वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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प्रथमोऽंशः १८३
भावना अर्द्धचन्द्र एवं (उसके आगे के) वर्णत्रय तक की जानी चाहिए ॥ ४० ॥
- प्रकाश *
अर्धचन्द्ररोधिनीनादेषु व्याप्तस्तुर्यावस्थाप्रकाशो भाव्यः ॥ ४० ॥ - सरोजिनी *
ज्ञान की सात भूमिकायें
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शुभेच्छा विचारणा तनुमानसा सत्वापत्ति असंसक्ति पदार्थ भावना तुरीयगा
ज्ञान की सात भूमिकायें हैं । उनमें अन्तिम भूमिका है 'तुरीयगा' । 'शुभेच्छा
प्रथमा भूमिका भवति । विचारणा द्वितीया तनुमानसी तृतीया । सत्वापत्तिस्तुरीया ।
असंसक्तिः पञ्चमी । पदार्थ भावना षष्ठी । तुरीयगा सप्तमी ॥'
(१) अकार, उकार, मकार एवं अर्धमात्रा वाली प्रणवात्मिका भूमिका होती हैं ।
(२) उन अकार, उकारादि चार मात्राओं के प्रत्येक के स्थूल, सूक्ष्म कारण
एवं साक्षी भेद से चार-चार प्रकार के होते हैं । उसमें भी अकारादि के जो स्थूलादि
चार भेद हैं उनके प्रत्येक के जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय—ये चार भेद से
अवस्थायें होती हैं । आत्मा के भी चार भेद हैं—विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीय ।
'तदवस्था जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति तुरीयाः ।'
अकार का स्थूल अंश में—जाग्रत-विश्व, उनके सूक्ष्म अंश में जाग्रत तैजस,
उसके बीज अंश में जागृत-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में जागृत-तुरीय है ।
उकार के स्थूल अंश में स्वप्न-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में स्वप्न-तैजस, उसके
बीजांश में स्वप्न-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में स्वप्न-तुरीय है । प्रणव की तृतीय
मात्रा मकार के स्थूल अंश में सुषुप्ति-विश्व, उसके सूक्ष्म अंश में सुषुप्ति-तैजस
उसके बीजांश में सुषुप्ति-प्राज्ञ एवं उसके साक्षी अंश में सुषुप्ति-प्राज्ञ और उसके
साक्षी अंश में सुषुप्ति-तुरीय हैं । प्रणव की चौथी अर्धमात्रा के स्थूल अंश में
तुरीय-विश्व उसके सूक्ष्म अंश में तुरीय तैजस, उसके बीज अंश में तुरीय-प्राज्ञ एवं
उसके साक्षी अंश में तुरीय-तुरीय है ।
(३) अकार के स्थूलांश से तुरीयांश तक जो चार अवस्थायें हैं, उनमें तीन
भूमिकायें हैं—प्रथमा—'शुभेच्छा', द्वितीया—'विचारणा', तृतीया—'तनुमानसा' ।
उकार के स्थूलांश से लेकर तुरीय तक—चौथी 'सत्त्वापत्ति' भूमिका होती है ।
मकार के स्थूलांश से लेकर तुरीयांश तक पाँचवी असंसक्ति नामक भूमिका होती
है । अर्धमात्रा के स्थूलांश से लेकर उसके तुरीयांश तक छठवीं 'पदार्थभावना'
नामक 'भूमिका' होती है । इन समस्त भूमिकाओं के अनन्तर जो अवस्था होती
है । वही सप्तमी 'तुरीयगा' भूमिका है ।