वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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की 'तापिनी' आदि, चन्द्रमा की 'अमृता' आदि एवं अग्नि की 'धूम्रार्चिरादि' कलायें
हैं ।
१. सूर्य की १२ कलाओं का ककारादि १२ अक्षरों से सम्बंध है ।
२. चन्द्र की १६ कलाओं का १६ स्वरों से सम्बंध है ।
३. अग्नि की १० कलाओं का यकारादि १० वर्णों से सम्बंध है ।
'कुण्डलिनी' 'पंचाशद्भिर्वर्णैरभिन्न देहा' इसलिए कही गई है क्योंकि वह
मातृकारूपिणी है ।
मंत्र के ३ खण्ड हैं—
१. 'सूर्यखण्ड'— क से म पर्यन्त वर्णों का द्योतक है ।
२. 'सोमखण्ड'— समस्त स्वरों का द्योतक है ।
३. अग्निखण्ड'— मंत्र का अग्नि खण्ड—य, र, ल, व, श, ष, स,
का द्योतक है ।
४. 'बैन्दवखण्ड'— मंत्र का बैन्दवखण्ड—यह 'क्ष' का द्योतक है । इस
प्रकार समस्त मातृकाएँ पंचदशी मंत्र के एवं
कुण्डलिनी के रूप हैं ।
भगवती का त्रिखण्डात्मक रूप
| खण्ड | मंत्र का भाग | यंत्र का भाग | छःकमल | कुण्डलिनी |
|---|---|---|---|---|
| सोम | शक्तिकूट | शिव के<br>चार चक्र | आज्ञा तथा<br>विशुद्ध | सोमकुण्डलिनी |
| सूर्य | कामकूट | चतुर्दशार तथा<br>बहिर्दशार | हृदय एवं<br>मणिपूर | सूर्यकुण्डलिनी |
| अग्नि | वाग्भवकूट | अन्तर्दशार,<br>अष्टार एवं बिन्दु<br>सहित त्रिकोण | स्वाधिष्ठान<br>एवं मूलाधार | अग्निकुण्डलिनी |
| १. वाग्भवकूट | आग्नेय खण्ड | भगवती का मुख । |
|---|---|---|
| २. कामकूट | सौर खण्ड | भगवती का कण्ठ से कटिपर्यन्त देह । |
| ३. शक्तिकूट | चान्द्र खण्ड | भगवती का कटि से नीचे का देह । |
'अभिन्नवर्णैरभिन्नदेहा'—कुण्डलिनी देवी वर्णात्मिका है—
१. सा प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः । (शारदातिलक)