वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १७९
कुण्डलिनी
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अधः कुण्डलिनी (मूलाधार ऊर्ध्व कुण्डलिनी (मूलाधार से
के अधोप्रदेश में मेरुदण्ड के उन्मना तक की यात्रा पार
सबसे निचले भाग में स्थित करके परमशिव के
त्रिकोणाकार अग्निचक्र साथ एकीभूत)
(कुलकुण्ड) में स्थित है ।
यही शक्ति की विकास भूमि
है—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
कुण्डलिनी
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अधः मध्य ऊर्ध्व परा
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
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अग्निखण्ड सूर्यखण्ड सोमखण्ड पराखण्ड
वा०कूट का०कूट श०कूट तूर्यकूट
कुण्डलिनी
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कुमारी योषित पतिव्रता
कुण्डलिनी कुण्डलिनी कुण्डलिनी
ध्यातव्य बिन्दु— 'बिन्दु' के बाद 'परा' के उद्भव का क्रमसङ्गत नहीं है क्योंकि
कुण्डलिनी एवं परा को असकृत (एक) कहा गया है । “सैषा परावाग्लक्षणा
कुण्डलिनी । तस्यास्तिस्रोऽवस्थाः पश्यन्त्याद्याः ता एव इह पर परापर अपर
कुण्डलिन्य उक्ताः ।'”१
कुण्डलिनी के मध्य में ज्योतिमात्र, सूक्ष्म, परा की अवस्थिति है । राघव भट्ट
ने इसे स्वीकार किया है— 'सूक्ष्मा कुण्डलिनीमध्ये ज्योतिर्मात्रात्म रूपिणी । अश्रोत्र-
विषया तस्यादुद्गच्छत्यूर्ध्वगामिनी ॥'२ यहाँ पर यह 'सूक्ष्मा' परा का ही वाचक है ।
सार्द्धत्रिवलयाकार 'कुण्डलिनी' एवं सार्द्धत्रिमात्रिक प्रणव एक ही है— 'उध्युष्ट-
वलयाकार प्रणवत्वमुपागता ।'३
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१. प्रयोगक्रमदीपिका (पृ० ४०६) २-३. 'पदार्थदर्श:' (पृ० ६०)