वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
२०८ वरिवस्यारहस्ये
इस दृष्टि के अनुसार—'मैं ही ब्रह्म हूँ' मैं ही शिव हूँ, इस अनाहत नादरूपी
शब्द (सोऽहं, हंसः) की निरन्तर भावना ही 'जप' है ।
'स्वच्छन्दतन्त्र'१ में कहा भी गया है कि 'मैं इस जगत् का परम कारण परम
हंस, प्राणमय शिव हूँ'—इस प्रकार से अहर्निश स्वभावतः प्रवर्तमान अपने प्राणमय
अजपास्वरूप का विमर्श ही जप है । इसीलिए स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है—
अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम् (४।३९९) । जपनीय मन्त्र भी स्वयं नादात्मक
ब्रह्म ही है । इसमें अपने अकृत्रिम अहमात्मक स्वरूप का निरन्तर परामर्श होता
रहता है—'स्वयं नादो मंत्रात्मा अकृत्रिमाहंविमर्शात्मा ।'
'श्रीकण्ठीसंहिता' में कहा गया है कि—'पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिध्यति
कदाचने' अर्थात् मन्त्र और मन्त्री (मन्त्र और मन्त्रजापक) तथा मन्त्र की अधिष्ठात्री
देवता—ये कभी पृथक् नहीं होते अतः इनको पृथक् मानकर जप करने से कभी
सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।। जप का विषय नादात्मक मन्त्र ही है । इसमें साधक को
परम तत्त्व के साथ अपनी प्रत्यभिज्ञा की स्पष्ट प्रतीति होने लगती है ।
२. 'योगिनीहृदय दीपिका' में जप की दृष्टि२—इस ग्रन्थ के अनुसार इन्द्रियों
की बहिर्मुख प्रवृत्ति को रोककर आन्तर अनाहत नाद की निरन्तर भावना करना ही
जप' है —
“संयमेन्द्रिय सञ्चारं - प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्ता न तु बाह्य जपो जपः ॥”
ग्रन्थकार ने बाह्य जप को जप स्वीकार ही नहीं किया—'न तु बाह्य जपो
जपः । विकल्पात्मक विविध वर्णों के संघात से विनिर्मित मन्त्रों का बाह्योच्चारण
जप नहीं है ।
३. 'तन्त्रालोक' में जप की दृष्टि३—इस ग्रन्थ में कहा गया है कि 'तत्स्वरूपं
जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ॥' अर्थात् 'उस परम कारण शिव का आत्मस्वरूप
ही जप है । भावाभाव (प्राणापान आदि गत्यात्मक) पद की सीमा को अतिक्रान्त
कर जाने की दशा (जहाँ चिदैक्य परामर्श हो) ही जप है—'“तस्य शिवस्य स्वरूपं
परावाक्स्वभावम् आत्मरूपम् अर्थात् भूयो भूयः परादृश्यमानं जपः अतएव
भावाभावपदच्युतः ॥ तन्मध्यस्फुरत्संवित्परामर्शमात्रसार इत्यर्थः ॥'४ शिव का
स्वात्मरूप परावाक् है । परावाक् का शाश्वत परामर्श ही जप है । इस परामर्श दशा
में भावाभावात्मक पद में स्थिति नहीं रहती प्रत्युत् मध्यावस्थान की दशा प्राप्त हो
जाती है । भाव एवं भावाभाव दोनों की स्थितियाँ सङ्कोचात्मक होती है अतः साधक
'इसका त्रोटन करता है और मध्य में विराजमान होता है । वहीं पर संवित् का
अमृत परामर्श होता है । यही अमृतात्मक परामर्श ही 'जप' है ।
१. स्वच्छन्दतन्त्र (४।३९९) २. योगिनीहृदय दीपिका (पृ० १९५)
३. तन्त्रालोक (१।९०) ४. जयरथ-'विवेक' (तन्त्रालोक टीका)
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Line 11: संविद् / संवित्
Line 12: विमर्शिनी -> र्शिनी
Line 13: अभिनवगुप्तपादाचार्य
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२१० वरिवस्यारहस्ये
अहोरात्र में २१ हजार छः सौ बार श्वास-प्रश्वास के माध्यम से जो श्वसन-क्रिया
सम्पादित करता है उसमें अपानवायु के साथ 'सकार' बाहर फेंकता है एवं 'हङ्कार'
के साथ प्राणवायु ग्रहण करता हुआ अहोरात्र 'हंसः' मन्त्र का जप किया करता
है—इस "हंसः हंसः हंसः हंसः" के स्वरूप वाले इस स्वाभाविक श्वासप्रश्वासात्मक
मन्त्र की आवृत्ति का नाम ही 'जप' है—यही मन्त्र उलट कर जपने से 'सोऽहं' बन
जाता है—
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः ।
हंस हंसेत्यतो मन्त्रं जपो जपति नित्यशः ॥
षट् शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः ।
जपो देव्या विनिर्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥
यह जप स्वयमेव उच्चरित है—इसका कोई जापक नहीं है और न तो इस
जप का कोई प्रतिहन्ता ही है—
'नास्योच्चारयिता कश्चित्प्रतिहन्ता न विद्यते ।
स्वयमुच्चरते देवि प्राणिनामुरसि स्थितः ।।'
विश्वपूरण परभाव स्वस्वभाव में जो भावना (विमर्शना) भावित (संपादित) होती
है वही 'जप' है । यह जप अकृताहंविमर्शात्मा नाद है और इसका जप्य है
स्वात्मदेवता ।।
८. 'शिवसूत्रवार्तिक' में जप की दृष्टि—वार्तिककार वरदराज का कथन है
कि 'जनिपालनधर्मत्व के कारण' जिसे 'जप' कहा जाता है वह अकृत्रिम अहं के
आमर्श से परिप्लावित, स्वात्मावमर्शी, याथार्थ्यवादी, स्वात्मपरामर्श संपदा से युक्त
योगियों की 'स्वैरअभिलापात्मा कथा' है । वही योगीन्द्रविषया कथा 'जप' है—
अकृत्रिमाहमामर्शमयस्वात्मावमर्शिनः ।। १११ ।।
'या या स्वैराभिलापात्मा कथा याथार्थ्यवादिनः ।
भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।। ११२ ।।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ।। ११३ ।।
जनिपालनधर्मत्वाज्जप इत्यभिधीयते ।
अथेदृग्विधयोगीन्द्र विषयापि च या कथा ।। ११५ ।।
जपः सोऽपि जनस्योक्तो जनिपालन योगतः ।।"
'जयसंहिता' में कहा गया है कि "एक ही मन्त्रनाथ अन्तर और बाह्य दोनों
में उदित होकर एक हो जाता है तब उस 'जप' को लक्ष संख्या से भी अधिक
समझना चाहिए ।।" अर्थात् 'जप' मन्त्रनाथ के अन्तर एवं बाह्य में उदित होकर
एक हो जाने की प्रक्रिया की संज्ञा है ।
'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है कि "आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का '
प्रथमोंऽशः २११
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियारहित है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग (मन्त्र जप) करना चाहिए वही मन्त्र सफल होता है ॥"
'श्रीवैहायसी' में कहा गया है कि—सन्धिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित
'जप' करना चाहिए । सूत्र में ग्रथित मणि के समान शक्ति के ताने बाने से
निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करते हुए जप करना चाहिए । वह शक्ति परम व्योम
में रहती है और परमामृत से समृद्ध है । उक्त रीति से 'जप' करने पर ही मन्त्र
अपने स्वरूप को प्रकट करता है अन्यथा अपने को गुप्त रखता है ।
'ध्यानं जपेन' (शाक्तदर्शन) कहकर आचार्य हयग्रीव ने कहा है कि जप का
ध्यान से एवं ध्यान का जप से सम्बंध है । आचार्य अगस्त्य ने जप का बंध-क्षय
से सम्बंध स्थापित करते हुए कहा है—'जपाद्बन्धो नश्यति ॥"
९. 'हंस पारमेश्वर' में जप की दृष्टि—'जप' वर्णों के उच्चारण की प्रक्रिया
नहीं है प्रत्युत् सुषुम्णा मार्ग में नादोच्चारण है । इसीलिए कहा गया है कि वर्णरूप
मन्त्र 'पशुभाव' में स्थित हैं और जब वे सुषुम्णामार्ग से उच्चरित होने लगते हैं तो
'पशुपति' बन जाते हैं"—
'पशुभावेस्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥
९. 'त्रिकसार' में जप की दृष्टि—'त्रिकसार' में कहा गया है कि चिच्छक्ति
के बल का स्पर्श न होने के कारण मन्त्रों के वर्ण जड़ अक्षर ही रहते हैं—
'चिच्छक्तिबला स्पर्शात् केवलं वर्णरूप मात्रा रूपत्वान्मन्त्रपुत्रिकाकरण निष्फल चेष्टा
भवन्ति ॥'१
वर्णातीत परतत्त्व के विदित हो जाने पर मन्त्राधिप भी मन्त्र के साथ मांत्रिक
के किङ्कर हो जाते हैं
विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किङ्करत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥२
तात्पर्य यह है कि चूँकि 'मन्त्र' चित्तत्त्व की रश्मियाँ हैं—
“मन्त्राश्चिन्मरीचयः”—अतः 'जप' जापक द्वारा चैतन्य तत्त्व के साथ तादात्म्यप्राप्ति
की एक प्रक्रिया है न कि जड़ अक्षरों की पुनरावृत्ति मात्र ॥
१०. 'स्पन्दप्रदीपिका' में जप की दृष्टि—आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्द प्रदीपिका'
में कहते हैं कि मन्त्र का 'बल' है निरावरण चित् का उल्लास । इसी बल को
लेकर मन्त्र सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । और उनमें
सर्वज्ञता आदि का बल समाविष्ट होता है 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः'
(स्पं० का २६)
१. स्पन्द प्रदीपिका २. त्रिकसार
२१२ वरिवस्यारहस्ये
'तद्बलं निरावरणचिदुल्लासरूपं परशक्त्याख्यमाक्रम्याधिष्ठाय मन्त्राः बीज पिण्ड
पद नामरूपा मननत्राणधर्मिणः सहजनादशक्त्युद्बोधदीप्तत्वात् । सर्वज्ञत्वादिना बलेन
श्लाघायुक्ता'—इसका अर्थ यह हुआ कि जब 'मन्त्र' नादशक्ति-उद्बोधित है तब
'जप' वह प्रक्रिया है जिसमें नादोत्थान हो एवं चित् का उल्लास हो ॥
११. योगसूत्रभाष्यकार व्यास की जप-दृष्टि—योगसूत्रकार पतंजलि कहते
हैं—'तज्जपस्तदर्थभावनम्' (१।२८) अर्थात् उस (प्रणव) का जप एवं उस प्रणव के
अर्थभूत परमात्मा की भावना करनी चाहिए ॥ ('प्रणवस्य जपः प्रणवाभिधेयस्य
चेश्वरस्य भावनम्')१ 'ओंकार को जपते हुए एवं ओंकार के अर्थ 'ईश्वर' की भावना
करते हुए योगी का चित्त एकाग्र होता है ।'२ 'विष्णुपुराण' में कहा गया है कि
ओंकार के पश्चात् योग-साधन एवं योग-साधन के पश्चात् जप करना चाहिए । जप
एवं योग की सिद्धि से परमात्मा का साक्षात्कार होता है—
“स्वाध्यायाद्योग मासीत योगात्स्वाध्याय मामनेत् ।
स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते ॥”
अर्थात् जपपूर्वक ईश्वरार्थभावना एवं भावनापूर्वक ओंकार का जप करना
चाहिए । ईश्वर-ध्यान से 'जप' को संपुटित करना चाहिए । सारांश—'जप' के बाद
योग एवं योग के बाद 'जप' विधेय है । ('भावन' = 'भावनं पुनः पुनश्चित्ते
निवेशनम्'—'तत्त्व वैशारदी' ।)३ प्रणव जप के साथ ब्रह्मध्यान (प्रणिधान) करना
चाहिए—'प्रणव जपेन सह ब्रह्मध्यानं प्रणिधानं' ।।४ प्रणवेन परंब्रह्म ध्यायीत नियतो
यतिः ।।” ईश्वर-प्रणिधान के दो भेद हैं—(१) 'अहं ब्रह्मास्मि', 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म',
तमेतमात्मानमोमिति ब्रह्मौणैकीकृत्य ब्रह्म चात्मनोमित्येकीकृत्य । (२) प्रकृति-पुरुष दोनों
का विलापन करके अपने अहं को ब्रह्मरूप समझना । (१) प्रथम प्रणिधान—
उपासना । (२) द्वितीय प्रणिधान—तत्त्वज्ञान ।।५
अर्धमात्रादि में जो प्रतिफलित चैतन्य है वही 'मन्त्र' है । इसीलिए
'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' कहा गया है । 'जप करना' एवं 'जप होना'—इस द्विविध रूप
में जप द्विप्रकारी है—
१. 'जप करना'—वैखरी भूमि । वाचिक जप । उपांशु जप । मानसिक जप
२. 'जप होना'—(स्वाभाविक जप) (१) हृदय में जप, फिर (२) नाभि में
जप, फिर (३) मूलाधार में जप ।
(बाह्य जप में मन्त्राक्षरों का पृथक्-पृथक् उच्चारण रहता है—वह विकल्पमय
है—अतः वह मन्त्र नहीं है । मध्यमा में भूमि में मन्त्र नाद के साथ स्वतः ध्वनित
१-२. व्यास भाष्य ३. तत्त्व वैशारदी (वाचस्पति मिश्र)
४. योगवार्तिक (विज्ञान भिक्षु)
५. प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती-'जपसूत्रम्'—'भावन' का अर्थ भावना (चिन्तन करना)
नहीं है 'भावन' (होने देना) है ।
प्रथमोंऽशः २१३
हो उठता है । हृदय जप को ही मध्यमा मार्ग में प्रवेश समझना चाहिए क्योंकि इस
स्थिति में नाद अपने आप चलता रहता है । बाह्य जप में नाद-श्रुति नहीं होती ।
मध्यमा भूमि में जब नाद के साथ मन्त्र स्वभावतः ध्वनित होने लगे तब उसे
आन्तरिक जप समझना चाहिए ।) आभ्यन्तर नाद का उच्चारण होना ही जप का
प्रधान लक्षण है—
‘संयम्येन्द्रियग्रामं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥’
‘जप के साथ मन्त्रावय व समूह में ६ शून्यों, ५ अवस्थाओं ७ विषुवों की
भावना भी करनी पड़ती है । ‘जप’—ध्वनि (व्यक्त एवं अव्यक्त) संख्या एवं भाव
(अर्थ) इन तीनों की त्रिपुरी है ।१
मन्त्र में चार बातें मुख्य हैं—(१) बीज (२) पिण्ड (३) पद (४) नाम ।
उनका धर्म है—मनन एवं त्राण । इन सभी का सम्बंध भी जप से है । जप के दो
प्रकार हैं—(१) बाह्य (२) आभ्यन्तर । बाह्यजप = वैखरीनाद का विलास ।
आभ्यन्तर जप = मध्यमा नाद का विलास ॥
‘शाक्तानन्दतरंगिणी’ में अक्षरों की आवृत्ति को ‘जप’ की आख्या दी गई है—
‘जपः स्यादक्षरावृत्तिः’ किन्तु जप की यह परिभाषा वास्तविक जप की नहीं है
क्योंकि वास्तविक जप की आवृत्ति करनी ही नहीं पड़ती प्रत्युत् उसकी आवृत्ति
अपने आप होती रहती है । .
जप के द्वारा देवता प्रसन्न होते हैं एवं उससे सिद्धि मिलती है—
“जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति ।
जपात्सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्न संशयः ॥”
जप के भेद—‘स्वच्छन्दतन्त्र’ में जप के ६ भेद बताए गए हैं—(१) वाचिक
(२) मानस (३) यौगिक (४) योग वाचिक (५) योग मानसिक (६) वाङ्मानसिक
यौगिक ॥
१. जप का प्रथम रूप (वाचिक) = देवी का ध्यान करते हुए वाणी द्वारा
मन्त्रोच्चारण “वाचा केवलयोच्चार्य मन्त्र देवी विभाव्य च ।”
२. जप का द्वितीय रूप (मानस) = सावधान चित्त से देवी के रूप का
सम्यक् रीति से चिन्तन करते हुए मन्त्रानुसंधान ‘देव्या रूपं च संचित्य सावधानेन
चेतसा । मन्त्रस्याप्यनुसंधानं मानसं परिकीर्तितम् ॥’
३. जप का तृतीय रूप (यौगिक) = तीन स्थानों से क्रमशः तीन बीजों को
यथामार्ग चिन्तित करके उनका आरोहण करना ‘यौगिक जप’ है ।
१. जपसूत्रम् (प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती)
तृतीय विश्राम: नाद, बिन्दु, कला एवं मातृका-वर्ण मन्त्र-दर्शन
२१४ वरिवस्यारहस्ये
४. जप का चतुर्थ रूप (योग वाचिक) = लक्ष्य के भीतर मन को केन्द्रित
करके वाणी द्वारा जप करना योग वाचिक जप है ।
५. जप का पञ्चम रूप (योगमानसिक) = बीजानारोहण क्रम से मन के
द्वारा जप करना योग मानसिक जप है ।
६. जप का छठवाँ रूप (वाङ्मानसिक यौगिक) = यह अनुत्तम जप है ।
वाचिक जप—वाक् प्रवर्तन; मानस जप—श्री एवं योगसिद्धियों की प्राप्ति; वाङ्मानस
जप—वाग्ज्ञान, ऐश्वर्यसिद्धि अणिमादिक सिद्धियों की प्राप्ति ।१
जप और उसके अङ्ग—'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्चषट् सप्त । न
व च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।। 'जप' के साथ मन्त्रावयवों की
अनुविद्धता अपरिहार्य है । जैसे माला के मनकों को एकीकृत करने के लिए सूत्र
आवश्यक है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न मन्त्राक्षरों को एकात्मता में पिरोने के लिए
मन्त्रावयव रूप सूत्र की आवश्यकता होती है । मन्त्रावयव रूप सूत्र में पिरोये
मन्त्राक्षरों का उच्चारण करना ही जप है इसीलिए भास्कराचार्य कहते हैं—
'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।।'२
१. भास्कराचार्य के मत में जप के मूलभूत अङ्ग—आचार्य भास्कर कहते हैं
कि मन्त्राक्षरों के उच्चारण की आवृत्तियाँ मात्र ही 'जप' नहीं है बल्कि मन्त्रावयवों के
साथ मन्त्रोच्चारण 'जप' है उन्होंने मन्त्रावयवों को ही जप के अङ्ग के रूप में
स्वीकार किया है जो निम्न है—(१) छः शून्य (२) पाँच अवस्थायें (३) सात
विषुव (१८ अङ्ग) । सारांश यह है कि मन्त्र-जप के अवयवभूत अङ्ग निम्न हैं—
(क) मन्त्राक्षरों का 'उच्चारण'—'अणोच्चरणं तु जपः' (वरि० ५२)
(ख) मन्त्राक्षरों के 'अर्थचिन्तन' एवं मन्त्रार्थ—चिन्तन के साथ किया गया
मन्त्रोच्चारण—
“मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणां तु जपः ।।”
अर्थात् जप के साथ मन्त्रार्थ चिन्तन भी आवश्यक है । मन्त्रार्थ निम्न है—
'षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे । भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भाथैश्च कौलिकः ।
तथा सर्वरहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । अक्षराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।'
'योगिनीहृदय' में मन्त्रार्थ के ये निम्न प्रकार है—(१) 'भावार्थ' (२) 'संप्रदायार्थ'
(३) 'निगर्भार्थ' (४) 'कौलिकार्थ' (५) 'सर्वरहस्यार्थ' (६) 'महातत्त्वार्थ' ।।३
२. आचार्य भास्करराय के मतानुसार मन्त्रार्थ—'योगिनीहृदय' में तो मात्र
मन्त्रार्थ के उक्त छः प्रकार ही बताए गए हैं किन्तु 'वरिवस्यारहस्यम्' में मन्त्र के
१. स्वच्छन्दतन्त्र २. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक ५२)
३. योगिनीहृदय
ेत".
Line 26:
है ।५ आचार्य वाचस्पति मिश्र कहते हैं कि 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' में 'तत्' का अर्थ
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"है ।५ आचार्य वाचस्पति मिश्र कहते हैं कि 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' में 'तत्' का अर्थ"
Line 27:
है—'तस्य प्रणवस्य'६ अर्थात् 'प्रणव का' । 'भावनं' का अर्थ है—'भावनं पुनः
Wait, footnote marker '६' after प्रणवस्य': "प्रणवस्य'६".
"है—'तस्य प्रणवस्य'६ अर्थात् 'प्रणव का' । 'भावनं' का अर्थ है—'भावनं पुनः"
Line 28:
पुनर्निश्चन्ते निवेशनम्' अर्थात् बार-बार चित्त में निवेशन ।७ प्रणव के जप के साथ
Wait, look at: "पुनर्निश्चन्ते" or "पुनर्निश्चेते"?
Let's zoom in on line 28:
"पु न र्नि श्च न्ते" or "पु न र्नि श्च े ते" or "पुनश्चित्ते"?
Wait! Let's examine the Sanskrit phrase:
In Vacaspati Mishra's Tattvavaisharadi on YS 1.28:
२१६ वरिवस्यारहस्ये
(ख) वाचस्पति मिश्र एवं विज्ञानभिक्षु का मत—वाचस्पति मिश्र कहते हैं
कि—'वाचकत्व' का अर्थ है प्रतिपादकत्व । अर्थात् 'तस्य वाचकः हि प्रणवः' में
'वाचक' पद—शब्द एवं अर्थ के स्वाभाविक संबंध को द्योतित करता है—
'स्वाभाविकः शब्दार्थयो संबंधः सङ्केतेन अस्मात् शब्दात् अयमर्थः ॥' यदि घर नहीं
है तो हजारों दीपों के प्रकाश से भी घर उपस्थित नहीं होगा इसी प्रकार ॐ एवं
उसके अर्थ (ईश्वरत्व) में जो सम्बंध है वह घर-दीपवत नहीं प्रत्युत् नित्य है ।१
अर्थात् मन्त्र एवं उसके मन्त्रार्थ में भी इसी प्रकार नित्य सम्बंध है । अतः मन्त्र के
साथ मन्त्रार्थ का चिन्तन न करना दोनों के नित्य सम्बंध की अवमानना है ।
आचार्य विज्ञानभिक्षु कहते हैं कि 'वाच्यवाचक भावं ज्ञात्वा' 'सह ब्रह्मध्यानं'
(वाच्य वाचक भाव ज्ञात करके एवं ब्रह्मध्यान के साथ) मन्त्र का जप करना
चाहिए ।।२ 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' एवं 'एकः समस्तं यदि हास्ति किंचित्तदत्त्युतो नास्ति
परं ततोऽन्यत् । सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मस्वरूपं त्यज् भेदमोहम् ।। के
अनुसार प्रणवार्थ चिन्तन के साथ जप करना चाहिए ।।३
(ग) 'अवस्थाओं' एवं मन्त्रार्थों के ज्ञान के सहित मन्त्रोच्चारण जप है—
'अवस्थायें' क्या हैं? चेतना की निम्न अवस्थायें हैं—(१) जागृति (२) स्वप्न (३)
सुषुप्ति (४) तुरीय (५) तुरीयातीत ॥
(१) जाग्रत अवस्था—दस इन्द्रियों के द्वारा जागतिक व्यापार सम्पन्न कराने
वाली अवस्था ही 'जाग्रतअवस्था' है ।
(२) स्वप्नावस्था—जिस अवस्था में मन-बुद्धि-चित्त-अहङ्कार रूप आन्तर
करणचतुष्टय द्वारा व्यवहार सम्पन्न होता है उसे स्वप्नावस्था कहते हैं ।
(३) सुषुप्त्यवस्था—स्वप्न में विद्यमान अन्तःकारण की वृत्तियों का लय हो
जाने पर (इन्द्रियों के उपरमस्वरूप) जिस अवस्था का उदय होता है उसे सुषुप्ति
अवस्था कहते हैं ।
४. तुरीय अवस्था—स्वात्म चैतन्य के अभिव्यक्त के हेतुभूत नाद के
आविर्भाव को ही 'तुरीय' कहते हैं ।
५. तुरीयातीतावस्था—यह परमानन्दावस्था है । यह मन के वाणी के अतीत
अवस्था है । पञ्चावस्थाओं का अवस्थान इस प्रकार है—
(क) 'जाग्रतावस्था'—'अ'४ ⎤ 'अ' 'उ' एवं 'म' = जाग्रता, स्वप्न एवं
(ख) 'स्वप्नावस्था'—'उ'५ ⎥ सुषुप्ति के द्योतक हैं । अगले अवयव
⎦ 'तुरीय' एवं 'तुरीयातीत' के द्योतक हैं ।
१. योगवार्तिक (विज्ञानभिक्षु) २. तत्त्ववैशारदी
३. योगवार्तिक (विज्ञानभिक्षु)
४. इन्द्रियशक्यव्यवहतिरूपा या जागरावस्था
५. अन्तःकरणचतुष्कव्यवहारः स्वाप्निकावस्था
प्रथमोऽंशः २१७
(ग) ‘सुषुप्त्यवस्था’—‘म’१ ┐ सुषुप्ति भावना का स्थान भ्रूमध्य के बिन्दु
│ में हैं । यह बिन्दु हल्लेखा को ऊर्ध्व बिन्दु
┘ है ।
(घ) ‘तुरीयावस्था’२ ┐ अर्धचन्द्र, रोधिनी, और नाद इन तीन
┘ मन्त्रावयवों को तुरीयावस्था माननी चाहिए ।
(ङ) ‘तुरीयातीतावस्था’३ ┐ नादान्त से शक्ति, व्यापिनी एवं समना में
│ तथा उन्मना में तुरीयातीतावस्था है । उन्मना
┘ से परे कोई अवस्था है ही नहीं ।
अर्धमात्रा आदि में प्रतिकलित चैतन्य ही ‘मन्त्र’ है । मन की मात्रा जितनी ही
प्रसृत होती है मन का उतना ही अंश क्षुद्रतर होता जाता है और उसी अनुपात में
उतना ही चिदालोक शुभ्रतर होता जाता है । ‘बिन्दु’ मात्रा से मात्राहीन में जाने का
द्वार है । यहाँ ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुरी एकाकार है—यह निरालम्ब भाव का स्थान
है । मात्रा-भङ्ग के कारण अर्द्धमात्रा का उदय होता है ।
(घ) ‘अवस्था’, ‘मन्त्रार्थ’ के साथ ‘शून्य’-ज्ञान सहित मन्त्रोच्चारण ‘‘जप’’
है—‘जप’ का एक अङ्ग शून्य-ज्ञान भी है । बीजमन्त्र (ओंकार) के १२ अवयव
हैं । ज्योतिर्मय एकाकारता ही ‘शून्य’ है । द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम दशम एवं
द्वादश अवयव ‘शून्य’ कहलाते हैं । इनमें प्रथम पाँच शून्य ‘अवान्तर शून्य’ एवं
छठवाँ ‘महाशून्य’ कहलाता हैं ।
अ, उ, म, बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी समना
एवं उन्मना—प्रणवरूप महामन्त्र के ये ही बारह अवयव हैं । इनमें से प्रति द्वितीय
अवयव ‘शून्य’ कहलाता है । प्रथम पाँच शून्यों को तो निराकार कहना समीचीन
नहीं किन्तु छठवाँ शून्य निराकार है । भास्कर कहते हैं कि—तृतीय कूट के रेक,
बिन्दु, रोधिनी, नादान्त एवं व्यापिका में पाँच शून्यों की भावना करनी चाहिए और
उन्मनी में रूप शून्य महाशून्य की भावना करनी चाहिए ।। रेफ, बिन्दु, निरोधिनी,
नादान्त एवं नादान्त में पञ्च शून्यों की भावना करनी चाहिए । (दीपिका पृ०
३१२) । पाँचवे के बाद छठवें शून्य के रूप में उन्मनी को ग्रहण करना चाहिए ।
यह महाशून्य है और निराकार है । (दीपिका पृ० ३१२) जब तक मन जाग्रत
नहीं होता तब तक मन्त्र का मन्त्रत्व उदित ही नहीं होता सुषुम्ना का स्रोत चैतन्य
का प्रवाह है । मन को जगाकर ऊर्ध्वमुखी सुषुम्ना की धारा में डालना होगा । मन
को चेतन करके उठाना होगा । यह जाग्रत मन ही मन्त्र है इसीलिए ‘चित्तं मन्त्रः’
१. आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्तया तार्तीय बिन्दौ
सा ।—वरिवस्यारहस्यम्
२. तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जक नादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।।
३. आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुर्यातीतावस्था सा
नादान्तादिपञ्चके भाव्या ।।—वरिवस्यारहस्यम्
२१८ वरिवस्यारहस्ये
(शिवसूत्र) कहा गया है । मन का भागांश इस प्रकार है— (१) बिन्दु में १/२
मात्रा (२) अर्द्धचन्द्र में १।४ मात्रा (३) निरोधिनी में १।८ मात्रा (४) नाद में
१।१६ मात्रा (५) नादान्त में १।३२ मात्रा (६) शक्ति में १।६४ मात्रा (७)
व्यापिनी में १।१२८ (८) समना में १।१२८ मात्रा = बिन्दु से समना तक की
समस्त मात्राओं का जोड़ १ मात्रा है ।
(ङ) अवस्था, मन्त्रार्थ-विज्ञान, शून्य-ज्ञान एवं विषुवसप्तक के साथ
मन्त्रोच्चारण करना जप है ।
इन विषुवों का निम्न इस प्रकार है—(१) 'प्राणविषुव' (२) मन्त्रविषुव (३)
नाड़ीविषुव (४) प्रशान्तविषुव (५) शक्तिविषुव (६) कालविषुव (७) तत्त्वविषुव ॥
१. प्राणविषुव—प्राण, आत्मा एवं मन के संयोग को 'प्राणविषुव' कहते हैं ।१
२. मन्त्रविषुव—प्रथम कूट के नाद एवं व्यष्टि-समष्टि भेद से अनाहत से
आरम्भ करके ब्रह्मरन्ध्र तक उत्पन्न होने वाले नाद एवं चारों बीज तथा आत्मा की
नादमयी विभावना को 'मन्त्र विषुव' कहते हैं ।
३. नाड़ीविषुव—मूलाधार से उठने वाले नाद के उच्चारण से ब्रह्मरन्ध्र तक
षट्चक्रों की द्वादश ग्रन्थियों को सुषुम्ना के मार्ग से ही ग्रन्थियों का भेदन करता
हुआ नाडी, नाद एवं वर्णों का संयोग 'नाडिका विषुव' कहा जाता है ।
४. प्रशान्तविषुव—रेफ एवं कामकला (ई) एवं बिन्दु से आरम्भ करके ह्रीं के
नादान्त तक एक सूक्ष्मतर नाद उत्पन्न होता है । इस सूक्ष्मनाद का शक्ति के साथ
विलय की 'प्रशान्त विषुव' कहा जाता है ।
५. शक्तिविषुव—शक्ति के साथ लीन इस नाद की भावना को 'समना' में
लीन करनी चाहिए । इसे 'शक्तिविषुव' कहा जाता है—
समनागतमुन्मन्याभेते द्वे शक्तिकाल विषुवाख्ये ॥२
इसमें, शक्त्यन्तर्गतनादं समनायां भावयेल्लीनाम् ॥३
६. कालविषुव—उक्त नाद की भावना समना एवं उन्मनी में करना 'काल
विषुव' कहलाता है ।४
७. तत्त्वविषुव—ककार से उन्मना तक एवं अकुल से उन्मना तक प्रदेशों में
स्थित श्रीविद्याकूटों के अवयवों को व्याप्त करते हुए समस्त ३१७ त्रुटियों एवं साढे
तीन निमेषों को व्याप्त करता हुआ 'नाद' तत्त्व ज्ञान का कारण होता है । यह
शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति का मूल हेतु 'तत्त्व विषुव' कहलाता है ।५
१. प्राणात्ममानसानां संयोगः प्राणविषुवाख्याः ॥ (वरिवस्यारहस्यम् १।४३)
२. योगः प्राणात्म मनसां विषुवं प्राणसंज्ञितम् । (योगिनीहृदयम्)
३-५. वरिवस्यारहस्यम्
प्रथमोऽंशः २१९
(च) 'अवस्था', 'मन्त्रार्थ', 'शून्य', 'विषुव' के साथ 'चक्रों के ज्ञान के साथ
मन्त्रोच्चारण करना 'जप' है ।
अकुल सहस्रार-मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूरक-अनाहत-विशुद्धाख्य । सूक्ष्म
जिह्वा; भ्रूमध्य एवं बिन्दुस्थान—इन नौ स्थानों में त्रैलोक्यमोहन आदि चक्रनवक
का भावन करना भी जप का एक अङ्ग है—
१. अकुल सुषुम्नामूल अरुण सहस्रदल कमल में—त्रिपुराधिष्ठित त्रैलोक्यमोहन
चक्र की भावना करना ।¹
२. वह्नि के आधाररूप चतुर्दल कमल में—त्रिपुरेशी से अधिष्ठित
सर्वाशापरिपूरक चक्र की भावना करना ।²
३. शाक्त स्वाधिष्ठान स्थित षड्दल कमल में—त्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित
सर्वसंक्षोभण चक्र की भावना करना ।³
४. नाभि प्रदेश में स्थित दशदलकमल में त्रिपुरवासिनी देवी से अधिष्ठित
सर्वसौभाग्यदायक चक्र की भावना करना ।⁴
५. अनाहत प्रदेश के द्वादशदल कमल में त्रिपुरा श्रीसमधिष्ठित सर्वार्थसाधक
चक्र की भावना करना ।⁵
६. विशुद्धचक्र के षोडशदल कमल में त्रिपुरमालिनी से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर
चक्र की भावना करना ।⁶
७. लम्बिकाग्र में तालूमूल के अष्टदलकमल में त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित
सर्वरोगहर चक्र की भावना करना ।
८. भ्रूद्वय के मध्य द्विदल पद्म में त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रद चक्र
की भावना करना ।⁷
९. इन्द्रात्मक ललाट के बिन्दु में महात्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय
चक्र की भावना करना⁸ ही जप के साथ 'चक्रभावन' की पद्धति है ।
चक्रभावना का यह विधान 'योगिनीहृदय' में भी प्रतिपादित किया गया है—
“अकुलादिषुपूर्वोक्त स्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥'⁹
आचार्य भास्कर का कथन है कि—'सङ्केतपद्धति' आदि ग्रन्थों में 'चक्रभावन'
के तीन प्रकार कहे गए हैं—(१) सकल (२) निष्कल (३) सकल निष्कल ॥
शून्य—'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोकं में 'शून्यषट्क' एवं ४४वें श्लोक में
शून्य त्रय की भावना का उल्लेख है इसी प्रकार—'योगिनीहृदय' में भी 'शून्यषट्क'
एवं 'शून्यत्रय' का उल्लेख किया गया है—'शून्यषट्कं तथा देवि ह्यवस्था पञ्चकं
पुनः' 'शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरतः प्रिये ॥' शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं
१-९. अमृतानन्दनाथ—दीपिका
२२० वरिवस्यारहस्ये
विभावयेत ॥ (३।१७६-१७७) 'स्वच्छन्दतन्त्र' (४।२८९-२९६) में भी शून्यषट्कं
का उल्लेख पाया जाता है । योगिनीहृदयदीपिका में अमृतानन्दनाथ ने कहा कि छः
शून्यों के स्वरूप को 'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोक से जानना चाहिए ।
'स्वच्छन्दतन्त्र' के अनुसार—(१) ऊर्ध्वशून्य (२) अधःशून्य (३) मध्य
शून्य-शून्यत्रय हैं । क्षेमराज ने—(१) शक्तिपद को—ऊर्ध्वशून्य (२) हृदय को अधः
शून्य एवं (३) कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र को 'मध्यशून्य' माना है एवं
'व्यापिनी' में चतुर्थ, 'समना' में पञ्चम एवं 'उन्मना' में 'षष्ठ शून्य' माना है ।
उन्होंने इन सभी सहेतुक शून्यों का त्याग करके 'सप्तम शून्य' (परमसूक्ष्म शून्य) में
लीन होने का विधान किया है । उन्होंने कहा कि शून्य दो प्रकार के हैं—(१)
अभावा
प्रथमोऽंशः २२१
- प्रकाश *
इति श्रीनृसिंहानन्दनाथचरणाराधकेन भास्कररायापरनाम्ना भासुरानन्दनाथेनोन्मीते
वरिवस्यारहस्ये तत्प्रकाशे च प्रथमोऽंशः - सरोजिनी *
गुरोः करुणावशतः—गुरु की अनुकम्पा के कारण ॥ ग्रन्थकार प्रस्तुत
ग्रन्थ-रचना का के कर्तृत्व एवं प्रणयन-गौरव का श्रेय स्वयं नहीं लेना चाहता प्रत्युत्
इसे अपने गुरु को समर्पित करना चाहता है । इसका कारण क्या है? प्रथम
कारण तो यह है कि ऐसा करके शिष्य गुरु द्वारा प्रयन्त ज्ञान के ऋण से मुक्त हो
जाता है दूसरे अपने कर्तृत्व में गुरु के शक्ति-सञ्चार को अनुभव करने से
ग्रन्थकार की अहङ्कार विमुक्त चेतना और अधिक निर्मल, व्यापक, सूक्ष्म, एवं
शक्तिशाली होती जाती है । इसके अतिरिक्त 'गुरु' शब्द मङ्गलवाची भी है
क्योंकि—'गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः पापस्य दाहकः । उकारः शम्भुरित्युक्त
स्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ॥'१
एक बात यह है कि प्रत्येक साधक ग्रन्थकार इष्टदेवता को प्रसन्न करना
चाहता है । इस दृष्टि से देखें तो भी गुरु के प्रति निष्ठा आवश्यक है क्योंकि—
गुरुप्रीति समुत्पन्ने देवता प्रीतिमाप्नुयात् ।
देवताप्रीतिमापन्ने मन्त्रसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् ॥२
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
अतएव महेशानि साक्षाद् ब्रह्ममयो गुरुः ॥'३
॥ इस प्रकार वरिवस्यारहस्य के प्रथमोऽंश की डॉ० श्यामाकान्त द्विवेदी कृत
'सरोजिनी' नामक हिन्दी टीका पूर्ण हुई ॥
―― * ――
१. यामल २-३. कुलार्णव—शाक्तानन्द तरंगिणी
द्वितीयोंऽशः
जपलक्षणशरीरघटकत्वेन
'यदधीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥'
इत्यर्थज्ञानरहितशब्दोच्चारणस्य निन्दया पापानुमानाच्चार्थज्ञानमावश्यक-
मित्याह—
नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
अर्थमजानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥
(अर्थ-ज्ञान-शून्य अनुष्ठित जप की व्यर्थता)
अर्थ का सम्यक् ज्ञान हुए बिना शब्दोच्चारण कोई फल नहीं देता । (यथा)
अग्निशून्य भस्म में समर्पित हविष्य नहीं जल पाता ॥ ५४ ॥
अर्थ को न जानते हुए भी विविध प्रकार के शब्दमात्र का पाठ करने वालों
की उपमा चनदन के भार को ढोने वाले (किन्तु चन्दन के गुणों को न जानने
वाले) गर्दन से ही दी जा सकती है ॥ ५५ ॥
* प्रकाश *
चक्रीवान् गर्दभः । यद्यपि 'यथा खरश्चन्दनभारवाही' इति श्रुतौ खरस्यैवोप-
मानता, तथापि सादृश्यनिरूपकगुणाधिक्यवत एवोपमानत्वात् तदाधिक्यव्यञ्जनाय
प्रतीपालङ्कार इवोपमानोपमेययोर्व्यत्यासः ॥ ५४-५५ ॥
* सरोजिनी *
'नार्थ............फलति'—अर्थज्ञान के अभाव में किसी भी मन्त्र का जप
फलीभूत नहीं होता । चूँकि प्रत्येक मन्त्र-जापी अपने देवता के साक्षात्कार को ही
द्वितीयोंऽशः २२३
अपना प्रधान लक्ष्य मानता है किन्तु मन्त्र अर्थ ही तो देवता होता है अतः मन्त्र
का अर्थ जाने बिना देवता का साक्षात्कार कैसे हो सकता है ? 'शाक्तानन्दतरंगिणी'
में कहा गया है—'मन्त्रार्थं देवतां रूपं चिन्तनं परमेश्वरि । वाच्यवाचक भावेन अभेदो
मन्त्रदेवयोः ॥'१ 'देवता' वाच्य है 'मन्त्र' वाचक है—'वाच्या हि देवता देवमन्त्रोहि
वाचकः स्मृतः ॥'२ वाचक के ज्ञात होने पर स्वतः वाच्य भी प्रसन्न होता है—
“वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव प्रसीदति ॥”
जिस-जिस मन्त्र का जो-जो देवता हो उसके आकार का चिन्तन करके ही—
अर्थात् मन्त्र का देवता रूप अर्थ समझकर एवं उसका ध्यान करके जप करना
चाहिए—
“यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दिष्टा या च देवता ।
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जप माचरेत ॥”३
'कुलार्णवतन्त्र' में तो यहाँ तक कहा गया है कि जिस भी मन्त्र का जप
करना हो साधक को 'तन्निष्ठ' 'तद्गतप्राण' 'तच्चित्त' 'तत्परायण' होकर उस पदार्थ
का अर्थानुसंधान करते हुए मन्त्र का जप करना चाहिए४—
तन्निष्ठस्तद्गत प्राणस्तच्चित्तस्तत् परायणः ।
तत्पदार्थानुसंधानं कुर्वन्मन्त्रं जपेत् प्रिये ॥
आदि में मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए । इसके बाद
अंत में भी मन्त्र के अर्थस्वरूप देवता का ध्यान करना चाहिए एवं इस प्रकार
ध्यानपूर्वक मन्त्र जप करना चाहिए ।
आदौ ध्यानं ततोमन्त्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।
ध्यान मन्त्रसमायुक्तः शीर्घ सिध्यति साधकः ॥५
“यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य” । खर की
उपमानता । सादृश्य निरूपकगुणाधिक्यवत् उपमान से तदाधिक्य के भाव की
अभिव्यञ्जना हेतु ‘प्रतीपालङ्कार’ का प्रयोग किया गया है जिसमें ‘इव’ शब्द द्वारा
उपमानोपमेयों के व्यत्यास को व्यक्त किया गया है ।
पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थाः परिज्ञेयाः ।
अर्थनादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥ ५६ ॥
(मन्त्रार्थों का परिज्ञान आवश्यक क्यों?)
पुरुषार्थों (धर्मार्थ काम मोक्ष) की आकांक्षा रखने वाले लोगों को (मन्त्रों के)
अर्थों का परिज्ञान होना चाहिए । (मन्त्रों के अर्थों के प्रति) तिरस्कार का
भाव रखने वालों के लिए अर्थ (अभीष्ट) की प्राप्ति नहीं प्रत्युत् अनर्थ की प्राप्ति
होती है ॥ ५६ ॥
१-५. शाक्तानन्द तरंगिणी
२२४ वरिवस्यारहस्ये
- प्रकाश *
एतेनार्थज्ञानस्य नित्यत्वमुक्तं भवति ॥ ५६ ॥ - सरोजिनी *
भास्करराय कहते हैं कि जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की आकांक्षा
रखते हैं उन्हें अपने आकांक्षा की इस पूर्ति के लिए मन्त्रों के अर्थों को जानना
अत्यावश्यक है । जो लोग मन्त्रार्थ के प्रति उपेक्षा दृष्टि रखते हैं उन्हें
स्वाभीष्ट-प्राप्ति की बात तो दूर अनर्थों का सामना करना पड़ता है । आचार्य
भास्कर श्लोकान्तर से इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं कि चन्दन की लकड़ियों का
बोझ लादे हुए गधा जिस प्रकार चन्दन के बोझ मात्र को जानता है चन्दन के गुणों
को नहीं अतः उसे चन्दन को बोझ की दृष्टि से देखने के कारण चन्दन से कष्ट
ही प्राप्त होता है और चन्दन का अर्थ—'बोझ' (दुःख, पीड़ाकारक वस्तु) ही
समझ में आता है उसे चन्दन के शीतलत्व, सुगंधि, मनमोहकता एवं मनः प्रसादत्व
का गुण प्राप्त नहीं । होता ठीक उसी प्रकार मन्त्रार्थ ज्ञान-शून्य शब्दसङ्गठित मन्त्र
के जाप से अनर्थ-ही प्राप्त होता है कोई लाभ प्राप्त नहीं होता—
“नार्थ ज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति ।
भस्मनि वह्नि विहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥ ५४ ॥
अर्थमजानानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ ५५ ॥”१
यह मन्त्रार्थविहीन मन्त्रों का उच्चारण भास्करराय की दृष्टि में उ
‘शब्दस्योच्चारण’ मात्र है । यह ऐसा प्रयास है यथा—वह्निविहीन भस्म में हवि
डालना—‘भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥’ इसके अतिरिक्त उसकी
दशा गधे की भाँति है—‘‘यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ॥’’
निष्कर्ष—‘यद धीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते ।
अनग्नाविव शुष्कौधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥’
जो व्यक्ति मन्त्रार्थ—विरमित मन्त्र का जप करता है वह दरिद्रता, विपत्ति एवं
नरक तीनों को आमंत्रित करता है—
श्रोत्रादीनां ज्ञानाभावे मन्त्रजापं करोति यः ।
दारिद्र्यं च विपत्ति च नरकं प्राप्नुयातु सः ॥२
‘यामल’ में कहा गया है कि ‘‘मन्त्र का अर्थ देवता है’’ और ‘‘मन्त्र एवं
देवता में वाच्यवाचकभावेन अभेद है’’—‘‘मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि ।
वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ॥’’३ ‘मन्त्र’ वाचक है और ‘देवता’ वाच्य है
१. वरिवस्यारहस्यम् २-३. शाक्तानन्द तरंगिणी
द्वितीयोऽंशः २२५
‘वाच्या हि देवता देवमन्त्रो हि वाचकः स्मृतः । वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव
प्रसीदति ।।’’ इसीलिए भगवान शिव पार्वती को सावधान करते हुए कहते हैं—
“मन्त्रार्थं परमेशानि सावधानावधारय”१ ‘योगशास्त्र’ में अर्थभावन के साथ ही जप
का विधान किया गया है—‘तज्जपस्तदर्थभावनम्’२
ते चार्थस्तन्त्रोपनिषद्ग्रन्थभेदेन नानाविधाः शिवेनोक्ताः । तांश्च संजिघृक्षुरु-
द्दिशति—
अथातः पूर्णगायत्र्याः प्रतिपाद्योऽर्थ आदिमः ।
भावार्थः संप्रदायार्थो निगर्भार्थस्तुरीयकः ॥ ५७ ॥
कौलिकार्थो रहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च ।
नामार्थः शब्दरूपार्थश्चार्थो नामैकदेशगः ॥ ५८ ॥
शाक्तार्थः सामरस्यार्थः समस्तसगुणार्थकौ ।
महावाक्यार्थ इत्यर्थाः पञ्चदश्याः स्वसंमिताः ॥ ५९ ॥
(अर्थों के विभिन्न भेद)
इसलिए इसके अनन्तर सर्वप्रथम पूर्ण गायत्री (चरणचतुष्टयसम्पन्ना गायत्री
मन्त्र) के प्रतिपाद्य अर्थ फिर भावार्थ, संप्रदायार्थ, चौथा निगर्भार्थ, कौलिकार्थ,
रहस्यार्थ, महातत्त्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ,
समस्तार्थ, सगुणार्थ एवं महावाक्यार्थ—अर्थात् उतने अर्थ जितने कि पञ्चदशी मन्त्र
के अपने वर्ण हैं—की मीमांसा की जाएगी ॥ ५७-५९ ॥
- प्रकाश *
अथानन्तरम्, अत उक्तरीत्या अर्थज्ञानस्यावश्यकत्वात्, अर्थाः कथ्यन्त इति
शेषः । पूर्णगायत्र्याश्चतुर्थचरणसहितायाः । स्व आत्मीया वर्णाः तैः संमिताः, तत्संख्या-
समानसंख्याकाः । पञ्चदशेति यावत् । अथ वा, संप्रदायार्थप्रकरणे कादिविद्यायां
सप्तत्रिंशद्वर्णाः स्फुटीकरिष्यन्ते, तत्संमिता अर्था इत्यर्थः ॥ ५७-५९ ॥ - सरोजिनी *
‘भावार्थ’—मन्त्र के अवयवभूत अक्षर का अर्थ ही ‘भावार्थ’ है । ‘संप्रदायार्थ’
= (परमेश्वर ही मन्त्रों के मूल हैं) अतः गुरुमुख से स्वीय मन्त्र का उद्भव एवं
उसका अवतरण-क्रम या परम्परा का ज्ञान मन्त्र का ‘संप्रदायार्थ’ है । ‘निगर्भार्थ’—
परमेश्वर, गुरु एवं निजात्मा का ऐक्यानुसन्धान ही निगर्भार्थ है । ‘कौलिकार्थ’ =
(निष्कल परमेश्वर का जिन्होंने स्वात्मरूप में साक्षात्कार किया है वही गुरु है । अतः
गुरु एवं परमेश्वर अभिन्न हैं 1) चक्र, देवता, विद्या, गुरु एवं साधक का
१. शाक्तानन्द तरंगिणी २. योगसूत्र
१५ वरि.
२२६ वरिवस्यारहस्ये
ऐक्यानुसन्धान ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है। 'रहस्यार्थ'—मूलाधारस्थ कुण्डलिनीरूपा
विद्या ही साधक की स्वात्मा है—इस रूप की भावना का नाम ही 'रहस्यार्थ' है।
'महातत्त्वार्थ' = निष्कल अणु से अणुतर, तथा महान् से महत्तर, निर्लक्ष्य,
भावातीतः, व्योमातीत परमतत्त्व के साथ प्रकाशानन्द रूप में विश्वातीतः एवं विश्वमय
निज गुरु के द्वारा प्रबोधित निर्मलस्वभाव स्वकीय आत्मा का ऐक्यानुप्रवेश
'महातत्त्वार्थ' है। इन समस्त अर्थों के परिज्ञान से पाशात्मक विकल्प जाल सम्यक्
प्रकार से निवृत्त हो जाते हैं ।१
१. 'भावार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—अम्बा (देवी) मन्त्र एवं
जगत् में अभेद का प्रतिपादन 'भावार्थ' है—'तेनाम्बामनुजगतामभेद एवात्र
भावार्थः ॥'२
२. 'सम्प्रदायार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—कार्य एवं कारण, वाच्य
एवं वाचक, ब्रह्म एवं जगत् में अभेद होने के समान ही जगत् एवं विद्या
में भेदाभाव का प्रतिपादन ही 'संप्रदायार्थ' है।
'योगिनीहृदय' में षड्विध अर्थ—'योगिनीहृदय' में निम्न छः प्रकार के मन्त्रार्थों
का विवेचन किया गया है जो निम्न है—"षड्विधस्तं तु देवेशि ! कथयामि
तवानघे। भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भार्थश्च कौलिकः रहस्यार्थो गहातत्वार्थ एव च ।
अथराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।" (१५, १६) १. भावार्थ २. सम्प्रदायार्थ
३. निगर्भार्थ ४. कौलिकार्थ ५. सर्वरहस्यार्थ ६. महातत्त्वार्थ ।। (मन्त्र सङ्केत) ।।
'नामार्थ' 'शब्दरूपार्थ' 'नामैकदेशार्थ' 'शाक्तार्थ' 'सामरस्यार्थ' 'समस्तार्थ'
'सगुणार्थ' एवं 'महावाक्यार्थ'—ये आठ अर्थ भास्करराय के स्वकल्पित नये अर्थ हैं
जो कि 'योगिनीहृदय' में उल्लिखित नहीं है ।
जगत् एवं विद्या में अभेद है—यही 'संप्रदायार्थ' है३—
“जन्यजनकयोर्भेदाभावाद वाच्यस्य वाचकेनापि ।
ब्रह्मणो जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायार्थः ।। ८१ ।।”
३. 'निगर्भार्थ'—'वरिवस्यारहस्यम्' के अनुसार—'निगर्भार्थ' का स्वरूप इस
प्रकार है—"सर्वातिशायी सत्त्व परमशिव में एकात्मकता या अन्य पदार्थों
का अभाव (निष्कलत्ता), अपने दीक्षा गुरु एवं उस परमशिव में अभेद
तथा उस (गुरु) की कृपावश अपने एवं उस परमशिव में अभेद-दर्शन ही
निगर्भार्थ है"—
१. भारतीय संस्कृति और साधना (प्र०ख०) (पृ० ३३९-३४०)
२. 'अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।'
कूटत्रयात्मिका देवी समष्टि व्यष्टि रूपिणीम् ।
आद्यां शक्ति भावयन्तो भावार्थमिति मन्वते ।। २५ ।। (योगिनीहृदय)
३. तथा मन्त्राः समस्ताश्च विद्यायामन्त्र संस्थिताः ।। ४७ ।। (योगिनीहृदय)
गुरुक्रमेण संप्राप्तः संप्रदायार्थ ईरितः ।।
द्वितीयोऽंशः २२७
“परमशिवे निष्कलता तदभिन्नत्वं स्वदेशिकेन्द्रस्य ।
तत्करुणातः स्वस्मिन्नपि तदभेदो निगर्भार्थः ॥”
४. ‘कौलिकार्थ’—वरिवस्यारहस्यम् के अनुसार—माता, विद्या, चक्र स्वगुरु
एवं स्वयं में—(इस प्रकार पाँचों में) अभेदभावना ही मन्त्र का पञ्चनामपि
भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ १०२ ॥१
५. ‘रहस्यार्थ’—कुण्डलिनी साक्षात् विद्या एवं माता से अभिन्न है । इससे
अपने को अभिन्न देखना ही श्रीविद्या का रहस्यार्थ है—
“साक्षाद्विद्यैवैषा न ततोभिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ॥ १०७ ॥”
६. ‘महातत्त्वार्थ’—वाणी, मन एवं इन्द्रियों द्वारा अगम्य (३६ तत्त्वों से
अतीत) महान से महत्तर, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, व्योम से भी ऊपर स्थित,
विश्व से अभिन्न, चित् एवं आनन्दस्वरूप परब्रह्म में अपने आपको उस
(ब्रह्म के साथ) अभेद की प्राप्ति के लिए नियुक्त करना चाहिए, यह
श्रीविद्या का ‘महातत्त्वार्थ’ है—
“ब्रह्मणि परे नियोज्यः स्वात्मा तद्भेदसंप्राप्त्यै ।
एष भहातत्त्वार्थः श्रीविद्यायाः शिवेनोक्तः ॥ १०९ ॥”
७. ‘नामार्थ’—एवं ‘शब्दरूपार्थ’—यह विद्या स्वयं अपने घटक अक्षरों द्वारा
व्यक्त अर्थों से अभिन्न है । उसका स्वरूप उसका प्रत्येक अक्षर है ।
श्रीविद्या के ‘नामार्थ’ एवं ‘शब्दरूपार्थ’ का यही स्वरूप है—
“तत्तद्वर्णार्थेयं तत्तद्वर्णस्वरूपेयम् ।
इति तु श्रीविद्याया नामार्थः शब्दरूपार्थः ॥”
८. नामैकदेशार्थ—कल्याणी एकाक्षरी, ईशित्री, ललिता आदि देवी के तीन
सौ नामों का तात्पर्य मन्त्र के आदि अक्षरों द्वारा व्यक्त होता है नाम के
१. कौलिकं कथयिष्यामि चक्रदेवतयोरपि ॥ ५१ ॥ (योगिनीहृदय)
विद्यागुर्वात्मनामैक्यं तत्प्रकारः प्रदर्श्यते ॥
‘चक्र-देवता-गुरु-विद्या-साधकानामैक्यानुसन्धानं कौलिकार्थः ॥ (दीपिका) ॥
शिव-गुर्वात्मैक्यगोचरानुसंधानात्मको निगर्भार्थः ॥ (दीपिका) ‘श्रीचक्रं श्रीमाता श्रीविद्या
श्रीगुरुरात्मा चेति पंचानामैक्यं कौलिकार्थ इत्युच्यते । (सेतुबन्ध : भास्करराय)
२. महातत्त्वार्थ इति यत्तच्च देवि ! वदामि ते ।
निष्कले परमे सूक्ष्मे निर्लक्ष्ये भाववर्जिते ॥ ७३ ॥ (योगिनीहृदय)
व्योमातीते परे तत्त्वे प्रकाशानन्द विग्रहे ।
विश्वोत्तीर्णे विश्वमये तत्त्वे स्वात्मनियोजनम् ॥ ७४ ॥ (योगिनीहृदय)
परमशिवरूपे निजगुरु प्रबोधित निर्मलस्वभाव स्वात्मनि ।
योजनं तदेकतानुप्रवेशो महातत्त्वार्थः । (अमृतानन्दनाथः—दीपिका)