वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० वरिवस्यारहस्ये
अहोरात्र में २१ हजार छः सौ बार श्वास-प्रश्वास के माध्यम से जो श्वसन-क्रिया
सम्पादित करता है उसमें अपानवायु के साथ 'सकार' बाहर फेंकता है एवं 'हङ्कार'
के साथ प्राणवायु ग्रहण करता हुआ अहोरात्र 'हंसः' मन्त्र का जप किया करता
है—इस "हंसः हंसः हंसः हंसः" के स्वरूप वाले इस स्वाभाविक श्वासप्रश्वासात्मक
मन्त्र की आवृत्ति का नाम ही 'जप' है—यही मन्त्र उलट कर जपने से 'सोऽहं' बन
जाता है—
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः ।
हंस हंसेत्यतो मन्त्रं जपो जपति नित्यशः ॥
षट् शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः ।
जपो देव्या विनिर्दिष्टः सुलभो दुर्लभो जडैः ॥
यह जप स्वयमेव उच्चरित है—इसका कोई जापक नहीं है और न तो इस
जप का कोई प्रतिहन्ता ही है—
'नास्योच्चारयिता कश्चित्प्रतिहन्ता न विद्यते ।
स्वयमुच्चरते देवि प्राणिनामुरसि स्थितः ।।'
विश्वपूरण परभाव स्वस्वभाव में जो भावना (विमर्शना) भावित (संपादित) होती
है वही 'जप' है । यह जप अकृताहंविमर्शात्मा नाद है और इसका जप्य है
स्वात्मदेवता ।।
८. 'शिवसूत्रवार्तिक' में जप की दृष्टि—वार्तिककार वरदराज का कथन है
कि 'जनिपालनधर्मत्व के कारण' जिसे 'जप' कहा जाता है वह अकृत्रिम अहं के
आमर्श से परिप्लावित, स्वात्मावमर्शी, याथार्थ्यवादी, स्वात्मपरामर्श संपदा से युक्त
योगियों की 'स्वैरअभिलापात्मा कथा' है । वही योगीन्द्रविषया कथा 'जप' है—
अकृत्रिमाहमामर्शमयस्वात्मावमर्शिनः ।। १११ ।।
'या या स्वैराभिलापात्मा कथा याथार्थ्यवादिनः ।
भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।। ११२ ।।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ।। ११३ ।।
जनिपालनधर्मत्वाज्जप इत्यभिधीयते ।
अथेदृग्विधयोगीन्द्र विषयापि च या कथा ।। ११५ ।।
जपः सोऽपि जनस्योक्तो जनिपालन योगतः ।।"
'जयसंहिता' में कहा गया है कि "एक ही मन्त्रनाथ अन्तर और बाह्य दोनों
में उदित होकर एक हो जाता है तब उस 'जप' को लक्ष संख्या से भी अधिक
समझना चाहिए ।।" अर्थात् 'जप' मन्त्रनाथ के अन्तर एवं बाह्य में उदित होकर
एक हो जाने की प्रक्रिया की संज्ञा है ।
'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है कि "आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का '