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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 530 में से

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पृष्ठ 319

प्रथमोऽंशः २१७
(ग) ‘सुषुप्त्यवस्था’—‘म’१ ┐ सुषुप्ति भावना का स्थान भ्रूमध्य के बिन्दु
│ में हैं । यह बिन्दु हल्लेखा को ऊर्ध्व बिन्दु
┘ है ।
(घ) ‘तुरीयावस्था’२ ┐ अर्धचन्द्र, रोधिनी, और नाद इन तीन
┘ मन्त्रावयवों को तुरीयावस्था माननी चाहिए ।
(ङ) ‘तुरीयातीतावस्था’३ ┐ नादान्त से शक्ति, व्यापिनी एवं समना में
│ तथा उन्मना में तुरीयातीतावस्था है । उन्मना
┘ से परे कोई अवस्था है ही नहीं ।
अर्धमात्रा आदि में प्रतिकलित चैतन्य ही ‘मन्त्र’ है । मन की मात्रा जितनी ही
प्रसृत होती है मन का उतना ही अंश क्षुद्रतर होता जाता है और उसी अनुपात में
उतना ही चिदालोक शुभ्रतर होता जाता है । ‘बिन्दु’ मात्रा से मात्राहीन में जाने का
द्वार है । यहाँ ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुरी एकाकार है—यह निरालम्ब भाव का स्थान
है । मात्रा-भङ्ग के कारण अर्द्धमात्रा का उदय होता है ।
(घ) ‘अवस्था’, ‘मन्त्रार्थ’ के साथ ‘शून्य’-ज्ञान सहित मन्त्रोच्चारण ‘‘जप’’
है—‘जप’ का एक अङ्ग शून्य-ज्ञान भी है । बीजमन्त्र (ओंकार) के १२ अवयव
हैं । ज्योतिर्मय एकाकारता ही ‘शून्य’ है । द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम दशम एवं
द्वादश अवयव ‘शून्य’ कहलाते हैं । इनमें प्रथम पाँच शून्य ‘अवान्तर शून्य’ एवं
छठवाँ ‘महाशून्य’ कहलाता हैं ।
अ, उ, म, बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी समना
एवं उन्मना—प्रणवरूप महामन्त्र के ये ही बारह अवयव हैं । इनमें से प्रति द्वितीय
अवयव ‘शून्य’ कहलाता है । प्रथम पाँच शून्यों को तो निराकार कहना समीचीन
नहीं किन्तु छठवाँ शून्य निराकार है । भास्कर कहते हैं कि—तृतीय कूट के रेक,
बिन्दु, रोधिनी, नादान्त एवं व्यापिका में पाँच शून्यों की भावना करनी चाहिए और
उन्मनी में रूप शून्य महाशून्य की भावना करनी चाहिए ।। रेफ, बिन्दु, निरोधिनी,
नादान्त एवं नादान्त में पञ्च शून्यों की भावना करनी चाहिए । (दीपिका पृ०
३१२) । पाँचवे के बाद छठवें शून्य के रूप में उन्मनी को ग्रहण करना चाहिए ।
यह महाशून्य है और निराकार है । (दीपिका पृ० ३१२) जब तक मन जाग्रत
नहीं होता तब तक मन्त्र का मन्त्रत्व उदित ही नहीं होता सुषुम्ना का स्रोत चैतन्य
का प्रवाह है । मन को जगाकर ऊर्ध्वमुखी सुषुम्ना की धारा में डालना होगा । मन
को चेतन करके उठाना होगा । यह जाग्रत मन ही मन्त्र है इसीलिए ‘चित्तं मन्त्रः’
१. आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्तया तार्तीय बिन्दौ
सा ।—वरिवस्यारहस्यम्
२. तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जक नादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।।
३. आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुर्यातीतावस्था सा
नादान्तादिपञ्चके भाव्या ।।—वरिवस्यारहस्यम्