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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 530 में से

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द्वितीयोऽंशः ३२५
मूलाधारस्थ कुल कुण्डलिनी एवं महामन्त्र
'शब्दब्रह्मणि निष्णातः
परब्रह्माधिगच्छति ।'
'परब्रह्म' : 'महाबिन्दु'
(अतितुर्य 'परप्रणव')
संहारक्रम ↑ शब्दब्रह्म ↓ सृष्टिक्रम
'अपरप्रणव' शब्दब्रह्म
शब्दब्रह्म (तुर्य) (तुर्य)
ॐ
(शब्दब्रह्म) अधोमुख स्वयंभूलिङ्ग
(मूल महाप्रकृति) मूलाधार पद्म की कर्णिका के गह्वर में स्थित कुण्डलिनी
परमाकला का निलय (तन्मध्ये परमाकला)
परावाक्
परब्रह्म
(शब्दातीत)
पश्यन्ती (अतितुर्य)
वाक् 'कंदर्पवायु'
का स्थान ↓
त्रिकोण
मध्यमा
वाक् चित्शक्ति
परावाक्
(शब्दब्रह्म)
त्रिकोण योनि
वैखरी ↓
वाक् 'वज्रा' के अधोभाग पर पश्यन्ती
में पद्म कर्णिका के
↓ मध्य में त्रिपुरसुन्दरी सूक्ष्म पश्यन्ती
का अधिष्ठानरूप
'त्रिकोण' =
'त्रैपुरकोण'
अन्तर्मातृका बहिर्मातृका मदनागार स्थूल पश्यन्ती
(सूक्ष्मवर्णमाला) (स्थूलवर्णमाला) योनिरूप त्रिकोण