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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 530 में से

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२२० वरिवस्यारहस्ये
विभावयेत ॥ (३।१७६-१७७) 'स्वच्छन्दतन्त्र' (४।२८९-२९६) में भी शून्यषट्कं
का उल्लेख पाया जाता है । योगिनीहृदयदीपिका में अमृतानन्दनाथ ने कहा कि छः
शून्यों के स्वरूप को 'विज्ञानभैरव' के ३२वें श्लोक से जानना चाहिए ।
'स्वच्छन्दतन्त्र' के अनुसार—(१) ऊर्ध्वशून्य (२) अधःशून्य (३) मध्य
शून्य-शून्यत्रय हैं । क्षेमराज ने—(१) शक्तिपद को—ऊर्ध्वशून्य (२) हृदय को अधः
शून्य एवं (३) कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र को 'मध्यशून्य' माना है एवं
'व्यापिनी' में चतुर्थ, 'समना' में पञ्चम एवं 'उन्मना' में 'षष्ठ शून्य' माना है ।
उन्होंने इन सभी सहेतुक शून्यों का त्याग करके 'सप्तम शून्य' (परमसूक्ष्म शून्य) में
लीन होने का विधान किया है । उन्होंने कहा कि शून्य दो प्रकार के हैं—(१)
अभावा