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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 530 में से

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पृष्ठ 310

२०८ वरिवस्यारहस्ये
इस दृष्टि के अनुसार—'मैं ही ब्रह्म हूँ' मैं ही शिव हूँ, इस अनाहत नादरूपी
शब्द (सोऽहं, हंसः) की निरन्तर भावना ही 'जप' है ।
'स्वच्छन्दतन्त्र'१ में कहा भी गया है कि 'मैं इस जगत् का परम कारण परम
हंस, प्राणमय शिव हूँ'—इस प्रकार से अहर्निश स्वभावतः प्रवर्तमान अपने प्राणमय
अजपास्वरूप का विमर्श ही जप है । इसीलिए स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है—
अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम् (४।३९९) । जपनीय मन्त्र भी स्वयं नादात्मक
ब्रह्म ही है । इसमें अपने अकृत्रिम अहमात्मक स्वरूप का निरन्तर परामर्श होता
रहता है—'स्वयं नादो मंत्रात्मा अकृत्रिमाहंविमर्शात्मा ।'
'श्रीकण्ठीसंहिता' में कहा गया है कि—'पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिध्यति
कदाचने' अर्थात् मन्त्र और मन्त्री (मन्त्र और मन्त्रजापक) तथा मन्त्र की अधिष्ठात्री
देवता—ये कभी पृथक् नहीं होते अतः इनको पृथक् मानकर जप करने से कभी
सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।। जप का विषय नादात्मक मन्त्र ही है । इसमें साधक को
परम तत्त्व के साथ अपनी प्रत्यभिज्ञा की स्पष्ट प्रतीति होने लगती है ।
२. 'योगिनीहृदय दीपिका' में जप की दृष्टि२—इस ग्रन्थ के अनुसार इन्द्रियों
की बहिर्मुख प्रवृत्ति को रोककर आन्तर अनाहत नाद की निरन्तर भावना करना ही
जप' है —
“संयमेन्द्रिय सञ्चारं - प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्ता न तु बाह्य जपो जपः ॥”
ग्रन्थकार ने बाह्य जप को जप स्वीकार ही नहीं किया—'न तु बाह्य जपो
जपः । विकल्पात्मक विविध वर्णों के संघात से विनिर्मित मन्त्रों का बाह्योच्चारण
जप नहीं है ।
३. 'तन्त्रालोक' में जप की दृष्टि३—इस ग्रन्थ में कहा गया है कि 'तत्स्वरूपं
जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः ॥' अर्थात् 'उस परम कारण शिव का आत्मस्वरूप
ही जप है । भावाभाव (प्राणापान आदि गत्यात्मक) पद की सीमा को अतिक्रान्त
कर जाने की दशा (जहाँ चिदैक्य परामर्श हो) ही जप है—'“तस्य शिवस्य स्वरूपं
परावाक्स्वभावम् आत्मरूपम् अर्थात् भूयो भूयः परादृश्यमानं जपः अतएव
भावाभावपदच्युतः ॥ तन्मध्यस्फुरत्संवित्परामर्शमात्रसार इत्यर्थः ॥'४ शिव का
स्वात्मरूप परावाक् है । परावाक् का शाश्वत परामर्श ही जप है । इस परामर्श दशा
में भावाभावात्मक पद में स्थिति नहीं रहती प्रत्युत् मध्यावस्थान की दशा प्राप्त हो
जाती है । भाव एवं भावाभाव दोनों की स्थितियाँ सङ्कोचात्मक होती है अतः साधक
'इसका त्रोटन करता है और मध्य में विराजमान होता है । वहीं पर संवित् का
अमृत परामर्श होता है । यही अमृतात्मक परामर्श ही 'जप' है ।
१. स्वच्छन्दतन्त्र (४।३९९) २. योगिनीहृदय दीपिका (पृ० १९५)
३. तन्त्रालोक (१।९०) ४. जयरथ-'विवेक' (तन्त्रालोक टीका)