वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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हो उठता है । हृदय जप को ही मध्यमा मार्ग में प्रवेश समझना चाहिए क्योंकि इस
स्थिति में नाद अपने आप चलता रहता है । बाह्य जप में नाद-श्रुति नहीं होती ।
मध्यमा भूमि में जब नाद के साथ मन्त्र स्वभावतः ध्वनित होने लगे तब उसे
आन्तरिक जप समझना चाहिए ।) आभ्यन्तर नाद का उच्चारण होना ही जप का
प्रधान लक्षण है—
‘संयम्येन्द्रियग्रामं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥’
‘जप के साथ मन्त्रावय व समूह में ६ शून्यों, ५ अवस्थाओं ७ विषुवों की
भावना भी करनी पड़ती है । ‘जप’—ध्वनि (व्यक्त एवं अव्यक्त) संख्या एवं भाव
(अर्थ) इन तीनों की त्रिपुरी है ।१
मन्त्र में चार बातें मुख्य हैं—(१) बीज (२) पिण्ड (३) पद (४) नाम ।
उनका धर्म है—मनन एवं त्राण । इन सभी का सम्बंध भी जप से है । जप के दो
प्रकार हैं—(१) बाह्य (२) आभ्यन्तर । बाह्यजप = वैखरीनाद का विलास ।
आभ्यन्तर जप = मध्यमा नाद का विलास ॥
‘शाक्तानन्दतरंगिणी’ में अक्षरों की आवृत्ति को ‘जप’ की आख्या दी गई है—
‘जपः स्यादक्षरावृत्तिः’ किन्तु जप की यह परिभाषा वास्तविक जप की नहीं है
क्योंकि वास्तविक जप की आवृत्ति करनी ही नहीं पड़ती प्रत्युत् उसकी आवृत्ति
अपने आप होती रहती है । .
जप के द्वारा देवता प्रसन्न होते हैं एवं उससे सिद्धि मिलती है—
“जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति ।
जपात्सिद्धिर्जपात्सिद्धिर्न संशयः ॥”
जप के भेद—‘स्वच्छन्दतन्त्र’ में जप के ६ भेद बताए गए हैं—(१) वाचिक
(२) मानस (३) यौगिक (४) योग वाचिक (५) योग मानसिक (६) वाङ्मानसिक
यौगिक ॥
१. जप का प्रथम रूप (वाचिक) = देवी का ध्यान करते हुए वाणी द्वारा
मन्त्रोच्चारण “वाचा केवलयोच्चार्य मन्त्र देवी विभाव्य च ।”
२. जप का द्वितीय रूप (मानस) = सावधान चित्त से देवी के रूप का
सम्यक् रीति से चिन्तन करते हुए मन्त्रानुसंधान ‘देव्या रूपं च संचित्य सावधानेन
चेतसा । मन्त्रस्याप्यनुसंधानं मानसं परिकीर्तितम् ॥’
३. जप का तृतीय रूप (यौगिक) = तीन स्थानों से क्रमशः तीन बीजों को
यथामार्ग चिन्तित करके उनका आरोहण करना ‘यौगिक जप’ है ।
१. जपसूत्रम् (प्रत्यगात्मानन्द सरस्वती)