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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 530 में से

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पृष्ठ 431

द्वितीयोऽंशः ३२९
'पश्यन्ती' स्फोट तत्व है—'स्फोट एव हि पश्यन्ती'१ 'पश्यन्ती' को पश्यन्ती
इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह इस स्तर पर आत्मा के द्वारा आत्मा को देखती
है—'स्वात्मानात्मानमथ चेत्पश्यन्ती सामविष्यति ॥'२
शिवाग्र योगीन्द्रज्ञानशिवाचार्य ने शैवपरिभाषा में अपने सिद्धान्तानुसार वाक्तत्व
का इस प्रकार निरूपण किया है— “अत्रशब्दवृत्तिश्चतुर्धा, सूक्ष्मापश्यन्ती मध्यमा
वैखरी चेति । तत्र ज्ञानैकाश्रया अर्थसामान्य प्रकाशिकावाणी 'सूक्ष्मा' । मयूराण्डरस-
वदविभक्तवर्णार्थविशेषबोधनाक्षमावाणी 'पश्यन्ती' ।” पौष्कर में 'पश्यन्ती' का स्वरूप
इस प्रकार निरूपित किया गया है—
“वर्णरूपानुसंधान विरहान्तः समुज्ज्वला ।
मयूराण्डरसो यद्वन्तर्विशेषार्थधारिका ।
पश्यन्ती वागियं ज्ञेया तृतीया शिवशासने ॥”३
तत्व की दृष्टि से पश्यन्तीवाक् का सम्बंध है—'शक्तितत्व' से है—
शिवतत्वविकारः शक्तितत्वम् । अत्रैव पश्यन्त्याख्याया वाग्वेत्तेः निवृत्यादिकलानां
चावस्थानम् ॥”४ इसी में निवृत्यादि कलाओं का अवस्थान है ।५ शिव-शक्ति से
अधिष्ठित होने के कारण इसे शक्तितत्वपद वाच्यता प्राप्त हुई है—
'अस्य च शिवशक्त्यधिष्ठानत्वेन शक्तितत्वपदवाच्यता ॥'६
लक्ष्मीधर ने 'सौन्दर्यलहरी' की टीका में 'परा' को गुणत्रय की साम्यावस्था
एवं 'पश्यन्ती' को वैषम्यावस्था का अभिधान दिया है—'एका परेति सत्व
रजस्तमोगुणसाम्यरूपा । तदन्या पश्यन्ती अन्यतरगुण वैषम्यरूपेत्यर्थः ॥'
पश्यन्तीवाक् के विविध स्वरूप—'पश्यन्ती' के तीन प्रकारों का निरूपण
किया गया है—
१. स्थूलापश्यन्ती—सप्तस्वरों के सम्मिलन या वर्गों के विभाजन से शून्य,
आलाप द्वारा सर्वातिशय आह्लाददायिनी प्रथमनादमात्र स्वभावा वाणी स्थूल पश्यन्ती
वाणी है—
'यत्र या स्वरसन्दर्भसुभगा नादरूपिणी ।
सा स्थूला खलुपश्यन्ती वर्णाद्यप्रविभागतः ॥'
२. सूक्ष्मापश्यन्ती—जिगासा का संधान ही सूक्ष्मा पश्यन्ती है ।
३. पर पश्यन्ती—परात्परचिद्रूपा, उपाधिशून्या पश्यन्ती का सूक्ष्मतम रूप ही
पर पश्यन्ती कहा जाता है ।

१. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।५८) २. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।६५)
३. पौ०बिन्दु०प० ४. शैवपरिभाषा
५-६. तत्रैव