वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १७५
मुखपद्म की सुगंधि से शिव को आह्लादित कर देती है और शिव के ऊपर लेटती
हुई शिव के मुखपद्म का चुम्बन लेती है और क्षणमात्र के लिए सदाशिव के साथ
रमण करती है जिससे कि उसी क्षण लाखरस के समान रङ्ग वाला अमृतक्षरित
होता है—इसी अमृत से परदेवता एवं षट्चक्रस्थित देवों की पूजा की जानी चाहिए
('उन्हें सन्तुप्त करना चाहिए') 'सङ्केतपद्धति' में पिण्ड को ही कुण्डलिनी शक्ति
कहा गया है, 'पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः ।'१' स्वयंभूलिङ्ग के साथ रमण करनेवाली
इस कुण्डलिनी को मूलाधार से सहस्रार में लाना चाहिए । और वहाँ से शंभु के
साथ एकीकृत (अभिन्न) रूप में देखकर तथा पीनोन्नतपयोधरा, षोडशवर्षीया,
नवयौवनसम्पन्ना, सर्वाभरणभूषिता, पूर्णचन्द्रनिभा, नानारत्नयुता, नूपुरशोभिता,
कन्दर्पकोटिलावण्या, रक्तकङ्कणमण्डिता, किंकिणीशोभिता, मधुरहासिनी कामिनी के
रूप में परिकल्पित करना चाहिए ।
अवरोहण क्रम—सहस्रार में स्थित देवी कुण्डलिनी का इस रूप में ध्यान
करके फिर १०८ बार मातृका-माला से मन्त्र का जप करना चाहिए ।
परमात्मा और कुण्डली—नाथ योगियों का कथन है कि 'परमशिव' में
सिसृक्षा उत्पन्न होते ही उसे 'सगुण शिव' (वेदान्तियों का अपरंब्रह्म) कहा जाने
लगता है क्योंकि वह इच्छायुक्त होता है । यह सिसृक्षा है । शक्ति है । परमशिव
से एक साथ ही दो तत्त्व उत्पन्न होते हैं—१. शिव २. शक्ति । यह शक्ति पाँच
अवस्थाएँ पार करती हैं—
(१) 'निजा'—परमशिव की अवस्था मात्र धर्म से युक्त, स्फुरित होने की
पूर्ववर्तिनी और स्फुरणोन्मुखी यह अवस्था ही 'निजा' है । शक्ति की इस निजा
अवस्था में जो शिव रहते हैं वे उनकी अवस्था 'अपरंपदम' है । वे अव्यक्त रूप में
रहते हुए भी स्फुरणोन्मुखी शरीर से युक्त होकर रहते हैं ।
(२) 'परा'—यह शक्ति की स्फुरणोन्मुखी अवस्था है । इस अवस्था के शिव
को 'परम' कहते हैं ।
(३) 'अपरा'—यह शक्ति स्पन्दावस्था है । शक्ति की इस अवस्था के साथ
रहने वाले शिव 'शून्य' कहलाते हैं ।
(४) 'सूक्ष्मा'—इस अवस्था में शक्ति सूक्ष्म अहन्ता भाव से युक्त होती है ।
इसके साथ रहने वाला शिव निरञ्जन कहा जाता है ।
(५) 'कुण्डली'—शक्ति की यह अवस्था वह है जिसमें वह पृथकता का भाव
लेकर प्रस्तुत होती है । इस अवस्था से उत्पन्न शिव 'परमात्मा' कहलाते हैं—
निजा पराऽपरा सूक्ष्मा कुण्डली तासु पञ्चधा ।
शक्ति चक्रक्रमेणैव जातः पिण्डः परः शिवे ॥'२
१. संकेत पद्धति
२. सिद्धसिद्धान्त संग्रह (१।१३)