वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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‘अस्मिन् स्थूलत्रये यत्तदनुसन्धानमादिवात् । पृथक्-पृथक् तत्रितयं सूक्ष्ममित्य-
भिधीयते । षडजं करोमि मधुरं वादयामि ब्रुवे वचः । पृथगेवानुसंधानत्रयं संवेद्यते
किल । एतस्यापि त्रय स्याद्यं यद्रूप मनुपाधिमत् । तत्परं त्रितयं तत्र शिवः
परचिदात्मकः ।।’
१. अभिनवगुप्त की दृष्टि के अनुसार पश्यन्ती के निम्न भेद हैं—
(क) पश्यन्ती (ख) महापश्यन्ती (ग) परममहापश्यन्ती
(क) ‘पश्यन्ती’ = ‘गृहात् निःसराभि’ आदि परामर्श, माया प्रमाता (जीव) ।
(ख) ‘महापश्यन्ती’ = सदाशिव एवं ईश्वर की दशा ।
(ग) परममहापश्यन्ती = परावाक् ।।
‘पश्यन्तीवाक्’ में ग्राह्य-ग्राहकगत देशकालक्रम स्फुटभाव से नहीं रहता क्योंकि
पश्यन्ती वाक् में निर्विकल्पात्मक विमर्श हुआ करता है । इसे प्रतिसंहृतक्रम’
इसलिए कहते हैं क्योंकि ग्राह्यग्राहकोत्पन्न क्रम पश्यन्ती में अस्फुट एवं लीन दशा
में रहता है । और क्योंकि वह स्वयमेव अक्रमात्मिका है अतः वह अन्तर्लीन एवं
अविभागात्मक क्रम को आवृत्त करके स्थित है । इसे ‘सूक्ष्म’ इसलिए कहा जाता है
क्योंकि—
२. वाक्यपदीयकार भर्तृहरि और पश्यन्ती के विविध रूप—
आचार्य भर्तृहरि अपनी ‘स्वोपज्ञ’ नामक टीका में पश्यंती के विविधात्मक
स्वरूपों का विवेचन किया है । वाक्यपदीयकार ने ‘परं तु पश्यन्तीरूपमनपभ्रंशम-
सङ्कीर्ण लोकव्यवहारातीतम्’ कहकर जहाँ अनपभ्रंश, असङ्कीर्ण, लोकव्यवहारातीत
‘परपश्यन्ती’ का उल्लेख किया है वहीं ‘चलाचला, आवृता, सन्निविष्टज्ञेयाकारा,
परिच्छिन्नार्थप्रत्यवभासा, संसृष्टार्थप्रत्यवभासा, प्रतिलब्धसमाधाना, विशुद्धा,
प्रतिलीनाकारा, निराकारा, प्रशान्त सर्वार्थप्रत्यवभासा आदि विशेषणों के द्वारा पश्यन्ती
के विभिन्न स्वरूपों की ओर भी सङ्केत किया है ।
आचार्य भास्करराय ‘ईक्षण’, ‘काम’, ‘तप’, एवं विचिकीर्षा' आदि शब्दों को
समानार्थक मानते हुए पश्यन्ती को इन्हीं का स्वरूप मानते है । राजानक जयरथ ने
‘तन्त्रालोक’ की टीका में कहा है कि परापरमेश्वरी जब स्वातंत्र्य शक्ति द्वारा बाह्य
रूपों को उन्मिषित करना चाहती है—अभिव्यक्त करना चाहती है तब उसकी
आख्या ‘पश्यन्ती’ होती है । उस समय वाच्यवाचकता का क्रम नहीं रहता तथा
चित्शक्ति के प्रकाश के प्राधान्य के के कारण वह द्रष्टा रूप में स्थित रहती है ।
“सैव हि परमेश्वरी स्वस्वातंत्र्यात् बहिरूपतामुल्लिलासयिषुर्व्याच्यवाचक क्रमानुदया
द्विभागस्यास्फुटत्वाच्चि ज्योतिष एवं प्राधान्यात् द्रष्टृरूपतया पश्यन्तीति शब्द-
व्यपदेश्या ।’’
‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ वाक्यांश में ईक्षण शब्द को आचार्य भास्करराय ने
‘काम’ ‘तप’ ‘विचिकीर्षा’ आदि का अपर पर्याय स्वीकार किया है अतः इस