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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 530 में से

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पृष्ठ 314

२१२ वरिवस्यारहस्ये
'तद्बलं निरावरणचिदुल्लासरूपं परशक्त्याख्यमाक्रम्याधिष्ठाय मन्त्राः बीज पिण्ड
पद नामरूपा मननत्राणधर्मिणः सहजनादशक्त्युद्बोधदीप्तत्वात् । सर्वज्ञत्वादिना बलेन
श्लाघायुक्ता'—इसका अर्थ यह हुआ कि जब 'मन्त्र' नादशक्ति-उद्बोधित है तब
'जप' वह प्रक्रिया है जिसमें नादोत्थान हो एवं चित् का उल्लास हो ॥
११. योगसूत्रभाष्यकार व्यास की जप-दृष्टि—योगसूत्रकार पतंजलि कहते
हैं—'तज्जपस्तदर्थभावनम्' (१।२८) अर्थात् उस (प्रणव) का जप एवं उस प्रणव के
अर्थभूत परमात्मा की भावना करनी चाहिए ॥ ('प्रणवस्य जपः प्रणवाभिधेयस्य
चेश्वरस्य भावनम्')१ 'ओंकार को जपते हुए एवं ओंकार के अर्थ 'ईश्वर' की भावना
करते हुए योगी का चित्त एकाग्र होता है ।'२ 'विष्णुपुराण' में कहा गया है कि
ओंकार के पश्चात् योग-साधन एवं योग-साधन के पश्चात् जप करना चाहिए । जप
एवं योग की सिद्धि से परमात्मा का साक्षात्कार होता है—
“स्वाध्यायाद्योग मासीत योगात्स्वाध्याय मामनेत् ।
स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते ॥”
अर्थात् जपपूर्वक ईश्वरार्थभावना एवं भावनापूर्वक ओंकार का जप करना
चाहिए । ईश्वर-ध्यान से 'जप' को संपुटित करना चाहिए । सारांश—'जप' के बाद
योग एवं योग के बाद 'जप' विधेय है । ('भावन' = 'भावनं पुनः पुनश्चित्ते
निवेशनम्'—'तत्त्व वैशारदी' ।)३ प्रणव जप के साथ ब्रह्मध्यान (प्रणिधान) करना
चाहिए—'प्रणव जपेन सह ब्रह्मध्यानं प्रणिधानं' ।।४ प्रणवेन परंब्रह्म ध्यायीत नियतो
यतिः ।।” ईश्वर-प्रणिधान के दो भेद हैं—(१) 'अहं ब्रह्मास्मि', 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म',
तमेतमात्मानमोमिति ब्रह्मौणैकीकृत्य ब्रह्म चात्मनोमित्येकीकृत्य । (२) प्रकृति-पुरुष दोनों
का विलापन करके अपने अहं को ब्रह्मरूप समझना । (१) प्रथम प्रणिधान—
उपासना । (२) द्वितीय प्रणिधान—तत्त्वज्ञान ।।५
अर्धमात्रादि में जो प्रतिफलित चैतन्य है वही 'मन्त्र' है । इसीलिए
'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' कहा गया है । 'जप करना' एवं 'जप होना'—इस द्विविध रूप
में जप द्विप्रकारी है—
१. 'जप करना'—वैखरी भूमि । वाचिक जप । उपांशु जप । मानसिक जप
२. 'जप होना'—(स्वाभाविक जप) (१) हृदय में जप, फिर (२) नाभि में
जप, फिर (३) मूलाधार में जप ।
(बाह्य जप में मन्त्राक्षरों का पृथक्-पृथक् उच्चारण रहता है—वह विकल्पमय
है—अतः वह मन्त्र नहीं है । मध्यमा में भूमि में मन्त्र नाद के साथ स्वतः ध्वनित
१-२. व्यास भाष्य ३. तत्त्व वैशारदी (वाचस्पति मिश्र)
४. योगवार्तिक (विज्ञान भिक्षु)
५. प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती-'जपसूत्रम्'—'भावन' का अर्थ भावना (चिन्तन करना)
नहीं है 'भावन' (होने देना) है ।