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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 530 में से

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पृष्ठ 433

द्वितीयोंऽशः ३३१
अवस्था को 'पश्यन्ती' संज्ञा देना अनुचित नहीं होगा—ततः
स्रष्टव्यपदार्थानालोचयति—"तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय" इति श्रुतेः । तादृशीमीश्वरममेव
प्रवृत्ति निमित्तीकृत्य तस्यां पश्यन्तीति पदं प्रवर्तते ॥ (वरिवस्या० प्रकाश)
३. सौभाग्यभास्करकार का कहना है कि चूँकि वाणी के इस स्तर पर
आत्मा अपने को देखती है अतः वाक् की इस अवस्था की आख्या 'पश्यन्ती'
है—'पश्यतीति पश्यन्ती ।' 'सौभाग्य सुधोदय' में कहा गया है—'पश्यति सर्वं
स्वात्मनिकरणानां सरणिमपि यदुत्तीर्णा । तेनेयं पश्यन्तीत्युत्तीर्णेत्यप्युदीर्यते मात। ॥'१
४. आचार्य सोमानन्दपाद और 'पश्यन्तीवाक्'—आचार्य सोमानन्द पश्यन्ती
को 'ज्ञानशक्ति' से अभिन्न स्वीकार करते हैं ।
आचार्य अभिनवगुप्त और 'पश्यन्तीवाक्'—तंत्र समाम्नाय एवं आचार्य
अभिनवगुप्त की दृष्टि में 'पश्यन्तीवाक्' 'इच्छाशक्ति' है ।२
५. आचार्य उत्पल और 'पश्यन्तीवाक्'—आचार्य उत्पलदेव ने शिवदृष्टि की
अपनी टीका में 'पश्यन्तीवाक्' में ज्ञानशक्ति को उपचरित स्वीकार किया है—
'पश्यन्तीति दर्शन प्राधान्यात् उपचरित ज्ञानशक्ति रूपत्वेप्याश्रीयमाणे परमशिवरूपतया
अत्यन्तदूरवर्तिनी, न तु पर्यन्तदशा सौ, ज्ञानशक्तेः सदाशिवरूपत्वात् परापर-
व्यवस्थात्र । सदाशिव रूपत्वे च क्रियाशक्तिरपि न परित्यक्ता ॥'३
६. 'पश्यन्ती' ज्ञानशक्ति है या इच्छाशक्ति?—आचार्य सोमानन्दपाद द्वारा
पश्यन्ती को ज्ञानशक्ति एवं आचार्य अभिनवगुप्तपादाचार्य द्वारा इसे इच्छाशक्ति के
रूप में स्वीकार करने पर भी इन मान्यताओं में तात्विक धरातल पर अन्तर्विरोध
नहीं है क्योंकि स्वयमेव इच्छाशक्ति ज्ञानस्वभावा एवं ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति से
युक्त है—आचार्य अभिनवगुप्त इच्छाशक्ति में बोध्यवस्तु के अवबोध की शक्ति होती
है । इच्छाशक्ति बोध्यबुभुत्सास्वभावा होती है तथा यह ज्ञान एवं क्रिया इन दोनों
शक्तियों की अनुग्राहिका है—"इयमेव च इच्छाशक्तिरूपेति दर्शयति कार्यचिकीर्षा
इति । बोध्यबुभुत्सास्वभावा अपि इयं भवति, अतश्च एवं—यदिच्छाशक्तिर्ज्ञानक्रिया-
शक्त्यो सुग्राहिका इति, किन्तु बुभुत्सा अपि बोधस्वभावैव तस्य वस्तुनस्तत्र अवभास-
परिपूर्णतया प्रकाशनात् ॥"४
७. व्याकरणागम, भर्तृहरि और 'पश्यन्तीवाक्'—अद्वैतवादी व्याकरणागम
शब्दाद्वैतवाद का प्रतिपादन करता हुआ पश्यन्तीस्वरूपा परावाक् को अनादिनिधन
शब्दब्रह्म मानता है । व्याकरण भर्तृहरि ने अपनी 'स्वोपज्ञ' नामक टीका में
'पश्यन्ती' को ही परावाक् स्थानीय स्वीकार करते हुए उसे वाणी का परात्पर
स्वरूप माना है । उनके अनुसार भी 'पश्यन्ती' विभागशून्या, संहृतक्रमा,
स्वरूपज्योतिस्वरूपा, अविनाशा, एवं स्वप्रकाशा है । आगन्तुक मलों से सङ्कीर्यमाण
१. सौभाग्यभास्कर २. ई० प्र० वि० (अ० १, वि० ५)
३. सोमानन्दपाद—'शिवदृष्टि' (२।३७) ४. ई० प्र० वि० (अ० १, वि० ५)