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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 530 में से

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पृष्ठ 284

१८२ वरिवस्यारहस्ये
• बुद्धिरहङ्कारश्चितं चेत्यन्तः करणानि चत्वारि । तैरेव व्यवहारः “स्वप्नः” । तज्जनकः
प्रकाश स्तुतीय हृल्लेखास्थकामकलया बोध्यः ॥'
द्वितीय कूट के लकार को भी वैसा ही समझना चाहिए । 'स्वप्नावस्था' की
केन्द्रीय शक्ति है 'ह्रीं' में स्थित ईकार स्वरूप 'कामकला' ॥ ३८ ॥
आन्तरवृत्तेर्लयतो लीनप्रायस्य जीवस्य ।
वेदनमेव सुषुप्तिश्चिन्त्या तार्तीयबिन्दौ सा ॥ ३९ ॥
(सुषुप्ति का स्वरूप)
तृतीयकूट के बिन्दु में उस सुषुप्ति की भावना करनी चाहिए जो कि सुषुप्ति
का कारण है और जिसमें समस्त अन्तःकरण एवं जीव निद्रामग्न हैं ॥ ३९ ॥

  • प्रकाश *
    विवरणमत आत्मसुखाज्ञानविषयिकास्तिस्रोऽविद्यावृत्तयः स्वीकृता इत्यत आह—
    आन्तरवृत्तेरिति । अन्तःकरणपरिणामरूपवृत्तेरित्यर्थः । वार्त्तिकमते वृत्तिसामान्याभाव
    एव सुषुप्तिः । तार्तीयबिन्दौ ललाटस्थाने ॥ ३९ ॥
  • सरोजिनी *
    'सुषुप्ति'—जिस समय अपने व्यापार-सहित बुद्धि अपने कारण अज्ञान में
    विलीन हो जाती है उसी को विज्ञ पुरुषों ने 'निद्रा' कहा है ।१ सुषुप्ति-काल में घोर
    निद्रा में सकल इन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि इत्यादि तथा इनकी वृत्तियाँ अपने उपादान
    कारण अविद्या में विलीन हो जाती हैं और उस समय आत्मा की जाग्रत-स्वप्न
    अवस्थाओं के अभाव होने के कारण विश्व तैजस आदि संज्ञा नहीं रहती, उस समय
    तो वह तमावृत अपने स्वरूप सुख का बिना किसी साधन की सहायता के ही
    स्वयं भोग करता है ।२
    वृत्तियाँ एवं सुषुप्ति—
    (१) विवरणकार का मत—आत्मसुख के अज्ञानविषयिक तीन अविद्या वृत्तियाँ
    हैं । अन्तःकरण का परिणाम रूप ही वृत्तियाँ हुआ करती हैं ।
    (२) वार्तिककार का मत—वृत्ति सामान्य का अभाव ही सुषुप्ति है ।
    तुर्यावस्था चिदभिव्यञ्जकनादस्य वेदनं प्रोक्तम् ।
    तद्भावनार्धचन्द्रादिकं त्रयं व्याप्त कर्त्तव्यः ॥ ४० ॥
    (तुरीयावस्था का स्वरूप)
    चैतन्य को अभिव्यक्त करने वाली जो नादावस्था है (वह अवस्था जिसमें
    'नाद' पूर्ण चैतन्य को अभिव्यक्त करता है) 'तुरीयावस्था' कहलाती है । उसकी
    १. वराहोपनिषद