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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 530 में से

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पृष्ठ 429

द्वितीयोऽंशः ३२७
अवस्थायें शब्दब्रह्म के ईश्वररूप की अवस्थायें हैं । प्राचीन वैयाकरण 'परावाक्' का
उल्लेख नहीं करते क्योंकि उसमें स्पंद या गति नहीं है । 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' में ठीक
ही कहा गया है कि वैयाकरणों की दृष्टि में पश्यंती ही परम तत्व है--'ननु
पश्यन्त्येव परंतत्वमिति जरद्वैयाकरण मन्यन्ते ।।' आचार्य भर्तृहरि ने भी 'वाक्यपदीय'
में त्रयीवाक् का समर्थन करते हुए परमवाक् के रूप में 'पश्यन्ती' को ही स्वीकार
किया है । अभिनवगुप्तपाद ने भी इस दिशा में सहमति प्रकट की है । सामान्य
स्पंदस्वरूपिणी 'पश्यंतीवाक्' निःस्पन्दात्मिका परावाक् से उद्भूत होती है । मध्यमा
से वैखरी, पश्यन्ती से मध्यमा एवं परा से पश्यंती का आविर्भाव होता है ।
वैखरीवाक् का उद्भव सूक्ष्मरूपा मध्यमा से एवं सूक्ष्मरूपा मध्यमा का उद्भव
पश्यंती से होता है । पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी सुषुप्ति, स्वप्न एवं जाग्रत
अवस्था के प्रतीक माने जाते हैं । सूक्ष्म शरीर में 'मध्यमावाक्' स्वप्नावस्था के
समान है और 'परावाक्' सुषुप्ति अवस्था के सदृश है । वैयाकरणों की दृष्टि में
'पश्यंती' ही परावस्था है ।
'पश्यन्ती' वाक् चैतन्यस्वरूप, अखण्ड, अद्वय, अभिन्न परम् तत्व है । उसमें
ग्राह्य-ग्राहक, देश-काल-क्रम का भेद नहीं है । कहीं वह क्रम-शून्य एवं कही
प्रतिसंहृतक्रमा है । इसे भी आत्मा भी कहा गया हैं । व्याकरणसिद्धान्त के अनुसार
पश्यन्ती—प्रतिलीनाकार, निराकार, चलाचल, संनिविष्टज्ञेयाकार, परिच्छिन्नार्थप्रत्यव-
भास, संसृष्टार्थप्रत्यवभास, प्रशान्तसर्वार्थप्रत्यवभास आदि विशेषणों से विभूषित है।
पश्यन्ती ही वैयाकरणों का ब्रह्मतत्व है । यह निराकार, देशकालादिपरिच्छेद से
शून्य, नियतरूप से शून्य, क्रमशून्यः अनवच्छिन्न अद्वैततत्व है । चूँकि क्रम एवं
भेदाभास ही प्रपंच का स्वरूप है अतः अक्रमा पश्यन्ती विश्वोत्तीर्ण है । शब्दयोग
का अवलम्बन लेकर चित्त का समाधान करनेवाले योगियों को पश्यन्तीवाक् अनावृत
एवं वाग्योग में सिद्धि प्राप्त न करने वाले (पश्यंती के शुद्धरूप का साक्षात्कार न
कर सकने वाले) लोगों के लिए पश्यंती आवृत्तस्वरूपा है । पश्यन्ती के स्वरूप में
शब्द एवं अर्थ का पारस्परिक पार्थक्य नहीं रहता । यही 'पश्यन्ती' अर्थप्रतिपादन
की इच्छा से 'मध्यमावाक्' बन जाती है । यही पश्यन्ती ही 'मध्यमा' एवं कण्ठादि
में से व्यक्त होने पर 'वैखरी' कहीं जाती है। 'सुभगोदय वासना' के अनुसार—
मूलाधार में उत्पन्न ('भूजन्मा') 'परा' वाक् की लता 'पश्यन्ती' है और सुगंध
'मध्यमा' है ।।
“शब्दपरब्रह्माद्वयवाद” मानने वाले शब्दाद्वैतवादी वैयाकरण भर्तृहरि एवं
व्याकरण-दर्शन 'पश्यन्तीवाक्' को ही परब्रह्म स्वीकार करता है—
(१) “अथास्माकं ज्ञानशक्तिर्य्यासदाशिवरूपता ।
वैयाकरण साधूनां पश्यन्ती सा परा स्थितिः ।।'१
(२) इत्याहुस्ते परंब्रह्म यदनादि तथाक्षयम् ।
१. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (आ०-२)