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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 530 में से

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पृष्ठ 313

प्रथमोंऽशः २११
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियारहित है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग (मन्त्र जप) करना चाहिए वही मन्त्र सफल होता है ॥"
'श्रीवैहायसी' में कहा गया है कि—सन्धिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित
'जप' करना चाहिए । सूत्र में ग्रथित मणि के समान शक्ति के ताने बाने से
निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करते हुए जप करना चाहिए । वह शक्ति परम व्योम
में रहती है और परमामृत से समृद्ध है । उक्त रीति से 'जप' करने पर ही मन्त्र
अपने स्वरूप को प्रकट करता है अन्यथा अपने को गुप्त रखता है ।
'ध्यानं जपेन' (शाक्तदर्शन) कहकर आचार्य हयग्रीव ने कहा है कि जप का
ध्यान से एवं ध्यान का जप से सम्बंध है । आचार्य अगस्त्य ने जप का बंध-क्षय
से सम्बंध स्थापित करते हुए कहा है—'जपाद्बन्धो नश्यति ॥"
९. 'हंस पारमेश्वर' में जप की दृष्टि—'जप' वर्णों के उच्चारण की प्रक्रिया
नहीं है प्रत्युत् सुषुम्णा मार्ग में नादोच्चारण है । इसीलिए कहा गया है कि वर्णरूप
मन्त्र 'पशुभाव' में स्थित हैं और जब वे सुषुम्णामार्ग से उच्चरित होने लगते हैं तो
'पशुपति' बन जाते हैं"—
'पशुभावेस्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥
९. 'त्रिकसार' में जप की दृष्टि—'त्रिकसार' में कहा गया है कि चिच्छक्ति
के बल का स्पर्श न होने के कारण मन्त्रों के वर्ण जड़ अक्षर ही रहते हैं—
'चिच्छक्तिबला स्पर्शात् केवलं वर्णरूप मात्रा रूपत्वान्मन्त्रपुत्रिकाकरण निष्फल चेष्टा
भवन्ति ॥'१
वर्णातीत परतत्त्व के विदित हो जाने पर मन्त्राधिप भी मन्त्र के साथ मांत्रिक
के किङ्कर हो जाते हैं
विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किङ्करत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥२
तात्पर्य यह है कि चूँकि 'मन्त्र' चित्तत्त्व की रश्मियाँ हैं—
“मन्त्राश्चिन्मरीचयः”—अतः 'जप' जापक द्वारा चैतन्य तत्त्व के साथ तादात्म्यप्राप्ति
की एक प्रक्रिया है न कि जड़ अक्षरों की पुनरावृत्ति मात्र ॥
१०. 'स्पन्दप्रदीपिका' में जप की दृष्टि—आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्द प्रदीपिका'
में कहते हैं कि मन्त्र का 'बल' है निरावरण चित् का उल्लास । इसी बल को
लेकर मन्त्र सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । और उनमें
सर्वज्ञता आदि का बल समाविष्ट होता है 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः'
(स्पं० का २६)
१. स्पन्द प्रदीपिका २. त्रिकसार