वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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विश्रान्तं या विमर्शशक्ति प्रेरयति सा मध्यमा वाक् ॥'' अर्थात् पुर्यष्टक युक्त
प्राणशक्ति की आश्रयभूता सुषुम्नानाड़ी में विश्रांति-प्राप्त मन, बुद्धि अहङ्कार युक्त
अन्तःकरण को जो विमर्श शक्ति प्रेरित करती है उसे 'मध्यमावाक्' कहते हैं ।
विमर्शिनीकार आगे कहते हैं कि उससे प्रेरित होकर अन्तःकरण चतुष्टय, सङ्कल्पन
निश्चयीकरण, अभिमनन एवं विकल्पन रूप कार्यों में प्रवृत्त होता है और उस समय
जब वह विमर्शमयी वाणी सङ्कल्पपूर्ण ग्राह्य एवं सङ्कल्पयितृ रूप ग्राहक एवं "मैं
चैत्र, घट की कल्पना कर रहा हूँ, आदिवाचक शब्दों के साथ भेदपूर्ण, स्फुटक्रम
से उपरुक्त होती है तब चिन्तन शब्दवाच्य वह ज्ञानशक्ति एवं मध्यमावाक् कही
जाती है ।
'कामकलाविलास' की दृष्टि में मध्यमा और उसका स्वरूप निम्नानुसार
है—'मध्यमा' के दो भेद हैं—१. सूक्ष्म, २, स्थूल । “द्विविद्या मध्यमा सा सूक्ष्म-
स्थूलाकृतिः स्थिता सूक्ष्मा । नवनादमयी स्थूला नववर्गात्मो च भूतलिप्यात्मा ।
आद्याकारणमन्याकार्य त्वनयोर्यत्तस्ततो हेतोः । सैवेयं नहि भेदस्तादात्म्यं हेतु
हेतुमदभीष्टम् ॥” (२७-२८) । सारांश यह कि—
१. मध्यमा के भेद हैं—(क) स्थूल (ख) सूक्ष्म ।
२. सूक्ष्मरूप में वह नित्या एवं नवनादमयी है ।
३. स्थूलरूप में वह भूतलिप्यात्मक एवं वर्णों का नववर्ग है ।
४. सूक्ष्म मध्यमा कारण है एवं स्थूल मध्यमा कार्य है ।
५. स्थूल (कारणरूपा) एवं सूक्ष्म (कार्यरूपा) मध्यमा से स्वरूपतः कोई भेद
नहीं है ।
'सूक्ष्मामध्यमा'—नवनादगर्भा है । नौ नाद निम्नांकित हैं—चिणि, चिणिचिणी,
घण्टानाद, शङ्खनाद, तंत्रीनाद, तालनाद, वेणुनाद, भेरीनाद, मृदङ्गनाद (हंसोपनिषद)।
—इन नादों को केवल समाधि द्वारा ही सुना जा सकता है—“तत्र सूक्ष्मा
समाधिबलेन अनुभूयमाना ॥'८ (का०)
'स्वच्छन्दतंत्र' के अनुसार नाद ८ हैं जो निम्न हैं घोष, राव, स्वन, शब्द,
स्फोट, ध्वनि, झाङ्कार ध्वंकृतिः—
'अष्टधा सतु देवेश व्यक्तः शब्दप्रभेदतः । घोषो रावः स्वनः शब्दः स्फोटाख्यो
ध्वनिरेव च । झाङ्कारो ध्वंकृतश्चैव अष्टौ शब्दाः प्रकीर्तिता । नवमस्तु महाशब्दः सर्वेषां
व्यापकः स्मृतः ॥'१
ये आठ नाद उस नवम नाद के प्रकार हैं जो कि व्यापक रूप से सर्वत्र
प्रसरणशील है । इनमें 'घोष' कान एवं उँगली के संयोग से उद्दीप्त वह्निजन्य शब्द
सदृश है । काँसे के टूटने से उत्पन्न रूक्ष शब्द जैसा शब्द 'राव' है । बाँस की
१. स्वच्छन्दतन्त्र (११ पटल)