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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः २१९
(च) 'अवस्था', 'मन्त्रार्थ', 'शून्य', 'विषुव' के साथ 'चक्रों के ज्ञान के साथ
मन्त्रोच्चारण करना 'जप' है ।
अकुल सहस्रार-मूलाधार-स्वाधिष्ठान-मणिपूरक-अनाहत-विशुद्धाख्य । सूक्ष्म
जिह्वा; भ्रूमध्य एवं बिन्दुस्थान—इन नौ स्थानों में त्रैलोक्यमोहन आदि चक्रनवक
का भावन करना भी जप का एक अङ्ग है—
१. अकुल सुषुम्नामूल अरुण सहस्रदल कमल में—त्रिपुराधिष्ठित त्रैलोक्यमोहन
चक्र की भावना करना ।¹
२. वह्नि के आधाररूप चतुर्दल कमल में—त्रिपुरेशी से अधिष्ठित
सर्वाशापरिपूरक चक्र की भावना करना ।²
३. शाक्त स्वाधिष्ठान स्थित षड्दल कमल में—त्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित
सर्वसंक्षोभण चक्र की भावना करना ।³
४. नाभि प्रदेश में स्थित दशदलकमल में त्रिपुरवासिनी देवी से अधिष्ठित
सर्वसौभाग्यदायक चक्र की भावना करना ।⁴
५. अनाहत प्रदेश के द्वादशदल कमल में त्रिपुरा श्रीसमधिष्ठित सर्वार्थसाधक
चक्र की भावना करना ।⁵
६. विशुद्धचक्र के षोडशदल कमल में त्रिपुरमालिनी से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर
चक्र की भावना करना ।⁶
७. लम्बिकाग्र में तालूमूल के अष्टदलकमल में त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित
सर्वरोगहर चक्र की भावना करना ।
८. भ्रूद्वय के मध्य द्विदल पद्म में त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रद चक्र
की भावना करना ।⁷
९. इन्द्रात्मक ललाट के बिन्दु में महात्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय
चक्र की भावना करना⁸ ही जप के साथ 'चक्रभावन' की पद्धति है ।
चक्रभावना का यह विधान 'योगिनीहृदय' में भी प्रतिपादित किया गया है—
“अकुलादिषुपूर्वोक्त स्थानेषु परिचिन्तयेत् । चक्रेश्वरी समायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥'⁹
आचार्य भास्कर का कथन है कि—'सङ्केतपद्धति' आदि ग्रन्थों में 'चक्रभावन'
के तीन प्रकार कहे गए हैं—(१) सकल (२) निष्कल (३) सकल निष्कल ॥
शून्य—'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोकं में 'शून्यषट्क' एवं ४४वें श्लोक में
शून्य त्रय की भावना का उल्लेख है इसी प्रकार—'योगिनीहृदय' में भी 'शून्यषट्क'
एवं 'शून्यत्रय' का उल्लेख किया गया है—'शून्यषट्कं तथा देवि ह्यवस्था पञ्चकं
पुनः' 'शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरतः प्रिये ॥' शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं
१-९. अमृतानन्दनाथ—दीपिका