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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 530 में से

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पृष्ठ 279

प्रथमोऽंशः १७७
कुण्डलिनी
(मूलाधार के नीचे) (मूलाधार में) (हृदय में) (भ्रूमध्य में)
वाग्भवाकार त्रिकोण में 'अग्निकुण्डलिनी' 'सूर्यकुण्डलिनी' 'सोमकुण्डलिनी'
'समष्टिकुण्डलिनी' (उकार) (अकार) (मकार)
(समष्टिप्रणव)
'कुण्डलिनी' ही उन्मना है ।
नित्यानन्द कृत श० महिम्नस्तोत्र की व्याख्या में 'कुण्डलिनी' के ४ रूप
बताए गए हैं ।
(१) भास्कराचार्य : कूटत्रय में ३ कुण्डलिनियाँ हैं—
(क) (प्रथम कूट की हल्लेखा में स्थित कामकला में स्थित सपरार्ध कला)
'वह्निकुण्डलिनी' (ख) द्वितीय कूट में 'सूर्यकुण्डलिनी' (ग) 'तृतीय कूट' में
'सोमकुण्डलिनी'
(२) नित्यानन्दकृत महिम्नस्तोत्र की व्याख्या—इसके अनुसार कुण्डलिनी के ४
रूप हैं—
(१) मूलाधार में—'अग्निकुण्डलिनी'
(२) हृदय में—'सूर्यकुण्डलिनी'
(३) भ्रूमध्य में—'सोमकुण्डलिनी'
(४) वाग्भवाकार त्रिकोण में—(जो कि मूलाधार चक्र के नीचे स्थित है)—
'समष्टि कुण्डलिनी'
(चतुर्विधतनु अग्निसूर्य सोम समष्टिरूपेण, अग्निकुण्डलिनी मूलाधारे, सूर्य-
कुण्डलिनी हृदये, सोमकुण्डलिनी भ्रूमध्ये, समष्टिकुण्डलिनी मूलाधाराधोगत वाग्भवा-
कार त्रिकोणे)१
कुण्डलिनी के अन्य स्वरूपों का भी दिग्दर्शन कराया गया है यथा (१)
'शक्ति कुण्डलिनी'—जब 'अमाकला' विसर्गहीन हो जाती है तब इसी भुजङ्गाकार,
स्वात्मविश्रान्त, प्रसुप्त परासंवित को 'शक्तिकुण्डलिनी' कहते हैं । 'अ' नाम्नी
पराशक्ति (या 'सप्तदशीकला' अर्थात् 'अमा') तिरोधान शून्य होने के कारण
नित्योदित है और 'अमृतकला' कहलाती है और अन्तःकरण आदि षोडश कलाओं
की उद्भाविका है—वही 'अमाकला' विसर्ग शून्य होने परबहिरुन्मुख न रहने पर—
'शक्तिकुण्डलिनी' की आख्या धारण करती है ।
१. नित्यानन्द कृत श० महिम्नस्तोत्र, व्याख्या, पृ० ६
१२ वरि.