वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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(२) 'प्राण कुण्डलिनी' (३) 'पराकुण्डलिनी'—
विसर्ग के दो प्रकार हैं—(१) पर विसर्ग (आनन्द) (२) अपर विसर्ग (हकार
या प्राण) ! विसर्ग के दोनों छोरों पर दो कुण्डलिनियों का अवस्थान है—(१)
'प्राण कुण्डलिनी' (२) 'परा कुण्डलिनी' । प्रथम कोटि में अवस्थित 'कुण्डलिनी'
ही प्राण कुण्डलिनी' एवं द्वितीय कोटि में स्थित कुण्डलिनी परा कुण्डलिनी
कहलाती है । विसर्ग के दूसरे प्रान्त भूमि में—अनन्त कोटि में—जो कुण्डलिनी
अवस्थित है वह स्वात्मविश्रान्त, अन्तरोन्मुखी परासंवित् ही 'परा कुण्डलिनी' है ।
कुण्डलिनी
ॐ — 'कुलशक्ति' (सर्पिणी)
'अकुल' (नकुल)
'प्रकाश' (अकुल)
(परमशिव)
शब्दब्रह्ममयी कुण्डलिनी
'महाकुण्डलिनी'
('विमर्श' शक्ति)
↓
कुण्डलिनी | शक्ति | ('महाकुण्डलिनी रूपे सच्चिदानन्द
↓ | रूपिणी'—दे०भा०)
सूर्य कुण्डलिनी — समष्टि कुण्डलिनी | ध्वनि | ↓
↓ | (सत्व प्रविष्ट चित् शक्ति वाच्या
अग्नि कुण्डलिनी — सोम कुण्डलिनी | नाद | परमाकाशावस्था)
↓ | ↓
निरोधिका | (सत्वप्रविष्ट रजोनुविद्ध)
↓ | ↓
अर्द्धेन्दु | (तमोनुविद्ध)
↓ | ↓
बिन्दु | (ताम-प्राचुर्या)
↓ | ↓
कुण्डलिनी | परा | (सत्व प्राचुर्या)
↓ | ↓
समष्टि प्रणव — 'अ' — 'उ' — 'म' | पश्यन्ती | (उभय संयोग)
↓
मध्यमा
↓
वैखरी¹
१. शारदातिलक (त० प्र० पटल)