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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 530 में से

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पृष्ठ 276

१७४ वरिवस्यारहस्ये
(३) चक्रमयस्य त्रिविध संहतित्रयरूपस्यापरं रूपमिति विभावनीयाः (क)
'अनाहतमारभ्योत्थितो नाद' (ख) 'भूमध्यमारभ्योत्थितो नादः (ग) 'बिन्दुस्थान-
मारभ्योत्थितो नादः ॥'१
कुण्डलिनी का स्वरूप—कुण्डलिनी 'परमाकला' है—'सर्पाकारा कुण्डलिनी
या देवी परमाकला ।'२ यह समस्त गुणों से युक्त एवं सूर्य, चन्द्र तथा अग्निरूपिणी
है—'गुण युक्ता कुण्डलिनी चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी ।'३ यह एक अचिन्त्य शक्ति है और
भुजगाकाररूपिणी है—'मूलाधारे तुया शक्तिर्भुजगाकाररूपिणी ।' जीवात्मा इसी
कुण्डलिनी के मध्य निवास किया करता है (जीवात्मा परमेशानि तन्मध्ये वर्तते
सदा ।)४ इस शक्ति का निवास पाताल में है और उसके प्रियतम शिव का निवास
ब्रह्माण्ड में है—'पाताले वसते शक्ति ब्रह्माण्डे वसते शिवः'५ यह वासुकी या
महामाया है । भुजगाकाररूपिणी । सार्धत्रिवलयाकारा पाताल तल वासिनी ॥६
कुण्डलिनी वर्णमाला के ५० वर्णों के स्वरूप वाली है—"मूलचक्राच्छिरोऽन्ता च
सुषुम्ना परिकीर्तिता । तद्गर्भस्था च या शक्तिः सा देवी कुण्डरूपिका । सा सदा
कुण्डलिनी देवी पञ्चाशद्वर्णभूषिता ॥'७ यह कामिनी कुण्डलिनी महापत्रात्मक सहस्रार
के बीजकोष या शिवालय में जाकर तथा शिव का साक्षात्कार करके तथा मालाकार
रूप में स्थित होकर शिवलिङ्ग को अपने इसी अकारादिक्षकारान्त वर्णमाला रूप
अक्षमाला से परिवेष्टित किये रहती है—
'सहस्रारं तु सम्प्राप्य शिवं दृष्ट्वा तु कामिनी ।
मालाकारेण तल्लिङ्गं संवेष्ट्य कुण्डली सदा ॥'८
यह अन्तर्माला ही महामाला है जो ५० वर्णों से निर्मित है ।९ 'अन्तर्माला
महामाला पञ्चाशद्वर्णरूपिणी' और स्वयंभूलिङ्ग पर सुशोभित है । यही कुण्डलिनी
सहस्रार महापद्म में 'महाकुण्डलिनी' कही जाती है—'सहस्रारे महापद्मे विश्वरूप परः
शिवः । महाकुण्डलिनी तत्र स्थिता नित्या सुरेश्वरि ॥'१० यह विद्युल्लता के आकार
की, सोते हुए सर्प की आकृति वाली, सार्द्ध त्रिवलयों से अलंकृत, भगवान शिव
को आवेष्टित करके स्थित 'परमेश्वरी' कुण्डली 'परदेवता' है—'तत्र विद्युल्लताकारा
कुण्डली पर देवता । प्रसुप्तभुजगाकारा सार्द्धत्रिवलयान्विता ॥'११ सहस्रार में शिव
शून्यरूप एवं करोड़ों विद्युत के समान देदीप्यमान कुण्डली इन्दुरूप है और यहाँ
'परमकुण्डली' कहलाती है—'शून्यरूपं शिवं साक्षादिन्दुं परमकुण्डलीम् ॥'१२ यह
नादरूपा, योनिरूपा सनातनी शक्ति है—'नादरूपेण सादेवी योनिरूपा सनातनी ।'१३
परदेवता कुण्डली हुङ्कार वर्ण से उत्पन्न होती है—'हुंकार बर्ण संभूता कुण्डली
परदेवता ।'१४ 'परदेवता', 'कुण्डली', 'महादेवी' रूपा यह 'रूपवती' देवी अपने

१. आचार्य भास्करराय २-४. मातृकाभेद तन्त्र
५. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र ६-१०. तोडल तन्त्र
११-१२. शाक्तनन्दतरंगिणी, कुब्जिकातन्त्र १३. यामल
१४. गंधर्वमालिका