वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 437, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽंशः ३३५
तात्त्विक दृष्टि से वाग्विभाजन—तात्त्विक दृष्टि से मध्यमावाक् का सम्बंध
'सदाशिव तत्व' है—
“शक्तितत्व विकारः सदाशिव तत्वम् । इदमेव मध्यमाभिधानाया वाण्या
अधिष्ठानम् ॥”१ कामिक आदि तंत्र भेद के कारणों प्रणवादिकों, सामीप्य आदि
मुक्ति प्राप्त लोगों एवं उनके भुवनादिक का यही कारण है ।२
अभिनवगुप्तपाद ने 'तंत्रालोक' में मध्यमा के अनेक भेदों का वर्णन किया
है—
'मध्यमा' के विभिन्न भेद—अभिनवगुप्त ने मध्यमा के तीन भेद किये हैं—
१. 'स्थूलमध्यमा' २. 'सूक्ष्ममध्यमा' ३. 'परमध्यमा'
१. स्थूलमध्यमा—अभिनवगुप्त इसका स्वरूपोद्घाटन करते हुए कहते हैं—
'यत्तु चर्मावनद्धादि किंचित्तयत्रैव यो ध्वनिः । स स्फुटास्फुटरूपत्वान्मध्यमा
स्थूलरूपिणी ॥'३
चमड़े से मढ़े हुए मृदङ्ग आदि को बजाने पर जो ध्वनि निकलती
है उसे स्थूल मध्यमा के सदृश समझना चाहिए । यह ध्वनि पश्यन्ती को
सूक्ष्मता की तुलना में अधिक स्फुट होती है किन्तु वर्णादि विभाग के न
होने से अस्फुट भी होती है । दो वाकों के मध्य में होने से ही 'मध्यमा'
कहा जाता हैं । यह स्थूल इसलिए होती है क्योंकि यह लोक श्रव्य होती
है ।
२. सूक्ष्ममध्यमा—बजाने की इच्छा के अनुसंधान का अभिधान ही सूक्ष्म
मध्यमा है जो कि संवेदनात्मक मात्र होती है ।
३. परमध्यमा—वाद्य बजाने की इच्छारहित चिदात्मक स्वरूप ही परमध्यमा
है ।
'महाभारत' के आश्वमेधिक पर्व में 'मध्यमा' का स्वरूप—इस प्रकार
निरूपित किया गया है—'केवलं बुद्ध्युपादान क्रमस्वरूपानुपातिनी । प्राणवृत्तिमतिक्रम्य
मध्यमा वाक् प्रवर्तते ॥' अर्थात् बुद्धि जिसका उपादान है । क्रमरूपात्मक, प्राणवृत्ति
से अतीत होकर मध्यमावाक् प्रवृत्त होता है ।”
भर्तृहरि की व्याख्यानुसार मध्यमा का स्वरूप इस प्रकार है—अन्तःसन्निवेश
-संयुक्त, क्रम न होने पर भी क्रम को ग्रहण किए हुए के समान, बुद्धि मात्र
उपादान वाली, सूक्ष्म प्राणवृत्ति के पीछे रहने वाली, वाणी ही मध्यमा वाणी है—
“मध्यमास्वन्तः सन्निवेशिनी परिगृहीतक्रमेव बुद्धिमात्रोपादान सूक्ष्मप्राणवृत्त्यनुगता ॥”
ईश्वर प्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी में मध्यमा के स्वरूप का निरूपण इस प्रकार
किया गया है—“अन्तःकरणं मनो बुद्धयहङ्कारलक्षणं मध्यभूमौ पुर्यष्टकात्मनि प्राणाधारे
१-२. शैवपरिभाषा ३. तन्त्रालोक (तृ०आ०)