वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ वरिवस्यारहस्ये
परं ब्रह्म कुण्डलिनी स्वरूपिणे निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सद्रूपाय नमो नमः ॥१
योगशिखोपनिषद् में इसे 'चिच्छक्ति परमा देवी 'शिवा' कहा गया है—'ब्रह्मरंध्रे
महास्थाने वर्तते सततं शिवा। चिच्छक्तिः परमादेवी मध्यमे सुप्रतिष्ठिता ।२ यामल में
इसे 'चित्कला' कहा गया है—'चित्कलां यां कुण्डलिनीं तेजोरूपां जगन्मयीम् ॥''
कुण्डलिनी वाग्देवता है । परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं वैखरी ये वाणी चतुष्टय
कुण्डलिनी के ही विभिन्न रूप हैं और मंत्र इसी परा पश्यन्ती मध्यमा रूपी नाद का
अपर पर्याय हैं अतः देवी मंत्रमयी, नादमयी एवं वर्णमयी कही जाती है । 'सा
प्रसूते कुण्डलिनी शब्दब्रह्ममयी विभुः ॥' 'क्रमेणानेन सृजति कुण्डलिनी वर्ण-
मालिकाम् ।। अकारादिसकारान्तां द्विच चत्वारिंशदात्मिकाम्' ।३ वह साक्षात् विद्या है
और जगन्माता है—'या विद्या भुवनेशानी त्रैलोक्यपरिपूजिता । सादेवी कुण्डली माता
त्रैलोक्यं पाति सर्वदा ॥४ कुण्डलिनी मातृका देवी हैं । 'कामधेनु तंत्र' में समस्त
वर्णों को कुण्डलिनी रूप कहा गया है यथा—'ईकारं परमेशानि स्वयं पर कुण्डली'।
यही कुण्डलिनी मातृका, विद्या, वर्ण एवं मंत्र सभी कुछ है । 'पंचाशन्मातृका
देवी नानाविद्यामयी सदा । नानाविद्यामयीं देवी महाविद्यामयीं तथा । सर्ववर्णमयीं देवी
सर्वदेवमयीं परा ।५ सर्वदेवमयीं सौम्यां ब्रह्माण्डजननी परा ।।' 'अकारादिक्षकात्तरान्ता
मातृकाबीज रूपिणी ॥' 'समस्त जननी देवी मातृका जननी परा ॥' 'मातृका
परमेशानि काली साक्षान्न संशयः ॥'६
यही जगन्माता भी है । सारांश यह कि अकारादि क्षकारान्त समस्त वर्ण
परमकुण्डली के व्यक्त रूप है—'अकारादि क्षकारान्तं स्वयं परम कुण्डली ।' इन्हीं
वर्णों से समस्त जगत् उत्पन्न होता है—'सर्व चराचरं विश्व वर्णान्तु जायते ध्रुवम्''
अतः कुण्डलिनी जगन्माता भी है ।७ 'तोडलतंत्र' में भी कुण्डलिनी को ५० वर्णों
से समलंकृत कहा है—'सदा कुण्डलिनी देवी पंचाशद्वर्णभूषिता ।।'८ सहस्रार में यही
महाकुण्डलिनी के रूप में शिव के साथ निवास करती है—'सहस्रारे महापद्मे
विश्वरूपः परः शिवः । महाकुण्डलिनी तत्र स्थिता नित्या सुरेश्वरि ।।'९ यहाँ शिव
बिन्दुरूप में स्थित है—'सहस्रारे महापद्मे बिन्दुरूपं परं शिवम् ।।'१०
कुण्डलिनी 'परा', 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' रूप में अपने को
अभिव्यक्त करती है जो निम्न हैं—
पश्यन्तीवाक्—शब्द की जो चार अवस्थायें (परा, पश्यन्ती, मध्यमा और
वैखरी) होती है उनमें 'महाबिन्दु' के विस्फोट के पूर्व शब्द की जो अवस्था होती है
उसे 'परा' एवं (किसी विशेष अर्थ की अभिव्यञ्जना न करने वाला एवं मात्र
स्पन्दनस्वरूप) उसमें उत्पन्न सामान्य स्पंद 'पश्यन्ती' कहलाता है । इसका स्थान
मूलाधार से मणिपूर चक्र तक है । यहीं इसका मन से संयोग होता है । ये दोनों
१. महानिर्वाण तन्त्र २-३. शारदातिलक
४. रुद्रयामल ५-७. कामधेनु तन्त्र
८-१०. तोडल तन्त्र