वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती परा हि वाक् ॥१
सोमानन्दपाद का मत—काश्मीरीय शैवदर्शन के महान आचार्य एवं
प्रत्यभिज्ञादर्शन के प्रवर्तक आचार्य सोमानन्द शब्दाद्वैतवादियों के मत को अस्वीकार
करते हुए अनेक तर्कों के साथ यह भी तर्क प्रस्तुत करते हैं कि शास्त्रों में कहा
गया है कि—‘शब्दब्रह्म’ में निष्णातता प्राप्त करने के उपरान्त साधक परब्रह्म को
प्राप्त करता है ।१ (‘शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति’)—अतः अपने आप
सिद्ध हैं कि परावाक् या पश्यन्तीवाक् को शब्दब्रह्म स्वीकार कर लेने पर भी उससे
अतीत एवं भिन्न पद ‘परब्रह्मपद’ स्वीकार करना ही पड़ेगा अतः ‘पश्यन्तीवाक्’
परब्रह्म नहीं हो सकता ।
‘न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥’
‘पश्यन्तीवाक्’ ईश्वर तत्व है ! कारणबिन्दुरूप शब्दब्रह्म जब वायु से प्रेरित
होकर नाभिदेश में आकर विमर्शात्मक मन से युक्त होता है तब उसे सामान्य-
स्पन्दात्मक प्रकाशस्वरूप कार्यबिन्दात्मक ‘पश्यन्तीवाक्’ कहा जाता है—‘तदेव
नाभिपर्यन्तमागच्छता तेन पवनेनाभि व्यक्तं विमर्शरूपेण मनसा युक्तं सामान्यस्पन्द
प्रकाश रूपकार्य बिन्दुमयं सत्पश्यन्ती वागुच्यते ॥’२
मध्यमा माष (उड़द) की छीमी के समान क्रमात्मा होने पर भी एकत्वसंयुक्त
है जबकि पश्यन्ती वरधानिका (बीज) के सन्निभ है । तंत्र में पश्यन्ती का अपर
पर्याय ‘कार्यबिन्दु’ है ।
प्रकाश एवं विमर्श की दृष्टि से विचार करने पर—पश्यन्तीवाक् में स्थित
प्रकाशांश ‘वामाशक्ति’ एवं विमर्शांश ‘इच्छाशक्ति’ कहलाता है । योगिनीहृदयकार ने
कहा है कि बीजमावस्थित विश्व को पराशक्ति जब स्फुटीकृत करना चाहती है तब,
उसमें विश्व का वमन करने की इच्छा होने के कारण, उसे ‘वामा’ कहा जाता है
और वह अंकुशाकार में परिणत हो जाती है । इसके उपरान्त इच्छाशक्ति द्वारा वह
अपने को देखती है और उसका आत्मईक्षरम ‘पश्यन्ती’ कहा जाता है—
बीजभावस्थितं विश्व स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी । वामा विश्वस्य वमना दंकुशाकारतां
गता । इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुष स्थिता ॥
राजानक जयरथ ने तंत्रालोक की अपनी टीका में कहा है कि परमेश्वरी ‘परा’
ही अपने स्वातंत्र्य से जब बाह्यरूपों की उन्मिषित ‘वामा’ एवं इच्छाशक्ति में साम्य
से जिस बिन्दु का आविर्भाव होता है उसका अभिधान है—‘पश्यन्तीवाक्’ ॥ वाक्
तत्व का पश्यन्ती रूप वाक् की वह अवस्था है जो ग्राह्य-ग्राहकविभाग क्रमरहित
तथा अविभागा है एवं देश कालक्रम संहारवती है ।३
१. सोमानन्दपाद—‘शिवदृष्टि’ (२।२) २. सौभाग्यभास्कर
३. सोमानन्दपाद—‘शिवदृष्टि’ (२।११)