मिका हिरण्यगर्भरूपिणी बिन्दु तत्त्वमयी नाभ्यादिहृदयान्ता-
भिव्यक्तिस्थानां शेषस्पन्दसंकल्पादि सतात्वात् मध्यमां वाचमाह ।। —प्र०सा०तन्त्र टीका
द्वितीयोंऽशः ३३९
समस्त अभेद, भेदा-भेद एवं भेदात्मक शास्त्र तथा अवस्थायें प्रकाश में आती हैं
किन्तु आविर्भाव होने पर भी मध्यमा भूमि में ये अस्फुटावस्था में ही अवतीर्ण होते
हैं और वैखरी की भूमि पर वर्तमान रूप में शास्त्र का रूप धारण कर लेते हैं।
जिस प्रकार इच्छाशक्ति एवं वामाशक्ति के सामरस्य से ‘पश्यन्ती’ का
आविर्भाव होता है उसी प्रकार ज्ञानशक्ति एवं ज्येष्ठाशक्ति के सामरस्य से शृङ्गार-
रेखाकारा मध्यमा का आविर्भाव होता है—‘ज्येष्ठाशक्ति र्ज्ञानशक्तिर्यथा वामा
शक्तिरिच्छाशक्ति (सामरस्यमापन्ना सृष्ट्यात्मक शृङ्गार वामरेखासीत् तथा ज्येष्ठाशक्ति
रपि ज्ञानशक्ति सामरस्यमापन्ना)। ऋजुरेखामयी अत्र शृङ्गाटाग्रेरेखाकारा मध्यमा
वागुदीरिता ॥’१
वाक्चतुष्ट्य (वाग्देवता कुण्डलिनी)
↓
परा ———— पश्यन्ती ———— मध्यमा ———— वैखरी
(परावाक् में स्थित प्रकाशांश की ‘अम्बिका’ | हिरण्यगर्भ शब्द : ‘नाद’
है एवं विमर्शांश—‘शान्ता’ कही जाती है) | ‘मध्यमा’ = नादबिन्दुमयी-शा.ति.
‘मध्यमा’ = नादमयी-भास्कर
(मूलाधार से प्रथमोदित वाक : ‘मूलाधारात | ‘मध्यमा’ = बिन्दुमयी-पद्मपाद
प्रथम मुदितायश्च भावः पराख्यः ॥’ | ज्येष्ठा ज्ञानशक्ति
—शंकराचार्य) | ╲ ╱
मध्यमा
स्थूल पश्यन्ती | सूक्ष्म पश्यन्ती | पर पश्यन्ती | पश्यन्ती | महा पश्यन्ती | परम महा पश्यन्ती
(वर्णविभाग शून्य आलाप द्वारा आह्लादोत्पादिका एवं प्राथमिक नादस्वरूपा) | (जिज्ञासा-रूपा) | (परचिदात्मक एवं उपाधिशून्य) | (ग्राह्य ग्राहकगत अभिधानाभिधेयों का देशकालकृत क्रम यहाँ अस्फुट है) | (सदाशिव ईश्वरदशा) | (परावाक्)
मध्यमावाक्
सूक्ष्म (नवनादमयी, अश्रोत्रग्राह्य) | स्थूल (नववर्गात्मिका एवं भूतलिपि)
चिणि नाद | चिणि चिणि | घण्टा नाद | शंख नाद | तन्त्री नाद | ताल नाद | वेणु नाद | भेरी नाद | मृदंग नाद | ‘ज्ञानशक्ति’ का रूपान्तर ही पश्यन्ती है —आचार्य सोमानन्द
आचार्य पद्मपाद की दृष्टि में वाणी विभाग | ‘इच्छाशक्ति’ का रूपान्तर ही पश्यन्ती है —अभिनवभारती
सूक्ष्मा परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी
१. अमृतानन्द—‘दीपिका’ २. अभिनवगुप्त पादाचार्य
३. लक्ष्मीधर के अनुसार प्रकृति की परावाक् है—‘लक्ष्मीधरा’ तन्त्रमत में ‘प्रतिभा’
भी परावाक् का नामान्तर मानी गई है। परमेश्वर की विश्वरचना के प्रति अन्य निरपेक्षता
ही ‘प्रतिभा’ है। ‘परा’ स्वातन्त्र्य शक्ति का पर्याय है।
३४० वरिवस्यारहस्ये
“पश्यन्तीव न केवलमुत्तीर्णा नापि वैखरीव बहिः ।
स्फुटतरनिखिलावयवा वाग्रूपामध्यमा तयोरस्मात् ॥”
‘मध्यमा’ के अन्य भेद
स्थूल मध्यमा | सूक्ष्ममध्यमा | परमध्यमा
(मृदङ्गादि की ध्वनि के स्वरूप वाली) | (वादनेच्छानुसंधानरूपा एवं संवेदनात्मिका) | (जिगासा रूपात्मिका)
‘वैखरीवाक्’—अभिलाप (वर्णात्मक शब्द) रूपा है ।
‘कामकलाविलास’ की टीकानुसार—‘वैखरी’ अभिलापात्मिका है । यह
पंचदशाक्षर राशिमयी है । संपूर्ण वैदिक एवं लौकिक शब्दों की जननी है । ‘वैखरी
नाम अभिलापरूपिणी पंचदशाक्षर राशिमयी सर्ववैदिक लौकिकशब्दनात्मिका
शक्तिरुच्यते ॥
परावाक् (बीजात्मक, जन्मस्थानीय)
↓
पश्यन्तीवाक् (लतागुच्छरूपात्मिका वाक्)
↓
‘मध्यमावाक्’ (सौरभरूपात्मिका वाक्)
↓
‘वैखरीवाक्’ (अक्षमाला)
देवी के तीन रूप है—
स्थूलरूप (कर चरणादिरूपा) | सूक्ष्मरूप (मंत्ररूपा) | पररूप (वासनामय)
सूक्ष्म (पंचदशाक्षरी विद्या) | सूक्ष्मतर (कामकला) | सूक्ष्मतम (कुण्डलिनी)¹
‘वैखरीवाक्’—परावाक् रूप शब्दब्रह्म, हृदय से मुखपर्यन्त, वायु के द्वारा
कण्ठादि स्थानों में अभिव्यक्त होकर अकारादि वर्णरूप ग्रहण करके श्रोत्र ग्राह्य
१. भास्करराय—‘सौभाग्यभास्कर’