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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 530 में से

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पृष्ठ 316

२१४ वरिवस्यारहस्ये
४. जप का चतुर्थ रूप (योग वाचिक) = लक्ष्य के भीतर मन को केन्द्रित
करके वाणी द्वारा जप करना योग वाचिक जप है ।
५. जप का पञ्चम रूप (योगमानसिक) = बीजानारोहण क्रम से मन के
द्वारा जप करना योग मानसिक जप है ।
६. जप का छठवाँ रूप (वाङ्मानसिक यौगिक) = यह अनुत्तम जप है ।
वाचिक जप—वाक् प्रवर्तन; मानस जप—श्री एवं योगसिद्धियों की प्राप्ति; वाङ्मानस
जप—वाग्ज्ञान, ऐश्वर्यसिद्धि अणिमादिक सिद्धियों की प्राप्ति ।१
जप और उसके अङ्ग—'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्चषट् सप्त । न
व च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।। 'जप' के साथ मन्त्रावयवों की
अनुविद्धता अपरिहार्य है । जैसे माला के मनकों को एकीकृत करने के लिए सूत्र
आवश्यक है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न मन्त्राक्षरों को एकात्मता में पिरोने के लिए
मन्त्रावयव रूप सूत्र की आवश्यकता होती है । मन्त्रावयव रूप सूत्र में पिरोये
मन्त्राक्षरों का उच्चारण करना ही जप है इसीलिए भास्कराचार्य कहते हैं—
'एवमवस्था शून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ।।'२
१. भास्कराचार्य के मत में जप के मूलभूत अङ्ग—आचार्य भास्कर कहते हैं
कि मन्त्राक्षरों के उच्चारण की आवृत्तियाँ मात्र ही 'जप' नहीं है बल्कि मन्त्रावयवों के
साथ मन्त्रोच्चारण 'जप' है उन्होंने मन्त्रावयवों को ही जप के अङ्ग के रूप में
स्वीकार किया है जो निम्न है—(१) छः शून्य (२) पाँच अवस्थायें (३) सात
विषुव (१८ अङ्ग) । सारांश यह है कि मन्त्र-जप के अवयवभूत अङ्ग निम्न हैं—
(क) मन्त्राक्षरों का 'उच्चारण'—'अणोच्चरणं तु जपः' (वरि० ५२)
(ख) मन्त्राक्षरों के 'अर्थचिन्तन' एवं मन्त्रार्थ—चिन्तन के साथ किया गया
मन्त्रोच्चारण—
“मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणां तु जपः ।।”
अर्थात् जप के साथ मन्त्रार्थ चिन्तन भी आवश्यक है । मन्त्रार्थ निम्न है—
'षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे । भावार्थः सम्प्रदायार्थो निगर्भाथैश्च कौलिकः ।
तथा सर्वरहस्यार्थो महातत्त्वार्थ एव च । अक्षराथों हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ।।'
'योगिनीहृदय' में मन्त्रार्थ के ये निम्न प्रकार है—(१) 'भावार्थ' (२) 'संप्रदायार्थ'
(३) 'निगर्भार्थ' (४) 'कौलिकार्थ' (५) 'सर्वरहस्यार्थ' (६) 'महातत्त्वार्थ' ।।३
२. आचार्य भास्करराय के मतानुसार मन्त्रार्थ—'योगिनीहृदय' में तो मात्र
मन्त्रार्थ के उक्त छः प्रकार ही बताए गए हैं किन्तु 'वरिवस्यारहस्यम्' में मन्त्र के
१. स्वच्छन्दतन्त्र २. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक ५२)
३. योगिनीहृदय