वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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नादात्मक चिद्रश्मि नित्य विद्यमान रहती है जबकि वैखरी में नहीं ।
स्थूलसृष्टि के आदि में 'मध्यमा' शब्द ही प्रकट होता है । उस समय उसका
कोई बाह्य अर्थ नहीं होता । 'मध्यमा' शब्द वह मानसिक गति है जो किसी वस्तु
की धारणा बनाती है । मध्यमा अर्थ स्थूल बाह्य वस्तु की मानसिक छाप है ।
मध्यमा शब्द और मध्यमा अर्थ, ज्ञाता और ज्ञेय (ग्राहक एवं ग्राह्य) रूप में सूक्ष्म
शरीर के विषय है । मध्यमा वाक् एवं उसका अर्थ, दोनों सूक्ष्म हैं और ये सूक्ष्म
(लिङ्ग) शरीर से सम्बद्ध हैं । किसी अर्थ-ग्रहण करने की क्रिया में मन दो कार्य
किया करता है ।
१. मन का एक अंश तो सूक्ष्मशब्द के साथ एकाकार हो जाता है ।
२. मन का द्वितीय अंश बाह्य वस्तु के रूप में आकार ग्रहण करता है ।
यही सूक्ष्म अर्थ है । सूक्ष्मशब्द एवं सूक्ष्म अर्थ मन के दो प्रतिरूप है । इस
प्रकार सूक्ष्म शब्द एवं सूक्ष्म अर्थ ग्राहक एवं ग्राह्य रूप में मन की ही अभिव्यक्तियाँ
है और दोनों सूक्ष्मशरीर के वशीभूत हैं । शब्द का स्थूल रूप जो वैखरीवाक् द्वारा
प्रकट होता है मध्यमा के स्तर पर सूक्ष्मरूप धारण करता है । वाणी का यह सूक्ष्म
रूप ही मध्यमावाक् का विषय है । सोमानन्दपाद के अनुसार क्रमशून्य, शब्दब्रह्म,
अर्थ प्रतिपादन की इच्छा से, विवक्षा के द्वारा उपलक्षित मनोविज्ञान का रूप ग्रहण
करता है किन्तु बिन्दु नाद नामक प्राणापानस्वरूपात्मक वायु के क्रम से उल्लसित
होने पर वही वाक् 'मध्यमावाक्' कहलाता है ।
'आस्ते विज्ञान रूपत्वे स शब्दोऽर्थविवक्षया ।
मध्यमा कथ्यते सैवबिन्दुनादमरुत्क्रमात् ।।'
'ज्येष्ठा' तथा ज्ञान के साम्य से जो बिन्दु प्रकट होता है उसका नाम है—
'मध्यमावाक्' ।। 'मध्यमावाक्' वाक्तत्व का वह स्तर है जो अनाहत चक्र से
सम्बद्ध है, स्फुट होते हुए भी संयुक्त पत्तियों की भाँति भेदाभेद स्तर पर आरूढ़ है
तथा बुद्धि के साथ संश्लिष्ट है—सोमानन्दपाद ने इसका स्वरूप इस प्रकार प्रस्तुत
किया है—
अथ मध्यमया बाह्या भावा ग्राह्या ह्यविद्यया ।
तस्या एव हि संयोगो बुद्ध्या सङ्कल्पनात्मना ।।१
शिवाग्रयोगीन्द्रज्ञानशिवाचार्य ने 'शैवपरिभाषा' में मध्यमा को इस प्रकार
परिभाषित किया है—"बुध्युपारूढ़वर्णा तत्क्रम विशेषोपेता प्राणवृत्त्यगोचरीभूता सैव
मध्यमा" ।। पौष्कर० में इसका स्वरूप इस प्रकार नियपित किया गया है—
“बुध्या वर्णानुसंधानपूर्वमर्थस्य वाचिका ।
प्राणवृत्तिमतिक्रान्ता वागेषा मध्यमाह्वया ।।’’२
१. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।३७) २. पौ०बिन्दु०प०