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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 530 में से

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पृष्ठ 282

१८० वरिवस्यारहस्ये
शक्ति की दो भूमियाँ
विकास भूमि सङ्कोचभूमि (ऊर्ध्व कुण्डलिनी)
(अधः कुण्डलिनी) —(प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
(विकास) (सङ्कोच)
अथावस्थापञ्चकं शून्यषट्कं विषुवत्सप्तकं च जपकाले विभागव्यमाह—
इन्द्रियदशकेत्यादिना, एवमवस्थेत्यन्तेन श्लोकषोडशकेन ।
इन्द्रियदशकव्यवहृतिरूपा या जागरावस्था ।
तत्र प्रकाशरूपो हेतुर्भाव्यस्तृतीये रेफे ॥ ३७ ॥
(जागृतावस्था और रेफस्थ प्रकाश के अंतर्संबन्ध का प्रतिपादन)
जिसमें दस इन्द्रियाँ व्यवहार (जागतिक क्रियाओं का निष्पादन) करती हैं
उसके स्वरूपवाली जो जागृतावस्था है उसमें, तृतीयकूट के रेकस्थान में होने वाले,
उस प्रकाश की कल्पना करनी चाहिए जो कि जागृतावस्था का कारण है ॥ ३७ ॥

  • प्रकाश *
    कर्मेन्द्रियाणि पञ्च वाक्पाणिपादपायूपस्थानि; ज्ञानेन्द्रियाण्यपि पञ्च