वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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परावाक् के अनन्तर वाच्यवाचकात्मक विश्वविकास की जो द्वितीय कोटि है
वहीं है 'पश्यन्ती'। यह अपने में समस्त विश्व को देखती है तथा अन्तः और
बाह्यकरणों के मार्ग से उत्तीर्ण है अतः इसे 'पश्यन्ती' और उत्तीर्ण कहते हैं -
'पश्यंति सर्व स्वात्मनि करणानां सरणिमपि यदुत्तीर्णा ।
तेनेयं पश्यन्तीत्युत्तीर्णेत्यप्युदीर्यते माता ।।'१
'पश्यन्ती' के स्तर पर असामान्य आन्तरभाव का उदय होता है जिसमें
प्रत्यवमर्शनकारी आत्मा वाच्यार्थ के परामर्श की दिशा में अर्थ को अहंभाव से
आच्छादित करके उसे अभिव्यंजित करती है । मध्यमा भूमि में अर्थ 'इदं' रूप में
प्रतीत होता है और साथ ही यह वाच्य एवं शब्द से पृथक् अवस्था में वाचक रूप
में प्रकट होता है । इसी स्तर पर समस्त शास्त्र वाचक शब्द का आश्रय लेकर
उदित होते हैं । और स्वयं आत्मा ही १. वक्ता एवं गुरु तथा २. श्रोता एवं शिष्य
के रूप में प्रकट होती है । पश्यन्ती भूमिपरा की भाँति वाच्य-वाचक विभाग से
शून्य है तथा इस भूमि में उपदेष्टा एवं उपदेश्य में कोई भेद नहीं रहा करता ।
परमेश्वर की पाँच शक्तियों में से आद्या परमा शक्ति "इच्छाशक्ति" ही पश्यन्ती
के रूप में शरीर धारण करती है—'इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा
स्थिता ।।'२ इच्छाशक्ति वामाशक्ति के साथ सामरस्य प्राप्त करके पश्यन्ती के रूप
में प्रकट होती है—'इच्छाशक्तिर्वामाशक्तिसामरस्यमापन्ना पश्यन्ती रूपेण स्थिता ।।'३
मध्यमावाक्— 'मध्यमा' शब्द का अर्थ है दो प्रान्तों का मध्यवर्ती । चूँकि
मध्यमा के एक प्रान्त में दिव्य पश्यन्तीवाक् स्थित है और दूसरे प्रान्त में पाशव
वैखरीवाक् और इन दोनों के मध्य सेतुस्वरूप मध्यमावाक् स्थित है इसीलिए इसको
'मध्यमा' कहते हैं । पशुभाव से दिव्यभाव में यात्रा करने का मार्ग 'मध्यमा' ही है ।
जहाँ 'वैखरी' वाक् में चैतन्य का आलोक आवृत रहता है वहीं मध्यमा वाक् में
प्रस्फुट रहता है । चैतन्यालोक की रश्मियाँ नादरूपी सूत्र का आश्रय लेकर निःसीम
व्योम में व्याप्त रहती है । 'मध्यमा' में वैखरी की भाँति व्यक्तता तथा परा की
भाँति अव्यक्तता दोनों नहीं है प्रत्युत् उसमें व्यक्तता एवं अव्यक्तता दोनों स्थित हैं ।
'वैखरी' वाक् में चिद्भाव गुप्त रहता है इसीलिए इस भूमि के वर्णों को मंत्रमयता
प्राप्त नहीं है किन्तु इसके विपरीत मध्यमा चिद्रश्मिभव होने के कारण मंत्र भूमि
है । 'वैखरी' भूमि में लक्ष्य नीचे मूलाधार की ओर (या बाहर की ओर) रहता है
जबकि 'मध्यमा' में लक्ष्य ऊपर गुरुधाम या सहस्रार की ओर होता है । मध्यमा
मंत्रमयी भूमि है क्योंकि मध्यमा वाक् मंत्ररूप में ही प्रस्तुत होती है । इसी स्थान
से मनःशोधन एवं उसके माध्यम से विज्ञान के द्वार का उद्घाटन संभव हो पाता
है । चूँकि वैखरी भूमि में चिदंश आच्छन्नप्राय रहता है अतः इस भूमि में मनोमय,
प्राणमय एवं अन्नमय इन तीनों कोशों की ओर आकर्षण रहता है । मध्यमा में
१. सौभाग्यभास्कर २. योगिनीहृदय
३. अमृतानन्द—'दीपिका'