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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 530 में से

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३३८ वरिवस्यारहस्ये
हैं। यह ऋजुरेखामयी वाक् विश्वस्थिति का अधिष्ठान एवं कारण है । 'महात्रिकोण'
में यह ऋजु रेखा का कार्य सम्पादन करती है ।
मध्यमावाक् को हिरण्यगर्भशब्द' या 'नाद' पद से भी अभिहित किया गया
है। वायु के सहकार से नाभि से हृदयपर्यन्त अभिव्यज्यमान एवं निश्चयात्मिका बुद्धि
से उपहित 'शब्दब्रह्म', विशेषस्पन्दात्मक' प्रकाशरूपात्मक एवं नादप्राण 'मध्यमावाक्'
पद वाच्य है । भास्करराय ने नव नादों की समष्टि को ही 'मध्यमा' का अभिधान
दिया है ।१ पद्मपादाचार्य ने इसे बिन्दुत्वमयी एवं हिरण्यगर्भरूपिणी संज्ञा दी है ।
'कामकलाविलास' में 'मध्यमा' के स्वरूप का निरूपण इस प्रकार किया गया
है—पराभूर्जन्य पश्यन्ती वल्लीगुच्छसमुद्‌भामध्यमा सौरभा वैखर्यक्षमाला जयत्यसौ ।।
अर्थात्—
१. 'परा' = बीजधारिका मूल भूमि है ।
२. 'पश्यन्ती' = उस बीजोत्पन्न वृक्ष का वल्लीगुच्छ है ।
३. 'मध्यमा' = उस पादप के पुष्पों का सौरभ है ।
४. 'वैखरी' = अक्षमाला है ।
'सौभाग्यभास्कर' में ठीक ही कहा गया है कि 'मध्यमा' का अन्य वाणियों से
यह भेद है कि न तो 'मध्यमा' पश्यन्ती की भाँति केवल 'उत्तीर्ण' है और न तो
वैखरी की भाँति बाह्यवर्ती है ।
“तदुक्त 'पश्यन्ती न केवलमुत्तीर्णा न वैखरी वहिः । स्फुटतर निखिलावयवा
वांग्रूपा मध्यमा तयोस्मात् ।।''
इस भूमि में समस्त शास्त्र नित्याविर्भूत हैं । इसका स्वल्प अंश वैखरीवाक् के
रूप में ऐन्द्रिय-विषय बनकर उपस्थित होता है किन्तु शेष ज्ञान, अवबोध एवं
रहस्यमय शास्त्र वाणी के ऊर्ध्व धरातलों पर ही रह जाते हैं । योगी एवं ज्ञानी
मध्यमा के स्तर पर आरूढ़ होकर शेष (अव्यक्त) ज्ञान प्राप्त किया करते हैं । इस
स्तर पर अनन्त एवं अपरिमेय ज्ञान-विज्ञान का रत्नाकर लहरें मार रहा है ।
मध्यमा के स्तर पर वाच्यार्थ वाच्य-वाचक स्वभाव से प्रकट हुआ करता है । किन्तु
यह उल्लासन प्रपंच के वेद्य-वेदक प्रथा से भिन्न है । इसी मध्यमा भूमि के स्तर पर
परमात्मा अपने स्वरूप को गुरु एवं शिष्य के रूप में विभाजित करके आत्मकल्पित
गुरुशिष्य भाव का आश्रय लेकर गुप्त ज्ञान का प्रकाशन किया करते हैं । इस तरह
'सदाशिव' नामक गुरु एवं 'ईश्वर' नामक शिष्य का प्रकटीकरण होता है ।
परमेश्वर गुरु या सदाशिव में पाँच शक्तियों (चित्, आनन्द, इच्छा, एवं क्रिया
नामक शक्तियाँ) को पाँच मुख रूप में प्रकट करते हैं । सदाशिव के पाँच मुखों से
१. अथ बाह्यान्तःकरणाद्यात्मिका हिरण्यगर्भरूपिणी बिन्दु तत्त्वमयी नाभ्यादिहृदयान्ता-
भिव्यक्तिस्थानां शेषस्पन्दसंकल्पादि सतात्वात् मध्यमां वाचमाह ।। —प्र०सा०तन्त्र टीका