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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 530 में से

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३३२ वरिवस्यारहस्ये
होने पर भी सोम की चरमाकला के सदृश कभी इसका अत्याभिभव नहीं होता ।
इसके स्वस्वरूप का साक्षात्कार होने पर स्वर्गमुक्ति स्वरूप अधिकार निवृत्त हो जाता
है । षोडशकल पुरुष में इसे ही 'अमृतकला' कहा गया है—
'अविभागा तु पश्यन्ती सर्वतः संहृतक्रमा । स्वरूपज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा
वागनपायिनी । सैषा सङ्कीर्यमाणापि नित्यमागन्तुकैर्मलैः । अन्त्या कलेव सोमस्य
नात्यन्त मभिभूयते । तस्यां दृष्टरूपायामधिकारो निवर्तते । पुरुषे षोडशकले
तामाहुरमृतां कलाम् ।।'१
८. आचार्य सोमानन्दपाद की दृष्टि और 'पश्यन्तीवाक्'—प्रत्यभिज्ञादर्शन के
उद्भावक आचार्य सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टि' में व्याकरणागम में स्वीकृत शब्द
-परब्रह्माद्वयवाद का खण्डन करते हुए 'पश्यन्ती' का व्याकरणागमानुकूल स्वरूप इस
प्रकार प्रस्तुत किया है—
१. काश्मीरीय ईश्वराद्वयवाद में जो जो ज्ञानशक्ति अथवा सदाशिव का स्वरूप
है वही वैयाकरणों की पश्यन्ती है जिसे वे लोग परात्पर तत्व स्वीकार
करते हैं ।
२. यह अनादिनिधन शब्दब्रह्मस्वरूप पश्यन्ती ही 'परावाक्' है ।
३. यह शब्दब्रह्म सम्पूर्ण शरीरों में व्याप्त संवित् (आत्मा) है ।
४. ज्ञेयरूप, शून्य, चिद्रूप उस शब्दतत्व की ही 'भोक्ता' भी संज्ञा है ।
५. यह साक्षात्कार को निरतिशद स्थान या पराकोटि है ।
६. क्रमात्मक विश्व से अतीत, देशकालावच्छेद से विरहित, वाच्यवाचक-ग्राह्य
ग्राहक आकारों से शून्य, ऐन्द्रियवृत्तियों से परे स्थित यह पश्यन्ती वाक्
ही पराकाष्ठा, परमार्थ एवं परब्रह्म है—'अथास्माकं ज्ञानशक्तियर्या सदाशिव-
रूपता । वैयाकरणसाधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः । इत्याहुस्ते परं ब्रह्म
यदनादि तथाक्षयम् । तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती पराहि वाक् । स
एवात्मा सर्वदेहव्यापकत्वेन वर्तते । अन्तःपश्यदवस्थैव चिद्रूपत्वमरूपकम् ।
तावद्यावत्परा काष्ठा यावत्पश्यन्त्यनन्तकम् । अक्षादिवृत्तिभिर्हीनं देशकालादि-
शून्यकम् । सर्वतः क्रमसंहार मात्रमाकारवर्जितम् । ब्रह्मतत्वं पराकाष्ठा
परमार्थस्तदेव सः ।।२
जब विकारशून्या पराकला स्रष्टव्य पदार्थों का आलोचन करती है—'तदैक्षत
बहुस्यां प्रजायेय' (छा०उ०६-२-३) के अनुसार ईक्षण करती है तब उस
ईक्षणात्मिका परा कला को 'पश्यन्ती' की आख्या प्राप्त होती है । यह शक्ति समग्र
विश्व को अपने में अंतर्गर्भित देखती है इसीलिए इसे 'पश्यन्ती' और 'उत्तीर्णा' कहा
गया है ।३
१. 'वाक्यपदीय' की टीका २. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि'
३. सौभाग्यभास्कर