वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः ३२१
सहस्रार में शिव 'शून्य' रूप एवं कोटि विद्युतसमा कुण्डलिनी इन्दुरूपा है और
'परमकुण्डली' कही जाती है ।१
यह नादरूपा, योनिरूपा एवं सनातनी शक्ति है ।२ यह हुङ्कार शब्द से उत्पन्न
होती है ।३ 'परदेवता', 'कुण्डली', 'महादेवी' के नाम वाली यह 'रूपवती' देवी
अपने मुखारविन्द के परिमल से शिव को प्रसन्न कर देती है एवं शिव के ऊपर
निवास करती हुई क्षणभर के लिए उन्हीं सदाशिव के साथ रमण करती है जिससे
कि उसी क्षण लाखारस के समान रङ्ग वाला अमृत क्षरित होता है । वह शिव के
ऊपर लेटकर उनके मुख का चुम्बन भी लेती है । जो लाखारस क्षरित होता है
उसी अमृत से परदेवता एक षट्चक्रों के देवों को सन्तृप्त करना चाहिए । पिण्ड
ही कुण्डलिनी है । स्वयंभूलिङ्ग के साथ रमण करने वाली इस कुल शक्ति को
मूलाधार से सहस्रार में लाना चाहिए और वहाँ उसे शंभु के साथ एकीकृत
(अभिन्न) रूप में देखकर एवं पीनोन्नत पयोधरा, षोडशवर्षीया, नवयुवती,
सर्वाभरणभूषिता, पूर्णचन्द्रनिभा, नानारत्नयुता, नूपुर शोभिता, कन्दर्पकोटिलावण्या,
रक्तकङ्कणमण्डिता, किंकिणी-शोभिता, मधुर-हासिनी कामिनी के रूप में कल्पित
करना चाहिए ।४
स्वायंभुवलिङ्ग के मध्य में अग्निरूप महान तेज स्थित है । वायुयोग के संपर्क
से यही अग्नि ब्रह्माण्ड में प्रज्वलित होती है । इसलिए वह कुण्डलिनी देवी इस
छिद्र को संछादित करके स्थित है—'लिङ्गच्छिद्रं समाकृष्य संस्थिता कुण्डली कथं?
(तोडल०) 'पृथ्वीचक्रस्य मध्ये तु स्वयंभूलिङ्गमद्भुतं । सार्द्धत्रिवलयाकार कुण्डल्या
वेष्टितं सदा । लिङ्गच्छिद्रं स्ववक्त्रेण कुण्डल्याच्छाद्य संस्थिता ।।' (तो० तं०) शक्ति
के पाँच रूप हैं—१. निजा २. परा ३. अपरा ४. सूक्ष्मा ५. कुण्डली । 'निजा
पराऽपरा सूक्ष्मा कुण्डलीतासु पंचधाशक्तिचक्रक्रमेणैव जातः पिण्डः परः शिवे ।।
(सि०सि०सं०) कुण्डलिनी 'प्रकृति' है—'प्रकृतिः कुण्डलिनीनित्यालिङ्गमाश्रिता
संस्थिता' कुण्डलिनी 'चित्कला' है—'तमो रजस्सत्त्वसाम्यावस्थेयं चित्कलास्मृता' ।
कुण्डलिनी की तीन अवस्थायें हैं—१. 'कुमारी' २. 'योषित' ३. 'पतिव्रता' ।।
'द्वादश-षोडश-दशाभिस्तपन-शशि-दहन कलाभिः'
सूर्य की बारह, चन्द्रमा की सोलह एवं अग्नि की दस कलाओं द्वारा ।। सूर्य
१. कुब्जिका तन्त्र—'शून्य रूपं शिवं साक्षादिन्दुं परम कुण्डलीम् ।'
२. यामल—'नादरूपेण सा देवी योनिरूपा सनातनी ।'
३. गंधर्वमालिका—'हुंकार वर्ण संभूता कुण्डली परदेवता ।'
४. शाक्तानन्द तरंगिणी—"ध्यायेत कुण्डलिनी तत्र इष्टदेवस्वरूपिणीम् । सदा
षोडशवर्षीयां पीनोन्नतपयोधराम् । नवयौवन सम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् । मुखारबिन्दगन्धेन
मोदितं परमं शिवम् । प्रबोध्य परमेशानि पत्रोपरि वसेत् प्रिये ।। शिवस्य मुखपद्म पद्मं हि
चुचुम्बे कुण्डली शिवे । अमृतं जायते देवि तत्क्षणात् परमेश्वरि ।। तद्भवमृतं देवि !
लाखारसमोपमम् ।।"
२१ वरि.