सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 320

२१८ वरिवस्यारहस्ये
(शिवसूत्र) कहा गया है । मन का भागांश इस प्रकार है— (१) बिन्दु में १/२
मात्रा (२) अर्द्धचन्द्र में १।४ मात्रा (३) निरोधिनी में १।८ मात्रा (४) नाद में
१।१६ मात्रा (५) नादान्त में १।३२ मात्रा (६) शक्ति में १।६४ मात्रा (७)
व्यापिनी में १।१२८ (८) समना में १।१२८ मात्रा = बिन्दु से समना तक की
समस्त मात्राओं का जोड़ १ मात्रा है ।
(ङ) अवस्था, मन्त्रार्थ-विज्ञान, शून्य-ज्ञान एवं विषुवसप्तक के साथ
मन्त्रोच्चारण करना जप है ।
इन विषुवों का निम्न इस प्रकार है—(१) 'प्राणविषुव' (२) मन्त्रविषुव (३)
नाड़ीविषुव (४) प्रशान्तविषुव (५) शक्तिविषुव (६) कालविषुव (७) तत्त्वविषुव ॥
१. प्राणविषुव—प्राण, आत्मा एवं मन के संयोग को 'प्राणविषुव' कहते हैं ।१
२. मन्त्रविषुव—प्रथम कूट के नाद एवं व्यष्टि-समष्टि भेद से अनाहत से
आरम्भ करके ब्रह्मरन्ध्र तक उत्पन्न होने वाले नाद एवं चारों बीज तथा आत्मा की
नादमयी विभावना को 'मन्त्र विषुव' कहते हैं ।
३. नाड़ीविषुव—मूलाधार से उठने वाले नाद के उच्चारण से ब्रह्मरन्ध्र तक
षट्चक्रों की द्वादश ग्रन्थियों को सुषुम्ना के मार्ग से ही ग्रन्थियों का भेदन करता
हुआ नाडी, नाद एवं वर्णों का संयोग 'नाडिका विषुव' कहा जाता है ।
४. प्रशान्तविषुव—रेफ एवं कामकला (ई) एवं बिन्दु से आरम्भ करके ह्रीं के
नादान्त तक एक सूक्ष्मतर नाद उत्पन्न होता है । इस सूक्ष्मनाद का शक्ति के साथ
विलय की 'प्रशान्त विषुव' कहा जाता है ।
५. शक्तिविषुव—शक्ति के साथ लीन इस नाद की भावना को 'समना' में
लीन करनी चाहिए । इसे 'शक्तिविषुव' कहा जाता है—
समनागतमुन्मन्याभेते द्वे शक्तिकाल विषुवाख्ये ॥२
इसमें, शक्त्यन्तर्गतनादं समनायां भावयेल्लीनाम् ॥३
६. कालविषुव—उक्त नाद की भावना समना एवं उन्मनी में करना 'काल
विषुव' कहलाता है ।४
७. तत्त्वविषुव—ककार से उन्मना तक एवं अकुल से उन्मना तक प्रदेशों में
स्थित श्रीविद्याकूटों के अवयवों को व्याप्त करते हुए समस्त ३१७ त्रुटियों एवं साढे
तीन निमेषों को व्याप्त करता हुआ 'नाद' तत्त्व ज्ञान का कारण होता है । यह
शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति का मूल हेतु 'तत्त्व विषुव' कहलाता है ।५
१. प्राणात्ममानसानां संयोगः प्राणविषुवाख्याः ॥ (वरिवस्यारहस्यम् १।४३)
२. योगः प्राणात्म मनसां विषुवं प्राणसंज्ञितम् । (योगिनीहृदयम्)
३-५. वरिवस्यारहस्यम्