सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 283

प्रथमोऽशः १८१
(३) आन्तरवृत्तेर्लवतो, लीनप्रायस्य जीवस्य । वेदनमेव सुषुप्तिः ॥ ३९ ॥
(४) तुर्यावस्थाचिदभि व्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ॥ ३९ ॥
(५) आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् । तुरीयातीतावस्था ॥ ४१ ॥
शब्द की भी (१) जागर (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति (४) तुरीय—चार अवस्थायें
बतायी गई हैं । 'तुरीय' शब्द ही 'शब्दब्रह्म' है । इसका अतिक्रम करके अतितुर्य
या पर ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है । यह परब्रह्म ही 'परमशिव' है । आचार्य शङ्कर
ने 'प्रपञ्चसार तन्त्र' के टीकाकार पद्मपादाचार्य ने चेतन तत्त्व को इन पाँच स्तरों पर
स्थित देखा है—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म, (३) कारण, (४) सामान्य, (५) साक्षी ।१
ग्रन्थान्तर में यह भी कहा गया है कि शब्द का सघोष एवं अघोष बाह्य व्यवहार
उसकी 'जागरावस्था' है । समष्टिरूप से हम इसे 'विराटशब्द' कह सकते हैं । पर
श्रूयमाण शब्द सघोष शब्द या वाचिक शब्द हैं । अघोष (उपांशु = स्वयं मात्र को
श्रुत) अघोष है । जाग्रत दशा में सर्वत्र सघोष एवं अघोषात्मक वाग्व्यवहार रूप
शब्दानुविद्धता ही प्रधानतः दृष्टिगोचर होती है । यह स्थूल शब्द वैखरी वाक् कहा
जाता है । कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों का व्यवहार ही जागृतावस्था है ।२
अन्तःकरणचतुष्कव्यवहारः स्वाप्निकावस्था ।
सा तार्तीयैकाराद्बध्यापि गलस्थले चिन्त्या ॥ ३८ ॥
(स्वप्नावस्था एवं मन्त्राक्षर 'ई' में स्थित प्रकाश के अंतर्संबंध का विवेचन)
अन्तःकरणचतुष्टय का व्यवहारस्वरूप (जागतिक क्रियानिष्पादनरूप) जो
स्वप्नावस्था है (उसका कारणरूप जो प्रकाश है) उसे तृतीय कूट की हृल्लेखा में
स्थित ईकार रूप कामकला के द्वारा (उस स्वप्नावस्था में विद्यमान) समझना
चाहिए । द्वितीय कूट के लकार को भी वैसे ही समझना चाहिए ॥ ३८ ॥

  • प्रकाश *
    मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेत्यन्तःकरणानि चत्वारि । तैरेवं व्यवहारः स्वप्नः ।
    तज्जनकः प्रकाशस्तृतीयहृल्लेखास्थकामकलया१ बोध्यः । अथापि गलस्थले द्वैतीयी-
    कलकारे चिन्त्यः । गलस्थश्चासौ लश्चेति विग्रहः ॥ ३८ ॥
  • सरोजिनी *
    प्रस्तुत श्लोक में स्वप्नावस्था एवं उससे पञ्चदशी मन्त्र का सम्बंध क्या
    है?—इसका निरूपण किया गया है । उनका कथन है कि—अन्तःकरण चतुष्टय
    के व्यवहार का अपर पर्याय है 'स्वप्न' । इस स्वप्नावस्था का मूलभूत (केन्द्रीय)
    कारण कौन हैं? इसका कारण है वह अचिन्त्य दिव्य प्रकाश जो कि तृतीय कूट
    की हृल्लेखा में स्थित ईकार रूप कामकला । भास्कराचार्य कहते हैं—'मनो
    १. पद्मपादाचार्य—प्रपञ्चसार की टीका २. भास्करराय—प्रकाश