वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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ध्वनि के सदृश एवं वातशून्यप्रदेश में होने वाली सौम्यवर्षा के सदृश ध्वनि ही
‘स्वन’ है । व्योम में भ्रमरी की ध्वनि के सदृश एवं सम्पूर्ण शब्दों की जन्मभूमि
रूप नाद ‘शब्द’ है । वाक्य को स्फुट रूप से सूचित करने वाला, वर्णभेद का
अवभासक नाद ही ‘स्फोट’ है । वीणा के पाँचवें तार से निःसृत ध्वनि के समान
‘ध्वनि’ है । वीणा के समस्त तारों के निनादित होने पर होने वाले ध्वनि के सदृश
ध्वनि-‘झाङ्कार’ है । आकाशारूढ़ मेघों की ध्वनि के सदृश घण्टानाद का अनुगमन
करने वाली ध्वनि ‘ध्वंकृति’ है । इन्हीं नादों से युक्त मध्यमा ‘सूक्ष्मामध्यमा’ कही
जाती है ।
स्थूल मध्यमा नववर्गात्मिका है । उपर्युक्त नव नादों द्वारा ही सूक्ष्म अ, क,
च, ट, त, प, य, श, ल के रूप में वर्तमान नववर्ग से युक्त मध्यमा
‘स्थूलमध्यमा’ कहलाती है । ये नववर्ग नव नादों से उद्भूत हुए हैं ।
पद्मपादाचार्य की दृष्टि में ‘मध्यमा’ और उसका स्वरूप—आचार्य पद्मपाद की
व्याख्यानुसार मध्यमा का स्वरूप इस प्रकार है—
१. यह बाह्य अन्तःकरण आदि से युक्त है ।
२. यह हिरण्यगर्भरूपात्मक है एवं बिन्दुतत्वमय है ।
३. नाभि से लेकर हृदयपर्यन्त स्थान में अभिव्यक्त ।
४. विशेष स्पंद सङ्कल्पादिरूपात्मक ।।
५. परिभाषा—‘मध्ये मा बुद्धिर्यस्याः सा मध्यमा’ ।¹
१. भास्करराय एवं पद्मपाद के विचारों में मतभेद—भास्करराय के मत में
‘मध्यमा’ नादमयी है—‘‘अथतदेव शब्दब्रह्म तेनैव वायुना हृदयपर्यन्त भ्रमि व्यज्यमानं
निश्चयात्मिकया बुद्ध्या युक्तं विशेष स्पन्द प्रकाशरूप नादमयं सन्मध्यमा
वागित्युच्यते ।।’’²
२. पद्मादाचार्य के मत में ‘मध्यमा’ बिन्दुमयी है—प्रपंचसार० प्रथम
पटल ४३ श्लोक में कहा गया है—‘स बिन्दुनाद बीजत्वभेदेन च निगद्यते’’ । इस
कथन के साथ मध्यमा को ‘बिन्दुमयी’ मात्र कहना आत्मविरोधी कथन है । राघव
भट्ट के मतानुसार मध्यमा ‘नादबिन्दुमयी’ है । राघवभट्ट द्वारा उद्धृतांश में कहा
गया है कि मध्यमा ‘नादरूपिणी’ है—‘सैब हृत्पङ्कजं प्राप्य मध्यमा नादरूपिणी ।
पद्मपादाचार्य ने ‘मध्यमा’ को बिन्दुरूपात्मक एवं ‘पश्यन्ती’ को नादात्मक भी कहा
है । वस्तुतः ‘बिन्दु’ ‘पश्यन्ती’ का एवं ‘नाद’ मध्यमा का सङ्केतक है ।
नित्याषोडशिकार्णव में मध्यमा के स्वरूप का निरूपण इस प्रकार किया गया
है—‘ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमा वागुदीरिता ऋजुरेखामयी विश्वस्थितौ प्रथित-
विग्रहा ।।’ सारांश यह कि ‘ज्ञानशक्ति’ एवं ‘ज्येष्ठा’ मध्यमावाक् के मूल उपादान
१. प्र०सा०तं०वि० २. सौभाग्यभास्कर (पृ०९९)
२२ वरि.