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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 530 में से

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पृष्ठ 278

१७६ वरिवस्यारहस्ये
इस प्रकार शिव पाँच अवस्थाओं को पार करते हुए 'परमात्मा' के रूप में
एवं शक्ति 'कुण्डली' के रूप में आविर्भूत होती है । यही 'कुण्डली' समस्त विश्व
में व्याप्त है किन्तु पिण्ड में रहने पर 'कुण्डली' एवं समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त
रहने पर 'महाकुण्डलिनी' कही जाती है । इसी 'कुण्डली' की सहायता से शिव
सृष्टि-पालन-संहार कर पाने में समर्थ हो पाते हैं । इसका स्वरूप निम्नानुसार है—
'स्वयं' (पर शिव)—निजा + अपर शिव; परा + परमशिव; अपरा + शून्य
शिव; सूक्ष्मा + निरञ्जन शिव एवं कुण्डली + परमात्मा रूप शिव ।।
'कुण्डली' शक्ति चिच्छीला, चिद्रूपिणी, अनन्तरूपा, अनन्त एवं शक्तिस्वरूपा
है । जगत् इसी का परिणाम है अर्थात् इसका परिणमन ही जगत् है । इसके
उपरान्त आविर्भूत होते हैं—अहं प्रधान सदाशिव, इदं प्रधान ईश्वर एवं उभयप्रधान
शुद्धविद्या ।
स्फोट—योगी सुचिरनिद्रिता कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने का प्रयास
करता है । अधोमुखी कुण्डलिनी जैसे ऊर्ध्वमुखी होती हे वैसे ही 'स्फोट' होता है ।
यह स्फोट ही 'नाद' है । नाद से प्रकाश होता है और इस प्रकाश का व्यक्त रूप
ही 'महाबिन्दु' कहा जाता है । यह 'बिन्दु' तीन प्रकार का होता है । १. इच्छा,
२. ज्ञान, ३. क्रिया । इसे ही योगी सूर्य चन्द्र-अग्निद्य ब्रह्मा-विष्णु-महेश कहते हैं ।
यह 'नाद' एवं 'बिन्दु' ब्रह्माण्ड में व्याप्त अनाहत नाद का व्यष्टि में व्यक्त
रूप है । अनाहत भाव से समस्त विश्व में व्याप्त नाद व्यक्ति में प्रकाशित होने पर
'नाद' एवं 'बिन्दु' कहलाते हैं ।
प्रस्तुत श्लोक ३६ में जिस कुण्डलिनी का एवं 'प्रकाश' में—१. 'वह्नि
कुण्डलिनी' २. 'सूर्य कुण्डलिनी' एवं ३. चन्द्र कुण्डलिनी' का वर्णन किया है
उसका स्वरूप क्या है?
भास्करराय कहते हैं—
(१) 'वह्निकुण्डलिनी' = 'अत्र प्रथमकूटे या हृल्लेखा तदन्तर्गता या
कामकला' तस्यां गुरुमुखैकवेद्या या सपरार्धकला सा 'वह्नि कुण्डलिनी' इत्युच्यते ।'
(२) 'सूर्यकुण्डलिनी'—'सैव द्वितीय कूटे सूर्यकुण्डलिनी इति' ।
(३) 'सोमकुण्डलिनी'—तृतीय कूटे सोमकुण्डलिनी इति कथ्यते ।
'बिन्दादि समष्टिरूपो नादस्तु तत एवोत्पन्न दीपशिखाग्रवर्तिकज्जल-
लेखावत् ।'
'नाद' कुण्डलिनी रूप दीपशिखा की वर्तिकाग्रवर्ती कज्जललेखावत स्थित
है ।
मूलाधार से भी नीचे वाग्भवाकार त्रिकोण में 'समष्टिकुण्डलिनी' का वास
है ।