वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
प्रथमोऽंशः १६५
कम ८ ।। मात्रायें अर्थात् एक लव कम २९ मात्राकाल में मन्त्र का जप किया
जाना चाहिए ।
'आद्ये' — आद्यकूट (वाग्भव कूट) में । "मध्ये" द्वितीय या कामराज कूट में ।
“सार्धा” = १/२ भाग ।
'तार्तीय कूटे' — तृतीय कूट, शक्ति कूट में ।
'मनोर्जपे' — मन्त्र के जप में । 'जपे' = वाचिक जप में ।
'कालः' — किसी भी मन्त्र या उसके कूट के उच्चारण में कितना समय लगना
चाहिए इसका समयानुशासन ही 'काल' है । मन्त्रोच्चारण काल ही यहाँ 'काल'
शब्द का अर्थ है ॥ ३१ ॥
अथ कूटानां व्यष्टिसमष्टिभेदेन चतुर्धाभिन्नानां स्वरूपविशेषनाह—
व्यष्टि समष्टिविभेदादस्यां चत्वारि बीजानि ।
सृष्टि-स्थिति-संहारा नाख्यारूपाणि भवनीयानि ॥ ३२ ॥
पुटधामतत्त्वपीठान्वयलिङ्गकमातृ तत्समष्टीनाम् ।
रूपान्तराणि बीजाान्यमूनि चत्वारि चिन्तनीयानि ॥ ३३ ॥
(कूटत्रय में बीज चतुष्टय)
इस (विद्या) में (तीनों कूटों पर) व्यष्टि (व्यक्तिगत) एवं समष्टि (सामूहिक)
रूप से विचार करने पर (इसमें) सृष्टि, स्थिति संहार एवं अनाख्या रूप वाले चार
बीजों (के अवस्थान) का चिन्तन करना चाहिए ॥ ३२ ॥
(बीज चतुष्टय का)
पुट, धाम, तत्त्व, पीठ, अन्वय, लिङ्ग एवं मातृका आदि में इन चारों बीजों
की भावना व्यष्टि-समष्टि भेद से करनी चाहिए ॥ ३३ ॥
- प्रकाश *
अनाख्या तिरोधानानुग्रहयोः समष्टिः, कृत्यपञ्चकेष्वप्यौदासीन्यावलम्बनरूपा-
वस्थानविशेषो वा । पुटादिष्टकं धामसप्तकं च त्रित्रिरूपं पृथक्पृथक् तत्समष्टि-
रेकैकैत्येवं चत्वारि चत्वारि । यथा—पुटानि ज्ञातृज्ञानज्ञेयानि तत्सामरस्यं च । धामानि
चक्रनाथदशाशक्तित्रयात्मरूपाणि सप्त । तत्र चक्राण्यग्निचक्रसूर्यचक्रसोमचक्राणि
ब्रह्मचक्रं च । नाथा मित्रेशनाथषष्ठीशनाथोड्डीशनाथाश्चर्यनिन्दनाथश्च । दशा जाग्रत्स्वप्न-
सुषुप्तयस्तुरीया' च । शक्तयः —वामाज्येष्ठारौद्र्यः शान्ता च; इच्छाज्ञानक्रिया अम्बिका
च; कामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिन्यो महात्रिपुरसुन्दरी च । आत्मान आत्मा-
न्तरात्मपरमात्मानो ज्ञानात्मा च । तत्त्वान्यात्मतत्त्वविद्यातत्त्वशिवतत्त्वानि सर्वतत्त्वं च ।
पीठानि कामरूपपूर्णगिरिजालंधराख्योड्डयाणपीठं च । अन्वयाः प्राग्दक्षिणपश्चिमान्वया
उत्तरान्वयश्च । एत एव समयपदेनाम्नायपदेन च कथ्यन्ते । लिङ्गानि स्वयंभूबाणेतराणि
१६६ वरिवस्यारहस्ये
परं च । मातृकाः पश्यन्तीमध्यमावैखर्यः परा च । धामपदार्थत्वेनोक्तं शक्तित्रयं मातृ-
पदस्थ वार्थः ॥ ३२-३३ ॥
- सरोजिनी *
'समष्टि'—समूहात्मक । 'व्यष्टि'—व्यक्तिगत । 'बीज'—१. 'सृष्टि' २. 'स्थिति'
३. 'संहार' ४. 'अनाख्या' ।
'अनाख्या'—निरोधन एवं अनुग्रह की समष्टि । कृत्यपञ्चक में भी औदासीन्य
का विशेषावलम्बन ।
'अस्यां चत्वारि बीजानि'—इसमें चार बीज हैं जो निम्न हैं—१. सृष्टि
२. स्थिति ३. संहार ४. अनाख्या ॥ ३२ ॥
'पुट'—पुटादिष्टक । 'अनाख्या'—तिरोधान-अनुग्रह की सृष्टि कृत्य पञ्चक में
भी औदासीन्यावलम्बनरूप अवस्थान विशेष ।
'धाम'—धामसप्तक ।
'पुट'—ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय एवं उनका सामरस्य ।
'धाम'—सामरस्यचक्र नाथ दशा शक्ति त्रयात्मकरूप सात ।
'चक्र'—अग्निचक्र । सूर्य चक्र । सोमचक्र । ब्रह्म चक्र ।
'नाथ'—मित्रेशनाथ, षष्ठीशनाथ, उड्डीशनाथ, आश्चर्यानन्दनाथ ।
'दशा'—जाग्रत, स्वप्न, सुषुरित, तुरीय ।
'शक्ति'—वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, शान्ता । एवं—इच्छा, ज्ञान क्रिया, अम्बिका
एवं कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी एवं महात्रिपुरसुन्दरी । आत्मा, अन्तरात्मा,
परमात्मा, ज्ञानात्मा ।
'तत्त्व'—आत्मतत्त्व । विद्यातत्त्व । शिवतत्त्व । सर्वतत्त्व ।
'पीठ'—कामरूप, पूर्णगिरी, जालंधर, ओडयाण पीठ ।
'अन्वय'—प्राक्, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर । समय पद । आम्नाय पद ।
'लिङ्ग'—स्वयंभूलिङ्ग । बाणलिङ्ग । इतरलिङ्ग । परलिङ्ग ।
'मातृका'—पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, परा ।
'पुट'—ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय एवं उनका सामरस्य ।
'कामरूप पीठ' क्या है?—'कामरूप पीठ'—जब पराशक्ति आत्मगर्भस्थ एवं
अपने साथ एकीभूत विश्व को देखने के लिए उन्मुख होती है तब शक्ति एवं शिव
साम्यभावापन्न होकर एक बिन्दु के रूप में परिणत हो जाते हैं जिससे कि
पारमार्थिक चैतन्य प्रतिकालित होकर ज्योतिलिङ्ग के रूप में प्रकट होता है । यही
प्रथमोऽंशः १६७
बिन्दु 'कामरूप पीठ' कहलाता है । इस पीठ में अभिव्यक्त चैतन्य 'स्वयंभूलिङ्ग'
कहलाता है । यह शक्तिपीठ शक्ति एवं शिव से समभाव में एक-एक मात्रा लेकर
सङ्घटित है । शिव-शक्ति का यह अंशद्वय-(१) 'शान्ताशक्ति' एवं (२) 'अम्बिका
शक्ति' कहलाता है । इस पीठ में महाशक्ति की अभिव्यक्ति 'परावाक्' के रूप में
होती है । यही प्रणव का परम रूप या वेद का स्वरूप है ।
'पूर्णगिरि पीठ'—शक्ति के क्रमिक विकास के क्रम में आगे 'शान्ताशक्ति'
'इच्छाशक्ति' के रूप में परिणत हो जाती है एवं शिवांश-अम्बिका शक्ति भी 'वामा'
के रूप में परिणत हो जाती है । (शान्ता—इच्छा । अम्बिका—वामा ।) उभय
शक्तियों के पारस्परिक वैषम्य के दूर होने पर एक अद्वय सामरस्यमय बिन्दु का
आविर्भाव होता है जिससे कि तदनुरूप चैतन्य का स्फुरण होता है । इसी बिन्दु
को 'पूर्णगिरि पीठ' कहते हैं । यही हैं 'पश्यन्तीवाक्' की अवस्था ।
'जालन्धर पीठ'—इच्छाशक्ति के उपराम होने पर जब 'ज्ञानशक्ति' का
आविर्भाव होता है एवं शिवांश ज्येष्ठाशक्ति के साथ ज्ञानशक्ति अद्वैतभाव में मिलित
होती है तब 'जालन्धर पीठ' रूप सामरस्य बिन्दु की सृष्टि करता है । इस बिन्दु
से अभिव्यक्त चैतन्य 'इतरलिङ्ग' कहा जाता है । शक्ति के इस स्तर में
'मध्यमावाक्' आविर्भूत होती है
'उड्डीयान पीठ'—जब ज्ञान शक्ति 'क्रियाशक्ति' के रूप में परिणत होती है
तब शिवांश रौद्री शक्ति के साथ साम्यभाव प्राप्त करती है । उसके द्वारा जिस
अद्वैत बिन्दु का आविर्भाव होता है उसे 'उड्डीयान पीठ' कहते हैं । इस बिन्दु से
चित् शक्ति महातेजोमय 'परलिङ्ग' के रूप में अभिव्यक्त होता है एवं यहाँ शब्द
वैखरीवाक् के रूप में आविर्भूत होता है ।
समस्त विश्व का मूल महात्रिकोण है ।
त्रिकोण कामध्य बिन्दु परावाक् या अम्बिकाशान्ता—इन दो शिवशक्त्यंश का
साम्यभावापन्न स्वरूप है । बिन्दु में शिव+शक्ति दोनों का अंश स्थित है इसी प्रकार
त्रिकोण में भी किन्तु 'बिन्दु' प्रधानतः शिव रूप में एवं त्रिकोण 'शक्ति' या योनि
रूप में परिणत हो जाता है ।
त्रिकोण की ३ रेखायें = पश्यन्ती, मध्यमा वैखरी है । त्रिकोण की ३ रेखायें
वाचक हैं—३ शब्दों, सृष्टि-स्थिति-संहार रूप ३ व्यापारों वामा-ज्येष्ठा-रौद्री, ब्रह्मा-
विष्णु-महेश (शिवांश) की प्रतिनिधि है ।
१६८ वरिवस्यारहस्ये
अथ प्रत्यक्षरं स्वरूपमाह—
एकैकस्मिन् कर्मणि सृष्ट्यादिविभेद तस्त्रिविधे ।
ब्रह्माद्या अधिपतयो भारत्यादि स्वशक्तिभिः सहिताः ॥ ३४ ॥
ब्रह्मादयस्त्रयोऽमी भारत्याद्याश्च शक्तयस्तिस्रः ।
प्रत्यक्षरस्वरूपाः शाक्तार्थे वक्ष्यमाण रीत्या ॥ ३५ ॥
(ब्रह्मादिक देवत्रय एवं उनकी शक्तियों की मन्त्राक्षररूपता)
ब्रह्मादिक अधिपति भारती आदि अपनी शक्तियों के साथ सृष्टि आदि प्रत्येक
कर्म के पक्ष त्रय के अधिपति होते हैं ॥ ३४ ॥
शाक्तार्थ में विवक्षित रीति के अनुसार ये ब्रह्मादिक देवत्रय एवं भारती आदि
शक्तियाँ प्रत्येक मन्त्राक्षर के स्वरूप वाले हैं ॥ ३५ ॥
- प्रकाश *
सृष्टिकर्म त्रिविधं सृष्टिसृष्टिः सृष्टिस्थितिः सृष्टिसंहृतिश्चेति । एवं स्थितिकर्म
स्थितिसृष्टिः स्थितिस्थितिः स्थितिसंहृतिश्चेति । एवं संहृति कर्मापि संहृतिसृष्टिः संहृति-
स्थितिः संहतिसंहृतिश्चेति । अत्र प्रतित्रिकं ब्रह्मादयस्त्रयोऽ ब्रह्मविष्णुरुद्रा भारतीपृथिवी-
रुद्राणीसहिता अधिपतयः । एवं च प्रथमकूटे—ककारो ब्रह्मण एवं रूपान्तरम्,
त्रिकोणा तु भारतीस्वरूपा, तुर्यः स्वरो विष्णुस्वरूपः, लकारः पृथिवीस्वरूपः, हकारो
रुद्रस्वरूपः, रेफो रुद्राणीस्वरूपः, तुर्यः स्वरस्तु शान्ताम्बिकात्मकमिथुनस्वरूपः ।
द्वितीयकूटे मध्यमहकारं परित्यज्यावशिष्टाक्षरेष्वेषैव रीतिः । तृतीयकूटे तु द्वितीय-
कूटस्थपरित्यक्तहकारस्य ब्रह्मस्वरूपत्वादभारतीमारभ्यैव सकारेणारम्भः । शक्तिकूट-
त्वेन शक्तेः प्राधान्येन प्रथमं निर्देशः । तदेतदाह—शाक्तार्थे वक्ष्यमाणयेति ॥ ३४-३५ ॥ - सरोजिनी *
(क) सृष्टि कर्म त्रिविध है—१. 'सृष्टि-सृष्टि' २. 'सृष्टि-स्थिति' ३. 'सृष्टि-
संहति' ॥ (ख) स्थिति कर्म भी त्रिविध है—१. 'स्थिति-सृष्टि' २. स्थिति-स्थिति'
३. 'स्थिति-संहति' ॥ (ग) संहति कर्म—१. 'संहति-सृष्टि' २. 'संहति-स्थिति'
३. 'संहति-संहति' ॥
प्रत्येक त्रिक—में ब्रह्मादिक तीन—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र । भारती, पृथ्वी एवं
रुद्राणी सहित उनके अधिपति ।
(क) प्रथम कूट में—'ककार'—ब्रह्म । 'त्रिकोण' (ए) = भारती ॥ 'तुर्य स्वर'
= 'ई' = विष्णु । 'ल' = पृथ्वी । 'ह्रीं' = में 'ह' = रुद्र । रेक = रुद्राणी । 'ई'
= तुर्य स्वर = 'शान्ता'-'अम्बिका'-मिथुन रूप । ('क,ए,ई,ल,ह्रीं' = प्रथम कूट) ।
(ख) द्वितीय कूट में—('ह स क ह ल ह्रीं') ।
(ग) तृतीय कूट में—('स क ल ह्रीं') ॥ ३४ ॥
प्रथमोऽंशः १६९
इस श्लोक का आशय यह घोषित करना है कि—ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी
एवं रुद्र-रुद्राणी पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के प्रत्येक वर्ण के साक्षात स्वरूप हैं।
सारांश—पञ्चदशाक्षरीमन्त्र के वर्ण = ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी, रुद्र-रुद्राणी।
समस्त वर्णों का मूल केन्द्र 'परावाक्' है और परावाक् भगवती का स्वरूप है—
आत्मनः स्फुरणं पश्येद्यदासा परमा कला।
अम्बिका रूपमापन्ना परावाक् समुदीरिता॥ ३६॥१
अर्थात् विमर्श शक्तिरूपा 'परमाकला' जब अपने पर शिवरूप आत्मा का
(पश्यन्ती आदि क्रम से वैखरीपर्यन्त) स्फुरण (विमर्शन) देखना चाहता है तो परमा
शान्तात्मिका होकर अम्बिका रूप को प्राप्त करके (प्रकाशांश मात्रा वाली अम्बिका
के साथ सामरस्यापन्न होकर) 'परावाक्' कहलाने लगती है। 'इच्छाशक्ति' ही
पश्यन्ती वाक् बन जाती है एवं 'ज्ञानशक्ति' ही 'मध्यमावाक्' बन जाती है—
(१) इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा स्थिता।२
(२) ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमावागुदीरिता।३
इसी वाक् से ही मन्त्र बनते हैं। वाक् देवी है तो मन्त्र एवं देवी में कोई
भेद नहीं है।
मन्त्रों का सङ्घटन शिवशक्ति समायॊग से होता ही है—
(१) शिवशक्तिसमायोगाज्जनितो मन्त्रराजकः।४
(२) तेषां समष्टिरूपेण पराशक्ति तु मातृकाम्।
(३) पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सदानघे।
तन्मयी मूलविद्या च तदद्य कथयामि ते॥
(४) शक्ति मूलाधार में वाणी बन गई है और मन्त्र वाणीमय हैं।
मूलाधारे तडिद्रूपे वाग्भवाकारतां गते।
अष्टात्रिंशत्कलायुक्त पञ्चादशद्वंशाविग्रहा॥५
विद्याकुण्डलिनीरूपा मण्डलत्रयविभेदिनी।६
(५) शिवशक्तिसमायोगाच्च मन्त्राणामुदयः परः।७
(६) समस्त मन्त्रों की योनि परमात्मा की ज्ञानशक्ति है।८
१-६. योगिनीहृदय ७. नेत्रतन्त्र
८. ज्ञानशक्ति परा सूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः।
सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रारणिवत्स्थिता॥
मन्त्रसृष्टिर्भवेद्देषा शिवस्य परमात्मनः।
अस्मादेव समुत्पन्ना मन्त्राश्चामोघ शक्तयः॥ (नेत्रतन्त्र)
१७० वरिवस्यारहस्ये
अथावशिष्टानां बिन्दूनां बिन्द्वादीनां स्वरूपमाह—
हृल्लेखा कामकला सपरार्धकलाख्य कुण्डलिन्युत्थः ।
नादाश्चक्रत्रितय त्रितयात्मनो विभावनीयाः स्युः ॥ ३६ ॥
प्रकाश
अत्र प्रथमकूटे या हृल्लेखा, तदन्तर्गता या कामकला, तस्यां गुरुमुखैकवेद्या या
सपरार्धकला, सा वह्निकुण्डलिनीत्युच्यते । सैव द्वितीयकूटे सूर्यकुण्डलिनीति, तृतीय-
कूटे सोमकुण्डलिनीति च कथ्यते । बिन्द्वादिसमष्टिरूपो नादस्तु तत एवोत्पन्नो
दीपशिखाप्रवर्तिकज्जलेखावत् । एवं चानाहतमारभ्योत्थितो नादस्त्रैलोक्यमोहन-
सर्वाशापरिपूरकसर्वसंक्षोभणचक्रत्रयस्य त्रिविधसृष्टिरूपस्यापरं रूपम्; भ्रूमध्यमारभ्यो-
त्थितो नादः सर्वसौभाग्यदायकसर्वार्थसाधकसर्वरक्षाकरचक्रत्रयस्य त्रिविधस्थिति-
रूपस्यापरं रूपम्; बिन्दुस्थानमारभ्योत्थितो नादः सर्वरोगहरसर्वसिद्धिप्रदसर्वानन्दमय-
चक्रत्रयस्य संहृतित्रयरूपस्यापरं रूपमिति विभावनीयाः ॥ ३६ ॥
हृल्लेखाओं में स्थित कामकला (ई) की सपरार्ध कला नाम वाली (तीन)
कुण्डलिनियों से आविर्भूत नादों को तीनों चक्रों के त्रिक के रूप में कल्पित किया
जाना चाहिए ॥ ३६ ॥
सरोजिनी
कुण्डलिनी के तीन रूप हैं—'वह्नि', 'सूर्य' एवं 'सोम' कु० ।। हृल्लेखा में
स्थित कामकला (ई) हीं 'सपरार्धकला' हैं । इन कुण्डलिनियों से उत्पन्न ९ नादों
को तीनों चक्रों के त्रिक समझना चाहिए ।
(क) 'वह्नि कुण्डलिनी'—प्रथम कूट में—जो 'हृल्लेखा' है उसके अन्तर्गत जो
'कामकला' है उसके अन्तर्गत गुरुमुखैकवेद्या जो 'सपरार्धकला' है वही
'वह्निकुण्डलिनी' है ।¹
(ख) 'सूर्य कुण्डलिनी'—प्रथम कूट में स्थित वह्निकुण्डलिनी ही द्वितीय कूट
में 'सूर्यकुण्डलिनी' कहलाती है ।²
(ग) 'सोम कुण्डलिनी'—प्रथम कूट की वह्निकुण्डलिनी, द्वितीय कुण्डलिनी
की सूर्य कुण्डलिनी ही तृतीय कूट में 'सोमकुण्डलिनी' कहलाती है । 'नाद'
बिन्द्वादिसमष्टिरूप है ('बिन्द्वादि समष्टिरूपो नादः') उसी से दीपशिखाग्रवर्ती कज्जल-
लेखा की भाँति उत्पन्न होता है ।³
इसी प्रकार अनाहत चक्र से—
(क) समारब्ध होकर उठने वाला 'नाद'—त्रैलोक्यमोहन-सर्वाशा परिपूरक-
सर्वसंक्षोभण चक्र की त्रिविधात्मक सृष्टि का अपर रूप है ।
१-३. भास्कर—प्रकाश
प्रथमोऽंशः १७१
(ख) भ्रूमध्य से समारब्ध एवं वहाँ से उठने वाला 'नाद'—सर्वसौभाग्य दायक,
सर्वार्थसाधक, सर्वरक्षाकर चक्रत्रय के त्रिविध स्थिति रूप का अपर रूप है ।१
(ग) बिन्दुस्थान से समारब्ध एवं वहाँ से उठने वाला 'नाद'—सर्वरोगहर-
सर्वसिद्धिप्रद-सर्वानन्दमय चक्रत्रय के संहतित्रय का अपर रूप है ।२ श्रीविद्या के
चतुर्थखण्ड में १५ कलाओं का अन्तर्भाव है । इन सभी का निवास ह्रीङ्कार में है
क्योंकि—
श्री विद्यात्मके चतुर्थे खण्डे पञ्चदशकलानां अन्तर्भावं निश्चित्य भुवनेश्वरी
प्रभृतीनां योगिनीविद्यानां नवानां त्रिकस्य त्रिकस्य एकैक ह्रीङ्कारेण अन्तर्भावं अङ्गीकृत्य,
सर्वभूतात्मकं, सर्वमन्त्रात्मकं, सर्वतत्त्वात्मकं, सर्वावस्थात्मकं, सर्वदेवात्मकं, सर्ववेदार्था-
त्मकं, सर्वशब्दात्मकं, सर्वशक्त्यात्मकं, त्रिगुणात्मकं, त्रिखण्डं, त्रिगुणातीतं, सादाख्या
१७२ वरिवस्यारहस्ये
कुण्डलिनीत्रय
प्रथमकूट
हृल्लेखा
१. वह्नि कुण्डलिनी कामकला
या सापराधर्कला सा वह्नि सापरार्धकला
कुण्डलिनीत्युच्यते—(प्रकाश) (वह्निकुण्डलिनी)
त्रैलोक्यमोहन आदि चक्र के आधार में स्थित वह्नि मण्डल में स्थित वाग्भव
बीज शिखरवर्ती कामकला के अन्तर्गत स्थित हार्धकला ही वह्नि कुण्डलिनी हैं ।
द्वितीयकूट
हृल्लेखा
२. सूर्य कुण्डलिनी कामकला
सैव द्वितीयकूटे सूर्य हार्धकला
कुण्डलिनीति—(प्रकाश) (सूर्यकुण्डलिनी)
द्वितीय कूट में स्थित हृल्लेखा के अन्तर्गत स्थित कामकला में स्थित हार्ध-
कला ही सूर्य कुण्डलिनी है । सर्वसौभाग्यदायक आदि चक्रत्रय के हृदय में स्थित
सूर्यमण्डल में स्थित कामराजशिखरवर्ती कामकलान्तर्गत हार्धकला सूर्यकुण्डलिनी है ।
तृतीयकूट
हृल्लेखा
३. सोम कुण्डलिनी कामकला
स्यापरंandरूपम्? Let's look: सृष्टिरूपस्यापरंरूपम् ।- wait, is there a space? Look at line 31:(२) चक्रत्रयस्य त्रिविध स्थितिरूपस्यापरं रूपम् । In line 31, there is a clear space:स्थितिरूपस्यापरं रूपम् । In line 30, it is tighter:सृष्टिरूपस्यापरंरूपम् ।`
-
Review the Diagram transcription:
Let's make sure the tree diagram is represented cleanly with line numbers:
त्रिदेवों के त्रिकर्म
सृष्टि (ब्रह्मा) स्थिति (विष्णु) संहति (महेश)
सृष्टि सृष्टि सृष्टि स्थिति स्थिति स्थित संहति संहति संहति
सृष्टि स्थिति संहति सृष्टि स्थिति संहति सृष्टि स्थिति संहतिWait, what about the tree connector lines? Are they considered text lines?
In text transcription, ASCII branches are sometimes included, but usually it's cleaner to either show the text or use standard box-drawing characters if possible, or just the text lines. The prompt says: "Prefix each line with line marker like , ".
If we count every visual text line, let
१७४ वरिवस्यारहस्ये
(३) चक्रमयस्य त्रिविध संहतित्रयरूपस्यापरं रूपमिति विभावनीयाः (क)
'अनाहतमारभ्योत्थितो नाद' (ख) 'भूमध्यमारभ्योत्थितो नादः (ग) 'बिन्दुस्थान-
मारभ्योत्थितो नादः ॥'१
कुण्डलिनी का स्वरूप—कुण्डलिनी 'परमाकला' है—'सर्पाकारा कुण्डलिनी
या देवी परमाकला ।'२ यह समस्त गुणों से युक्त एवं सूर्य, चन्द्र तथा अग्निरूपिणी
है—'गुण युक्ता कुण्डलिनी चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी ।'३ यह एक अचिन्त्य शक्ति है और
भुजगाकाररूपिणी है—'मूलाधारे तुया शक्तिर्भुजगाकाररूपिणी ।' जीवात्मा इसी
कुण्डलिनी के मध्य निवास किया करता है (जीवात्मा परमेशानि तन्मध्ये वर्तते
सदा ।)४ इस शक्ति का निवास पाताल में है और उसके प्रियतम शिव का निवास
ब्रह्माण्ड में है—'पाताले वसते शक्ति ब्रह्माण्डे वसते शिवः'५ यह वासुकी या
महामाया है । भुजगाकाररूपिणी । सार्धत्रिवलयाकारा पाताल तल वासिनी ॥६
कुण्डलिनी वर्णमाला के ५० वर्णों के स्वरूप वाली है—"मूलचक्राच्छिरोऽन्ता च
सुषुम्ना परिकीर्तिता । तद्गर्भस्था च या शक्तिः सा देवी कुण्डरूपिका । सा सदा
कुण्डलिनी देवी पञ्चाशद्वर्णभूषिता ॥'७ यह कामिनी कुण्डलिनी महापत्रात्मक सहस्रार
के बीजकोष या शिवालय में जाकर तथा शिव का साक्षात्कार करके तथा मालाकार
रूप में स्थित होकर शिवलिङ्ग को अपने इसी अकारादिक्षकारान्त वर्णमाला रूप
अक्षमाला से परिवेष्टित किये रहती है—
'सहस्रारं तु सम्प्राप्य शिवं दृष्ट्वा तु कामिनी ।
मालाकारेण तल्लिङ्गं संवेष्ट्य कुण्डली सदा ॥'८
यह अन्तर्माला ही महामाला है जो ५० वर्णों से निर्मित है ।९ 'अन्तर्माला
महामाला पञ्चाशद्वर्णरूपिणी' और स्वयंभूलिङ्ग पर सुशोभित है । यही कुण्डलिनी
सहस्रार महापद्म में 'महाकुण्डलिनी' कही जाती है—'सहस्रारे महापद्मे विश्वरूप परः
शिवः । महाकुण्डलिनी तत्र स्थिता नित्या सुरेश्वरि ॥'१० यह विद्युल्लता के आकार
की, सोते हुए सर्प की आकृति वाली, सार्द्ध त्रिवलयों से अलंकृत, भगवान शिव
को आवेष्टित करके स्थित 'परमेश्वरी' कुण्डली 'परदेवता' है—'तत्र विद्युल्लताकारा
कुण्डली पर देवता । प्रसुप्तभुजगाकारा सार्द्धत्रिवलयान्विता ॥'११ सहस्रार में शिव
शून्यरूप एवं करोड़ों विद्युत के समान देदीप्यमान कुण्डली इन्दुरूप है और यहाँ
'परमकुण्डली' कहलाती है—'शून्यरूपं शिवं साक्षादिन्दुं परमकुण्डलीम् ॥'१२ यह
नादरूपा, योनिरूपा सनातनी शक्ति है—'नादरूपेण सादेवी योनिरूपा सनातनी ।'१३
परदेवता कुण्डली हुङ्कार वर्ण से उत्पन्न होती है—'हुंकार बर्ण संभूता कुण्डली
परदेवता ।'१४ 'परदेवता', 'कुण्डली', 'महादेवी' रूपा यह 'रूपवती' देवी अपने
१. आचार्य भास्करराय २-४. मातृकाभेद तन्त्र
५. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र ६-१०. तोडल तन्त्र
११-१२. शाक्तनन्दतरंगिणी, कुब्जिकातन्त्र १३. यामल
१४. गंधर्वमालिका
प्रथमोऽंशः १७५
मुखपद्म की सुगंधि से शिव को आह्लादित कर देती है और शिव के ऊपर लेटती
हुई शिव के मुखपद्म का चुम्बन लेती है और क्षणमात्र के लिए सदाशिव के साथ
रमण करती है जिससे कि उसी क्षण लाखरस के समान रङ्ग वाला अमृतक्षरित
होता है—इसी अमृत से परदेवता एवं षट्चक्रस्थित देवों की पूजा की जानी चाहिए
('उन्हें सन्तुप्त करना चाहिए') 'सङ्केतपद्धति' में पिण्ड को ही कुण्डलिनी शक्ति
कहा गया है, 'पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः ।'१' स्वयंभूलिङ्ग के साथ रमण करनेवाली
इस कुण्डलिनी को मूलाधार से सहस्रार में लाना चाहिए । और वहाँ से शंभु के
साथ एकीकृत (अभिन्न) रूप में देखकर तथा पीनोन्नतपयोधरा, षोडशवर्षीया,
नवयौवनसम्पन्ना, सर्वाभरणभूषिता, पूर्णचन्द्रनिभा, नानारत्नयुता, नूपुरशोभिता,
कन्दर्पकोटिलावण्या, रक्तकङ्कणमण्डिता, किंकिणीशोभिता, मधुरहासिनी कामिनी के
रूप में परिकल्पित करना चाहिए ।
अवरोहण क्रम—सहस्रार में स्थित देवी कुण्डलिनी का इस रूप में ध्यान
करके फिर १०८ बार मातृका-माला से मन्त्र का जप करना चाहिए ।
परमात्मा और कुण्डली—नाथ योगियों का कथन है कि 'परमशिव' में
सिसृक्षा उत्पन्न होते ही उसे 'सगुण शिव' (वेदान्तियों का अपरंब्रह्म) कहा जाने
लगता है क्योंकि वह इच्छायुक्त होता है । यह सिसृक्षा है । शक्ति है । परमशिव
से एक साथ ही दो तत्त्व उत्पन्न होते हैं—१. शिव २. शक्ति । यह शक्ति पाँच
अवस्थाएँ पार करती हैं—
(१) 'निजा'—परमशिव की अवस्था मात्र धर्म से युक्त, स्फुरित होने की
पूर्ववर्तिनी और स्फुरणोन्मुखी यह अवस्था ही 'निजा' है । शक्ति की इस निजा
अवस्था में जो शिव रहते हैं वे उनकी अवस्था 'अपरंपदम' है । वे अव्यक्त रूप में
रहते हुए भी स्फुरणोन्मुखी शरीर से युक्त होकर रहते हैं ।
(२) 'परा'—यह शक्ति की स्फुरणोन्मुखी अवस्था है । इस अवस्था के शिव
को 'परम' कहते हैं ।
(३) 'अपरा'—यह शक्ति स्पन्दावस्था है । शक्ति की इस अवस्था के साथ
रहने वाले शिव 'शून्य' कहलाते हैं ।
(४) 'सूक्ष्मा'—इस अवस्था में शक्ति सूक्ष्म अहन्ता भाव से युक्त होती है ।
इसके साथ रहने वाला शिव निरञ्जन कहा जाता है ।
(५) 'कुण्डली'—शक्ति की यह अवस्था वह है जिसमें वह पृथकता का भाव
लेकर प्रस्तुत होती है । इस अवस्था से उत्पन्न शिव 'परमात्मा' कहलाते हैं—
निजा पराऽपरा सूक्ष्मा कुण्डली तासु पञ्चधा ।
शक्ति चक्रक्रमेणैव जातः पिण्डः परः शिवे ॥'२
१. संकेत पद्धति
२. सिद्धसिद्धान्त संग्रह (१।१३)
१७६ वरिवस्यारहस्ये
इस प्रकार शिव पाँच अवस्थाओं को पार करते हुए 'परमात्मा' के रूप में
एवं शक्ति 'कुण्डली' के रूप में आविर्भूत होती है । यही 'कुण्डली' समस्त विश्व
में व्याप्त है किन्तु पिण्ड में रहने पर 'कुण्डली' एवं समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त
रहने पर 'महाकुण्डलिनी' कही जाती है । इसी 'कुण्डली' की सहायता से शिव
सृष्टि-पालन-संहार कर पाने में समर्थ हो पाते हैं । इसका स्वरूप निम्नानुसार है—
'स्वयं' (पर शिव)—निजा + अपर शिव; परा + परमशिव; अपरा + शून्य
शिव; सूक्ष्मा + निरञ्जन शिव एवं कुण्डली + परमात्मा रूप शिव ।।
'कुण्डली' शक्ति चिच्छीला, चिद्रूपिणी, अनन्तरूपा, अनन्त एवं शक्तिस्वरूपा
है । जगत् इसी का परिणाम है अर्थात् इसका परिणमन ही जगत् है । इसके
उपरान्त आविर्भूत होते हैं—अहं प्रधान सदाशिव, इदं प्रधान ईश्वर एवं उभयप्रधान
शुद्धविद्या ।
स्फोट—योगी सुचिरनिद्रिता कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने का प्रयास
करता है । अधोमुखी कुण्डलिनी जैसे ऊर्ध्वमुखी होती हे वैसे ही 'स्फोट' होता है ।
यह स्फोट ही 'नाद' है । नाद से प्रकाश होता है और इस प्रकाश का व्यक्त रूप
ही 'महाबिन्दु' कहा जाता है । यह 'बिन्दु' तीन प्रकार का होता है । १. इच्छा,
२. ज्ञान, ३. क्रिया । इसे ही योगी सूर्य चन्द्र-अग्निद्य ब्रह्मा-विष्णु-महेश कहते हैं ।
यह 'नाद' एवं 'बिन्दु' ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनाहत नाद का व्यष्टि में व्यक्त
रूप है । अनाहत भाव से समस्त विश्व में व्याप्त नाद व्यक्ति में प्रकाशित होने पर
'नाद' एवं 'बिन्दु' कहलाते हैं ।
प्रस्तुत श्लोक ३६ में जिस कुण्डलिनी का एवं 'प्रकाश' में—१. 'वह्नि
कुण्डलिनी' २. 'सूर्य कुण्डलिनी' एवं ३. चन्द्र कुण्डलिनी' का वर्णन किया है
उसका स्वरूप क्या है?
भास्करराय कहते हैं—
(१) 'वह्निकुण्डलिनी' = 'अत्र प्रथमकूटे या हृल्लेखा तदन्तर्गता या
कामकला' तस्यां गुरुमुखैकवेद्या या सपरार्धकला सा 'वह्नि कुण्डलिनी' इत्युच्यते ।'
(२) 'सूर्यकुण्डलिनी'—'सैव द्वितीय कूटे सूर्यकुण्डलिनी इति' ।
(३) 'सोमकुण्डलिनी'—तृतीय कूटे सोमकुण्डलिनी इति कथ्यते ।
'बिन्दादि समष्टिरूपो नादस्तु तत एवोत्पन्न दीपशिखाग्रवर्तिकज्जल-
लेखावत् ।'
'नाद' कुण्डलिनी रूप दीपशिखा की वर्तिकाग्रवर्ती कज्जललेखावत स्थित
है ।
मूलाधार से भी नीचे वाग्भवाकार त्रिकोण में 'समष्टिकुण्डलिनी' का वास
है ।
प्रथमोऽंशः १७७
कुण्डलिनी
(मूलाधार के नीचे) (मूलाधार में) (हृदय में) (भ्रूमध्य में)
वाग्भवाकार त्रिकोण में 'अग्निकुण्डलिनी' 'सूर्यकुण्डलिनी' 'सोमकुण्डलिनी'
'समष्टिकुण्डलिनी' (उकार) (अकार) (मकार)
(समष्टिप्रणव)
'कुण्डलिनी' ही उन्मना है ।
नित्यानन्द कृत श० महिम्नस्तोत्र की व्याख्या में 'कुण्डलिनी' के ४ रूप
बताए गए हैं ।
(१) भास्कराचार्य : कूटत्रय में ३ कुण्डलिनियाँ हैं—
(क) (प्रथम कूट की हल्लेखा में स्थित कामकला में स्थित सपरार्ध कला)
'वह्निकुण्डलिनी' (ख) द्वितीय कूट में 'सूर्यकुण्डलिनी' (ग) 'तृतीय कूट' में
'सोमकुण्डलिनी'
(२) नित्यानन्दकृत महिम्नस्तोत्र की व्याख्या—इसके अनुसार कुण्डलिनी के ४
रूप हैं—
(१) मूलाधार में—'अग्निकुण्डलिनी'
(२) हृदय में—'सूर्यकुण्डलिनी'
(३) भ्रूमध्य में—'सोमकुण्डलिनी'
(४) वाग्भवाकार त्रिकोण में—(जो कि मूलाधार चक्र के नीचे स्थित है)—
'समष्टि कुण्डलिनी'
(चतुर्विधतनु अग्निसूर्य सोम समष्टिरूपेण, अग्निकुण्डलिनी मूलाधारे, सूर्य-
कुण्डलिनी हृदये, सोमकुण्डलिनी भ्रूमध्ये, समष्टिकुण्डलिनी मूलाधाराधोगत वाग्भवा-
कार त्रिकोणे)१
कुण्डलिनी के अन्य स्वरूपों का भी दिग्दर्शन कराया गया है यथा (१)
'शक्ति कुण्डलिनी'—जब 'अमाकला' विसर्गहीन हो जाती है तब इसी भुजङ्गाकार,
स्वात्मविश्रान्त, प्रसुप्त परासंवित को 'शक्तिकुण्डलिनी' कहते हैं । 'अ' नाम्नी
पराशक्ति (या 'सप्तदशीकला' अर्थात् 'अमा') तिरोधान शून्य होने के कारण
नित्योदित है और 'अमृतकला' कहलाती है और अन्तःकरण आदि षोडश कलाओं
की उद्भाविका है—वही 'अमाकला' विसर्ग शून्य होने परबहिरुन्मुख न रहने पर—
'शक्तिकुण्डलिनी' की आख्या धारण करती है ।
१. नित्यानन्द कृत श० महिम्नस्तोत्र, व्याख्या, पृ० ६
१२ वरि.
१७८ वरिवस्यारहस्ये
(२) 'प्राण कुण्डलिनी' (३) 'पराकुण्डलिनी'—
विसर्ग के दो प्रकार हैं—(१) पर विसर्ग (आनन्द) (२) अपर विसर्ग (हकार
या प्राण) ! विसर्ग के दोनों छोरों पर दो कुण्डलिनियों का अवस्थान है—(१)
'प्राण कुण्डलिनी' (२) 'परा कुण्डलिनी' । प्रथम कोटि में अवस्थित 'कुण्डलिनी'
ही प्राण कुण्डलिनी' एवं द्वितीय कोटि में स्थित कुण्डलिनी परा कुण्डलिनी
कहलाती है । विसर्ग के दूसरे प्रान्त भूमि में—अनन्त कोटि में—जो कुण्डलिनी
अवस्थित है वह स्वात्मविश्रान्त, अन्तरोन्मुखी परासंवित् ही 'परा कुण्डलिनी' है ।
कुण्डलिनी
ॐ — 'कुलशक्ति' (सर्पिणी)
'अकुल' (नकुल)
'प्रकाश' (अकुल)
(परमशिव)
शब्दब्रह्ममयी कुण्डलिनी
'महाकुण्डलिनी'
('विमर्श' शक्ति)
↓
कुण्डलिनी | शक्ति | ('महाकुण्डलिनी रूपे सच्चिदानन्द
↓ | रूपिणी'—दे०भा०)
सूर्य कुण्डलिनी — समष्टि कुण्डलिनी | ध्वनि | ↓
↓ | (सत्व प्रविष्ट चित् शक्ति वाच्या
अग्नि कुण्डलिनी — सोम कुण्डलिनी | नाद | परमाकाशावस्था)
↓ | ↓
निरोधिका | (सत्वप्रविष्ट रजोनुविद्ध)
↓ | ↓
अर्द्धेन्दु | (तमोनुविद्ध)
↓ | ↓
बिन्दु | (ताम-प्राचुर्या)
↓ | ↓
कुण्डलिनी | परा | (सत्व प्राचुर्या)
↓ | ↓
समष्टि प्रणव — 'अ' — 'उ' — 'म' | पश्यन्ती | (उभय संयोग)
↓
मध्यमा
↓
वैखरी¹
१. शारदातिलक (त० प्र० पटल)
प्रथमोऽंशः १७९
कुण्डलिनी
┌───────────────────────────┴───────────────────────────┐
अधः कुण्डलिनी (मूलाधार ऊर्ध्व कुण्डलिनी (मूलाधार से
के अधोप्रदेश में मेरुदण्ड के उन्मना तक की यात्रा पार
सबसे निचले भाग में स्थित करके परमशिव के
त्रिकोणाकार अग्निचक्र साथ एकीभूत)
(कुलकुण्ड) में स्थित है ।
यही शक्ति की विकास भूमि
है—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
कुण्डलिनी
┌──────────────┬──────────────┬──────────────┐
अधः मध्य ऊर्ध्व परा
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
│ │ │ │
अग्निखण्ड सूर्यखण्ड सोमखण्ड पराखण्ड
वा०कूट का०कूट श०कूट तूर्यकूट
कुण्डलिनी
┌──────────────┼──────────────┐
कुमारी योषित पतिव्रता
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
ध्यातव्य बिन्दु— 'बिन्दु' के बाद 'परा' के उद्भव का क्रमसङ्गत नहीं है क्योंकि
कुण्डलिनी एवं परा को असकृत (एक) कहा गया है । “सैषा परावाग्लक्षणा
कुण्डलिनी । तस्यास्तिस्रोऽवस्थाः पश्यन्त्याद्याः ता एव इह पर परापर अपर
कुण्डलिन्य उक्ताः ।'”१
कुण्डलिनी के मध्य में ज्योतिमात्र, सूक्ष्म, परा की अवस्थिति है । राघव भट्ट
ने इसे स्वीकार किया है— 'सूक्ष्मा कुण्डलिनीमध्ये ज्योतिर्मात्रात्म रूपिणी । अश्रोत्र-
विषया तस्यादुद्गच्छत्यूर्ध्वगामिनी ॥'२ यहाँ पर यह 'सूक्ष्मा' परा का ही वाचक है ।
सार्द्धत्रिवलयाकार 'कुण्डलिनी' एवं सार्द्धत्रिमात्रिक प्रणव एक ही है— 'उध्युष्ट-
वलयाकार प्रणवत्वमुपागता ।'३
─────────────────────────────────────────────────────────────
१. प्रयोगक्रमदीपिका (पृ० ४०६) २-३. 'पदार्थदर्श:' (पृ० ६०)
१८० वरिवस्यारहस्ये
शक्ति की दो भूमियाँ
विकास भूमि सङ्कोचभूमि (ऊर्ध्व कुण्डलिनी)
(अधः कुण्डलिनी) —(प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
(विकास) (सङ्कोच)
अथावस्थापञ्चकं शून्यषट्कं विषुवत्सप्तकं च जपकाले विभागव्यमाह—
इन्द्रियदशकेत्यादिना, एवमवस्थेत्यन्तेन श्लोकषोडशकेन ।
इन्द्रियदशकव्यवहृतिरूपा या जागरावस्था ।
तत्र प्रकाशरूपो हेतुर्भाव्यस्तृतीये रेफे ॥ ३७ ॥
(जागृतावस्था और रेफस्थ प्रकाश के अंतर्संबन्ध का प्रतिपादन)
जिसमें दस इन्द्रियाँ व्यवहार (जागतिक क्रियाओं का निष्पादन) करती हैं
उसके स्वरूपवाली जो जागृतावस्था है उसमें, तृतीयकूट के रेकस्थान में होने वाले,
उस प्रकाश की कल्पना करनी चाहिए जो कि जागृतावस्था का कारण है ॥ ३७ ॥
- प्रकाश *
कर्मेन्द्रियाणि पञ्च वाक्पाणिपादपायूपस्थानि; ज्ञानेन्द्रियाण्यपि पञ्च
प्रथमोऽशः १८१
(३) आन्तरवृत्तेर्लवतो, लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिः ॥ ३९ ॥
(४) तुर्यावस्थाचिदभि व्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ॥ ३९ ॥
(५) आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुरीयातीतावस्था ॥ ४१ ॥
शब्द की भी (१) जागर (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति (४) तुरीय—चार अवस्थायें
बतायी गई हैं । 'तुरीय' शब्द ही 'शब्दब्रह्म' है । इसका अतिक्रम करके अतितुर्य
या पर ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है । यह परब्रह्म ही 'परमशिव' है । आचार्य शङ्कर
ने 'प्रपञ्चसार तन्त्र' के टीकाकार पद्मपादाचार्य ने चेतन तत्त्व को इन पाँच स्तरों पर
स्थित देखा है—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म, (३) कारण, (४) सामान्य, (५) साक्षी ।१
ग्रन्थान्तर में यह भी कहा गया है कि शब्द का सघोष एवं अघोष बाह्य व्यवहार
उसकी 'जागरावस्था' है । समष्टिरूप से हम इसे 'विराटशब्द' कह सकते हैं । पर
श्रूयमाण शब्द सघोष शब्द या वाचिक शब्द हैं । अघोष (उपांशु = स्वयं मात्र को
श्रुत) अघोष है । जाग्रत दशा में सर्वत्र सघोष एवं अघोषात्मक वाग्व्यवहार रूप
शब्दानुविद्धता ही प्रधानतः दृष्टिगोचर होती है । यह स्थूल शब्द वैखरी वाक् कहा
जाता है । कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों का व्यवहार ही जागृतावस्था है ।२
अन्तःकरणचतुष्कव्यवहारः स्वाप्निकावस्था ।
सा तार्तीयैकाराद्बध्यापि गलस्थले चिन्त्या ॥ ३८ ॥
(स्वप्नावस्था एवं मन्त्राक्षर 'ई' में स्थित प्रकाश के अंतर्संबंध का विवेचन)
अन्तःकरणचतुष्टय का व्यवहारस्वरूप (जागतिक क्रियानिष्पादनरूप) जो
स्वप्नावस्था है (उसका कारणरूप जो प्रकाश है) उसे तृतीय कूट की हृल्लेखा में
स्थित ईकार रूप कामकला के द्वारा (उस स्वप्नावस्था में विद्यमान) समझना
चाहिए । द्वितीय कूट के लकार को भी वैसे ही समझना चाहिए ॥ ३८ ॥
- प्रकाश *
मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेत्यन्तःकरणानि चत्वारि । तैरेवं व्यवहारः स्वप्नः ।
तज्जनकः प्रकाशस्तृतीयहृल्लेखास्थकामकलया१ बोध्यः । अथापि गलस्थले द्वैतीयी-
कलकारे चिन्त्यः । गलस्थश्चासौ लश्चेति विग्रहः ॥ ३८ ॥ - सरोजिनी *
प्रस्तुत श्लोक में स्वप्नावस्था एवं उससे पञ्चदशी मन्त्र का सम्बंध क्या
है?—इसका निरूपण किया गया है । उनका कथन है कि—अन्तःकरण चतुष्टय
के व्यवहार का अपर पर्याय है 'स्वप्न' । इस स्वप्नावस्था का मूलभूत (केन्द्रीय)
कारण कौन हैं? इसका कारण है वह अचिन्त्य दिव्य प्रकाश जो कि तृतीय कूट
की हृल्लेखा में स्थित ईकार रूप कामकला । भास्कराचार्य कहते हैं—'मनो
१. पद्मपादाचार्य—प्रपञ्चसार की टीका २. भास्करराय—प्रकाश
१८२ वरिवस्यारहस्ये
• बुद्धिरहङ्कारश्चितं चेत्यन्तः करणानि चत्वारि । तैरेव व्यवहारः “स्वप्नः” । तज्जनकः
प्रकाश स्तुतीय हृल्लेखास्थकामकलया बोध्यः ॥'
द्वितीय कूट के लकार को भी वैसा ही समझना चाहिए । 'स्वप्नावस्था' की
केन्द्रीय शक्ति है 'ह्रीं' में स्थित ईकार स्वरूप 'कामकला' ॥ ३८ ॥
आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य ।
वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्त्या तार्तीयबिन्दौ सा ॥ ३९ ॥
(सुषुप्ति का स्वरूप)
तृतीयकूट के बिन्दु में उस सुषुप्ति की भावना करनी चाहिए जो कि सुषुप्ति
का कारण है और जिसमें समस्त अन्तःकरण एवं जीव निद्रामग्न हैं ॥ ३९ ॥
- प्रकाश *
विवरणमत आत्मसुखाज्ञानविषयिकास्तिस्रोऽविद्यावृत्तयः स्वीकृता इत्यत आह—
आन्तरवृत्तेरिति । अन्तःकरणपरिणामरूपवृत्तेरित्यर्थः । वार्त्तिकमते वृत्तिसामान्याभाव
एव सुषुप्तिः । तार्तीयबिन्दौ ललाटस्थाने ॥ ३९ ॥ - सरोजिनी *
'सुषुप्ति'—जिस समय अपने व्यापार-सहित बुद्धि अपने कारण अज्ञान में
विलीन हो जाती है उसी को विज्ञ पुरुषों ने 'निद्रा' कहा है ।१ सुषुप्ति-काल में घोर
निद्रा में सकल इन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि इत्यादि तथा इनकी वृत्तियाँ अपने उपादान
कारण अविद्या में विलीन हो जाती हैं और उस समय आत्मा की जाग्रत-स्वप्न
अवस्थाओं के अभाव होने के कारण विश्व तैजस आदि संज्ञा नहीं रहती, उस समय
तो वह तमावृत अपने स्वरूप सुख का बिना किसी साधन की सहायता के ही
स्वयं भोग करता है ।२
वृत्तियाँ एवं सुषुप्ति—
(१) विवरणकार का मत—आत्मसुख के अज्ञानविषयिक तीन अविद्या वृत्तियाँ
हैं । अन्तःकरण का परिणाम रूप ही वृत्तियाँ हुआ करती हैं ।
(२) वार्तिककार का मत—वृत्ति सामान्य का अभाव ही सुषुप्ति है ।
तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।
तद्भावनार्धचन्द्रादिकं त्रयं व्याप्त कर्त्तव्यः ॥ ४० ॥
(तुरीयावस्था का स्वरूप)
चैतन्य को अभिव्यक्त करने वाली जो नादावस्था है (वह अवस्था जिसमें
'नाद' पूर्ण चैतन्य को अभिव्यक्त करता है) 'तुरीयावस्था' कहलाती है । उसकी
१. वराहोपनिषद
प्रथमोऽंशः १८३
भावना अर्द्धचन्द्र एवं (उसके आगे के) वर्णत्रय तक की जानी चाहिए ॥ ४० ॥
- प्रकाश *
अर्धचन्द्ररोधिनीनादेषु व्याप्तस्तुर्यावस्थाप्रकाशो भाव्यः ॥ ४० ॥ - सरोजिनी *
ज्ञान की सात भूमिकायें
|
┌─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┐
शुभेच्छा विचारणा तनुमानसा सत्वापत्ति असंसक्ति पदार्थ भावना तुरीयगा
ज्ञान की सात भूमिकायें हैं । उनमें अन्तिम भूमिका है 'तुरीयगा' । 'शुभेच्छा
प्रथमा भूमिका भवति । विचारणा द्वितीया तनुमानसी तृतीया । सत्वापत्तिस्तुरीया ।
असंसक्तिः पञ्चमी । पदार्थ भावना षष्ठी । तुरीयगा सप्तमी ॥'
(१) अकार, उकार, मकार एवं अर्धमात्रा वाली प्रणवात्मिका भूमिका होती हैं ।
(२) उन अकार, उकारादि चार मात्राओं के प्रत्येक के स्थूल, सूक्ष्म कारण
एवं साक्षी भेद से चार-चार प्रकार के होते हैं । उसमें भी अकारादि के जो स्थूलादि
चार भेद हैं उनके प्रत्येक के जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय—ये चार भेद से
अवस्थायें होती हैं । आत्मा के भी चार भेद हैं—विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीय ।
'तदवस्था जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति तुरीयाः ।'
अकार का स्थूल अंश में—जाग्रत-विश्व, उनके सूक्ष्म अंश में जाग्रत तैजस,
उसके बीज अंश में जागृत-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में जागृत-तुरीय है ।
उकार के स्थूल अंश में स्वप्न-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में स्वप्न-तैजस, उसके
बीजांश में स्वप्न-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में स्वप्न-तुरीय है । प्रणव की तृतीय
मात्रा मकार के स्थूल अंश में सुषुप्ति-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में सुषुप्ति-तैजस
उसके बीजांश में सुषुप्ति-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में सुषुप्ति-प्राज्ञ और उसके
साक्षी अंश में सुषुप्ति-तुरीय हैं । प्रणव की चौथी अर्धमात्रा के स्थूल अंश में
तुरीय-विश्व उसके सूक्ष्म अंश में तुरीय तैजस, उसके बीज अंश में तुरीय-प्राज्ञ एवं
उसके साक्षी अंश में तुरीय-तुरीय है ।
(३) अकार के स्थूलांश से तुरीयांश तक जो चार अवस्थायें हैं, उनमें तीन
भूमिकायें हैं—प्रथमा—'शुभेच्छा', द्वितीया—'विचारणा', तृतीया—'तनुमानसा' ।
उकार के स्थूलांश से लेकर तुरीय तक—चौथी 'सत्त्वापत्ति' भूमिका होती है ।
मकार के स्थूलांश से लेकर तुरीयांश तक पाँचवी असंसक्ति नामक भूमिका होती
है । अर्धमात्रा के स्थूलांश से लेकर उसके तुरीयांश तक छठवीं 'पदार्थभावना'
नामक 'भूमिका' होती है । इन समस्त भूमिकाओं के अनन्तर जो अवस्था होती
है । वही सप्तमी 'तुरीयगा' भूमिका है ।
१८४ वरिवस्यारहस्ये
'ज्ञानभूमिः शुभेच्छास्यात्प्रथमा समुदीरिता ।
विचारणा द्वितीया तु, तृतीया तनुमानसा ।
सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका ।
पदार्थभावना षष्ठी सप्तमी तुर्यगास्मृता ॥'
'तुरीयगा' का स्वरूप क्या है?
यत्र नासन्त सद्गूपो, नाहं नाप्य न हंकृतिः ।
केवलं क्षीणमनन आस्तेऽद्वैतेडित निर्भयः ॥
अन्तः शून्यो बहिः शून्यः शून्य कुंभइवाम्बरे ।
अन्तः पूर्णो बहिः पूर्णः पूर्ण कुंभ इवार्णवे ॥ १८ ॥
मा भव ग्राह्यभावात्मा ग्राहकात्मा च मा भव !
भावना मखिलां त्यक्त्वा यच्छिष्टं तन्मयो भव !
द्रष्टृदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह ।
दर्शन प्रथमाभासमात्मानं केवल भज ॥१
बिन्दु कुण्डलिनी
┌───────────┼───────────┐
वह्नि सूर्य सोम
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
┌ ○ महाबिन्दु ┌ ई ┐ स्वप्न महाबिन्दु
│ ० ◡ उन्मनी │ रं ┘ जागर ↓
│ ० समना ┌ ह ┐ उन्मनी
│ । │ ल │ भूमि ↓
तुर्यातीतावस्था │ ▽ ◡ व्यापिका │ क │ विष्णु समना
│ ० │ स ┘ भारती ↓
│ ०० शक्ति └ ह्रीं व्यापिका
│ ०|◡ नादान्त ┌ ल ┐ ब्रह्मा ↓
│ ┌ ह │ भूमि ┐ शक्ति
│ ०|० नाद │ क │ विष्णु │ स्वप्न तुर्यातीतावस्था ↓
तुर्यावस्था │ ▽ ◡ रोधिनी │ स │ भारती │ नादान्त
│ │ ह ┘ ब्रह्मा │ ↓
│ ◡ अर्धचन्द्र └ मिथुनम् │ नाद
┌─┴─ ⸗ ◡ बिन्दु ┌ ह्रीं रुद्राणी │ ↓
सुषुप्ति └─┬─ │ रुद्र ┘ तुर्यावस्था रोधिनी
│ ल ┐ विष्णु ↓
│ ई │ भूमि अर्धचन्द्र
│ ए │ भारती सुषुप्ति ┌─ ↓
└ क ┘ ब्रह्मा └─ बिन्दु
१. वराहोपनिषद