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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 530 में से

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पृष्ठ 426

३२४ वरिवस्यारहस्ये
से मदोन्मुख होकर पुनः उसी सुषुम्णामार्ग के द्वारा प्रत्यावृत होकर अपने मूलाधार
धाम में सोती है ।¹
कुण्डलिनी के रूप निम्न हैं—१. 'अग्निकुण्डलिनी' २. 'सूर्यकुण्डलिनी' ३.
'सोमकुण्डलिनी' ४. 'समष्टिकुण्डलिनी'
'त्रिकोण' एवं 'कुण्डलिनी'—
(१) वज्राख्या वक्त्रदेशे विलसति सततं कर्णिकामध्यसंस्थं ।
कोणंतत् त्रैपुराख्यं तडिदिव विलसत् कोमलं कामरूपम् ।।
कन्दर्प नाम वायुर्निवसति सततं तस्यं मध्ये समन्ताज् ।
जीवेशो बंधुजीव प्रकरमभिहसन् कोटिसूर्य प्रकाशः ।।²
(२) तन्मध्ये परमाऽतिकुशला सूक्ष्मातिसूक्ष्मापरा ।
नित्यानन्द परम्परातिविगलत पीयूषधारा धरा ।।
ब्रह्माण्डादिकटाहमेव सकल यदभासया भासते ।
सेयं श्रीपरमेश्वरी विजयते नित्य प्रबोधोदया ।।³
“मूलाधारस्थ कुल कुण्डलिनी एवं महामन्त्र” को आगे पृष्ठ ३२५ पर
दर्शाया गया है ।
साक्षाद्विद्यैवैषा न ततो भिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ।। १०७ ।।
(कुल कुण्डलिनी एवं श्रीविद्या का रहस्यार्थ)
यह कुण्डलिनी साक्षात् श्रीविद्या एवं (पराभट्टारिका महात्रिपुरसुन्दरी) जगन्माता
अभिन्न है । इससे कुण्डलिनी एवं श्रीविद्या से अपने को अभिन्न समझना ही
श्रीविद्या का 'रहस्यार्थ' है ।। १०७ ।।

  • प्रकाश *
    ईदृश्याः कुण्डलिन्या मातृविद्यायाः स्वस्य चाभेद इति रहस्यरूपोऽप्रकाश्योऽर्थ
    इत्यर्थः ।। १०७ ।।
  • सरोजिनी *
    'कुण्डलिनी साक्षात् श्रीविद्या है एवं साथ ही जगन्माता है ।' देवी भागवत
    पुराण में कहा गया है कि—महाकुण्डलिनी सच्चिदानन्दरूपिणी, प्राणाग्निहोत्र विद्या
    है दीपशिखा है—'महाकुण्डलिनी रूपे सच्चिदानन्दरूपिणी । प्राणाग्निहोत्र विद्ये ते
    नमो दीपशिखात्मिके ।। (स्कंध ४।अ०१५।१३) कुण्डलिनी परब्रह्म है—'ॐ नमस्ते
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    १. नित्यानन्द—'महिम्नस्तोत्र' २-३. षट्चक्रनिरूपण