वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः ३२३
२. क्रमेणानेन सृजति कुण्डलिनी वर्णमालिकाम् । (शा०ति०)
अकारादि सकारान्तां द्वि चत्वारिंशदात्मिकाम् ॥ ११० ॥१
पंचाशद्वार गुणितां पंचाशद्वर्ण मालिकाम् ।
सूतेऽतद्वर्णताऽभिन्ना कला रुद्रादिकान् क्रमात् ॥ (शा०ति०)
२. 'कुलीन कुण्डलिनी' = पृथ्वीतत्व में लयीभूत कुण्डलिनी । कु = पृथ्वी
तत्त्व में । 'लीन' = लयीभूत ॥ भूतत्वस्थिता कुण्डलिनी ।
३. 'प्रवाहयन्ती सुधापूरम्'—अमृतप्रवाह को प्रवाहित करने वाली 'नित्यानन्द-
परम्परातिविगलत्पीयूषधाराधरा ॥ (ष०च०नि०)
४. 'तपन शशि दहन कलाभिः'—सूर्य-चन्द्र-अग्नि की कलाओं से ।
कुण्डलिनी सूर्यचन्द्राग्निरूपा है—'गुणयुक्ता कुण्डलिनी चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी ॥"
(मातृकाभेद तंत्र)
कुण्डलिनी वाणी की देवी है—'वाग्देवी बीजसंज्ञका' (शिव संहिता)
'बिसतन्वी तडिदाभा'—कमल नाल के तन्तु के समान सूक्ष्म एवं विद्युत के
समान प्रकाश वाली—'तस्योर्ध्वे बिसतन्तु सोदर लसत् सूक्ष्मा जगन्मोहिनी' 'नवीन
चपलामालाविलासास्पदा ।।' (षट्चक्र निरूपण)
'कुलीन कुण्डलिनी'—'क' पृथ्वी तत्त्व । 'कु' = पृथ्वी तत्त्व में अर्थात्
पृथिवीतत्त्व प्रधान चक्र 'मूलाधारचक्र' में लयीभूत कुण्डलिनी शक्ति ।। कुण्डलिनी
जगत् की योनि है, वह तुटिस्वरूपा एवं सर्वप्राणप्रेरिका, जीवभूता । बीजमयी एवं
चिद्रूपिणी है—'या सा कुण्डलिनी सात्र जगद्योनिः प्रकीर्तिता । तुटिरूपा तु सा ज्ञेया
जीवभूता जगत्यपि । बीजरूपा समाख्याता चिद्रूपापि प्रकीर्तिता ॥'२ यह ५० वर्णों
से अभिन्न, बिसतन्तु तनीयसी, तडित्कोटिप्रख्या कुण्डलिनी मूलाधारपद्म में स्थित
शृङ्गार से मूलाधार की कर्णिका में विद्यमान शृङ्गार से त्रिकोण के ऊपर सार्ध
त्रिवलय आकार द्वारा अधोमुखी होकर स्थित योगमार्ग के द्वारा योगियों की साधना
में ऊर्ध्वस्तर पर उत्थापित की जाती है । यह मूलाधार, अनाहत एवं आज्ञाचक्रों में
विद्यमान वह्नि, सूर्य एवं चन्द्र मण्डलों का वेधन करती है ।३
'व्योमनि'—
'द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं कपालोर्ध्वावसानकम् ।
द्व्यङ्गुलोर्ध्वं शिरोदेशं परं व्योम प्रकीर्तितम् ॥'
इस लक्षण वाले व्योम में विद्यमान चिच्छशिमण्डल के अधोमुख सहस्रार
कर्णिका के मध्य स्थित अकुल के साथ कुण्डलिनी मिलकर एवं फिर अमृत का
स्राव करके डाकिनी आदि मण्डलों को आप्लावित करती हुई स्वयं भी उसके ताप
१. षट्चक्रनिरूपण २. तन्त्रालोक—'विवेक' टीका
३. भास्करराय—'प्रकाश'