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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 530 में से

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पृष्ठ 274

१७२ वरिवस्यारहस्ये
कुण्डलिनीत्रय
प्रथमकूट
हृल्लेखा
१. वह्नि कुण्डलिनी कामकला
या सापराधर्कला सा वह्नि सापरार्धकला
कुण्डलिनीत्युच्यते—(प्रकाश) (वह्निकुण्डलिनी)
त्रैलोक्यमोहन आदि चक्र के आधार में स्थित वह्नि मण्डल में स्थित वाग्भव
बीज शिखरवर्ती कामकला के अन्तर्गत स्थित हार्धकला ही वह्नि कुण्डलिनी हैं ।
द्वितीयकूट
हृल्लेखा
२. सूर्य कुण्डलिनी कामकला
सैव द्वितीयकूटे सूर्य हार्धकला
कुण्डलिनीति—(प्रकाश) (सूर्यकुण्डलिनी)
द्वितीय कूट में स्थित हृल्लेखा के अन्तर्गत स्थित कामकला में स्थित हार्ध-
कला ही सूर्य कुण्डलिनी है । सर्वसौभाग्यदायक आदि चक्रत्रय के हृदय में स्थित
सूर्यमण्डल में स्थित कामराजशिखरवर्ती कामकलान्तर्गत हार्धकला सूर्यकुण्डलिनी है ।
तृतीयकूट
हृल्लेखा
३. सोम कुण्डलिनी कामकला