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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

१४४ वरिवस्यारहस्ये
ब्रह्मद्वार को ढके हुए कुण्डलिनी स्थित है ।) 'कन्द' (गुदा से ऊपर एवं लिंग से
नीचे जो कन्द है) वहीं सुषुम्णा भी स्थित है । उसी सुषुम्णा में अधोमुख, चतुर्दल
युक्त, लाल, व, श, ष, स वर्णों से अंकित कमल-दलों वाला मूलाधार पद्म है ।
मूलाधार चतुष्कोण चक्र है ।१ इस पद्म की कर्णिका में चतुष्कोण पृथ्वीमण्डल है ।
पृथ्वीमण्डल की आठों दिशाओं में सुदीप्त अष्टशूल हैं । पृथ्वीमण्डल एवं इस
मण्डल का बीज दोनों पीले हैं । बीज के मध्य स्थित इन्द्र भी पीले हैं । ये
वज्रपाणि हैं । यहाँ स्थित ऐरावत पर प्रातःकालीन सूर्यवत् ब्रह्मा स्थित हैं जो कि
चारों वेद, दण्ड, कमण्डल, अक्षसूत्र एवं अभयमुद्रा हाँथों में धारण किए हैं ।
'वज्रा' के मुख में स्थित कर्णिका में स्थित 'त्रिकोण' ('कामरूप') एवं 'त्रैपुर' जो
विद्युतवद है । यहाँ सर्वत्र 'कन्दर्पवायु' (अपानवायु का एक रूप) है जो कि
बंधुजीव की भाँति लाल, कोटिसूर्य प्रतीकाश एवं जीवेश है । 'त्रिकोण' के मध्य में
'स्वयंभूलिङ्ग' स्थित है जो कि पिघले सोने की भाँति सुन्दर है और निम्नाभिमुखी
है । यह ज्ञान एवं ध्यान से प्रकट होता है और नई पत्ती के रङ्ग-रूप का है । यह
विद्युत की शीतल किरणों एवं पूर्णचन्द्र के समान सुन्दर है ।२ (यह
कामबीज-परिचालित है ।) 'शाक्तानन्द तरङ्गिणी' के अनुसार यह श्यामवर्ण का है ।
उसके ऊपर बिसतन्तुसूक्ष्मा, जगन्मोहिनी, ब्रह्मद्वार के मुख को स्वमुख से ढककर
उस पर सोने वाली, नवीन चपलाकारा, शङ्खावर्तनिभा, सर्पसमा, शिवोपरिस्थिता,
मतवाले भ्रमरों के समान कूजन करने वाली, कोमलकाव्य का सृजन करने वाली,
श्वासोच्छ्वास द्वारा समस्त प्राणियों का पालन करने वाली, प्रोद्दाम दीप्तावलि के
समान दीप्तिमती वह कुण्डली मूलाम्बुज गह्वर में स्थित है । (कुण्डलिनी में
'परावाक्' स्थित है ।)३ कुण्डलिनी के ऊपर एक सीधे सूत्र के समान 'पराशक्ति'
विद्यमान है । वह नित्य प्रबोधोदया, सूक्ष्मातिसूक्ष्मा, नित्यानन्दपरम्परातिविगलत्पीयूष
धाराधरा श्रीपरमेश्वरी रूप 'पराशक्ति' परमा कला है ।४
(ख) 'अनाहत चक्र'५—स्थान—हृदय । भूषण—दिव्यलिङ्ग से भूषित ।
वर्ण—क से ठ पर्यन्त द्वादश वर्ण । वायु—इस पद्म में अनादिकर्म-संसृष्ट,
अहङ्कारोपेत, अनेक वासना-पंकिल 'प्राणवायु' स्थित है । दल = १२ । इस पद्म
का नामान्तर६ प्रसादस्थान (प्रसाद का स्थान = प्रसन्न लो) बीज = वायु बीज 'यं' ।
लिङ्ग = परम तेजःस्वरूप 'बाणलिङ्ग' । पिनाकी सिद्धलिङ्गा देवी = काकिनी ।७
ध्यान-फल—कामिनी वशीकरण, दूरदर्शन, दूरश्रवण, आकाश में स्वेच्छा सञ्चरण,
देवों-योगिनियों के दर्शन, खेचरी-सिद्धि, भूचरी-सिद्धि ।।८ रङ्ग = बंधूककान्त्युज्ज्वल ।
वायु = धूम्रवर्ण का ।। कोण = छः । (मध्य में जो वायुमण्डल है उसमें
बीज-स्थिति है । मण्डल का रङ्ग = धूम्रावली धूसर ।।९) देवी = काकिनी जो
त्रिनेत्रा हैं, सर्वालङ्कारभूषिता, नवतडितवतपीता है और कङ्कालमालाधरा हैं । त्रिकोण
= पद्म-कर्णिका में कोटि विद्युतप्रभान्वित त्रिकोण । लिङ्ग—त्रिकोण में चमकते सोने
१-४. षट्चक्रनिरूपण ५-८. शिवसंहिता
९. षट्चक्रनिरूपण

प्रथमोऽंशः १४५
की भाँति ‘बाणलिङ्ग’ ।१ पीठ = भगवान् शर्व का पीठ । अलङ्कारक उपादान२—
दीपकलिकावत दीप्तिमान हंस से सुशोभित ॥ यह हंस ही जीवात्मा है । ध्यान का
फल—वाणी का ईश्वर हो जाता है, ईश्वरवत रक्षा एवं विनाश कर सकता है ।३
कर्णिका का आन्तर भाग—कर्णिका में त्रिकोण सूर्यमण्डल है ।४ लिङ्ग का आन्तर
भाग—लिङ्ग में जीवात्मा निवास करती है । जीव—जीव दीपकलिकावत है ।
अन्तःकरण के ऊपर ५४ दल कमल हैं ।५ ध्यान का फल—अणिमादि आठ
सिद्धियों की प्राप्ति एवं कविराजत्व ।६
(ग) ‘आज्ञा चक्र’—‘आज्ञाचक्र’ छठवाँ चक्र है । चक्राक्षर ह + क्ष । दल—
दो । स्थान—भ्रुवद्वय का मध्यभाग । शक्ति—शुभ्रवर्णा हाकिनी । कर्णिका—
अमृतस्रावि ‘ल’ से युक्त कर्णिका ॥ मन—प्रदीप्तकलिकाकृति वाला मन यहाँ रहता
है । लिङ्ग—कर्णिका में स्थित, त्रिकोण में लिङ्ग स्थित है । आत्मा—(उसमें ही)
प्रदीपवत आत्मा भी स्थित है । दल—इस चक्र के ऊपर ६४ दलों का ध्यान
करणीय । ६४ दलों में शिवशक्ति स्थित हैं । उत्पत्ति क्रम-परा—इच्छाशक्ति—
ज्ञानशक्ति—भूतक्रिया । कुण्डली—मातृका ॥ शंभु की रश्मियाँ—३६० ॥७ लिङ्ग—
‘शुक्ल’ नामक महाकाल ही यहाँ शिवलिङ्ग हैं । स्वरूप—परमतेज स्वरूप ।
देशगत स्थान—इड़ा (वरणा नदी) असी (असी नदी), आज्ञाचक्र—वरणा + असी
का सङ्गम = ‘वाराणसी’ । ‘वरणा’ = इड़ा नाड़ी । ‘असी’ = पिङ्गला नाड़ी ।
‘गङ्गा’ = इड़ा । ‘यमुना’ = पिङ्गला । ‘इड़ा’ = अमृत नाड़ी ।८ ‘त्रिवेणी’ =
आज्ञा पद्म । त्रिवेणी = (१) ‘युक्तत्रिवेणी’ (२) ‘मुक्तत्रिवेणी’ पुरुषाङ्ग के नीचे है—
‘युक्तत्रिवेणी’ । भ्रूमध्य में स्थित है—‘मुक्तत्रिवेणी’ ॥ भ्रूमध्य तक आकर वहाँ इड़ा,
पिङ्गला एवं सुषुम्णा त्रिवेणी रूप ग्रन्थिभाव प्राप्त करके नासारंध्र तक पहुँचती हैं ।
आज्ञा पद्म के भीतर शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान चन्द्रबीज ‘ठं’ स्थित है ।९
मूलाधार के चतुर्दल पद्म की योनि में ‘सूर्य’ रहता है । सूर्यमण्डल से सतत्
विषजल बहता है । यह विष पिङ्गला में बहता है । आज्ञाचक्र के वामभाग से यह
‘असी’ या ‘पिङ्गला’ नाड़ी प्रस्थान करती है ।१० ‘द्विदल आज्ञापद्म’ के ऊपरी भाग
में तीन पीठ हैं—(१) बिन्दु (२) नाद (३) शक्ति ॥ ये तीनों आज्ञाचक्र में स्थित
हैं ।११ ध्यान-फल—पूर्व जन्मों के कर्मों का क्षय । यक्ष, राक्षस, गंधर्व, अप्सरा एवं
किन्नर आदि का वशीभूत होना । जिह्वा को उलटकर एवं तालुमूल में लगाकर
आज्ञा कमल आधा क्षण भी चित्तस्थैर्य से पापपहाड़ का विनाश ।१२ आज्ञापद्म का
ज्ञान—समस्त पद्द्मों के फल की प्राप्ति । ध्यान—वासना क्षय ॥ परमानन्दाप्ति ।
मृत्यु के समय इस चक्र का ध्यान—परमात्मा में लय ॥ इस पद्म का अहर्निश
ध्यान—समस्त पापों से मुक्ति ॥ समस्त बंधनों से मुक्ति ॥१३
आज्ञाचक्र हिमकर (चन्द्रमा) के समान है । ‘ध्यानधाम प्रकाश’ है । इस चक्र
के भीतर स्थित ‘हाकिनी’ के छः मुख चन्द्रमा के समान है । इस पद्म के भीतर
१-३. षट्चक्रनिरूपण ४-७. चक्र कौमुदी
८-१३. शिवसंहिता
१० वरि.

१४६ वरिवस्यारहस्ये
'सूक्ष्मरूप मन' रहता है । पद्म की कर्णिका में स्थित 'योनि' में 'इतर' नामक शिव
निवास करते हैं । वे विद्युन्मालावत दीप्तिमान हैं ।१ वेदों का प्रथम या आदि बीज
(ब्रह्मसूत्रों को अपने प्रकाश से प्रकट करने वाली शक्ति का निलय) भी यहाँ है ।
इस चक्र में स्थित त्रिकोण में ओङ्कार है । यही प्रदीपाभज्योति शुद्धबुद्धान्तरात्मा है।
इसके ऊपर अर्धचन्द्र है और इसके ऊपर 'बिन्दु' के रूप में प्रकाशित 'मकार'
है ।२ इसके ऊपर चन्द्रकिरणों को फैलाने वाला श्वेतवर्ण 'नाद' है । (प्रणव प्रकाश
किरणों से घिरा है । इसके ऊपर दीपवत आत्मा स्थित है ।) यह चक्र दीप्तिमान
प्रातः के दीप्त सूर्य के समान है । यही परमात्मा अपनी पूर्ण शक्तियों के साथ व्यक्त
होता है । यह अतुल्य एवं परमामोदपूर्ण विष्णु-धाम है । ध्यानफल—परशरीर में
प्रवेश, सर्वज्ञता, सर्वदर्शिता, सर्वशास्त्रज्ञान, ब्रह्मात्मैक्य प्राप्ति आदि३ ॥ २०-२१ ॥
अथावशिष्टस्य बिन्द्वादिनवकस्य स्थितिस्थानरूपाकारा नाह—
आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णमध्यगतः ।
मध्येफालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ॥ २२ ॥
तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्याकृत्या ।
अथ रोधिनी तदूर्ध्वं त्रिकोणरूपा च चन्द्रिकाकान्तिः ॥ २३ ॥
नादस्तु पद्मरागवदण्डद्वयमध्यवर्तिनीव सिरा ।
नादान्तस्तडिदाभ सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ॥ २४ ॥
निर्याबिन्दुद्वितये वामोद्गच्छत्सिराकृतिः शक्ति ।
बिन्दूद्गच्छत्त्यश्राकारधरा व्यापिका ४प्रोक्ता ॥ २५ ॥
ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ।
सैवोर्ध्वबिन्दु हीनोन्मना तदूर्ध्वं महाबिन्दुः ॥ २६ ॥
शक्त्यादीनां तु वपुर्द्वादश रवि कान्ति पुञ्जाभम् ।
इत्येवं वर्णानां स्थानं ज्ञात्वोच्चरेद्यत्नात् ॥ २७ ॥
नादः प्राथमिकस्तु द्वितीय कूटेन साकमुच्चार्यः ।
द्वितीयीकं नादं तार्तीयेनोच्चरेन्न पृथक् ॥ २८ ॥
बिन्द्वादिनवकयोस्तु प्राक्त न कूटस्थ योर नयोः ।
संमेलनेन शबलं तार्तीयीकं विभावयेत् कूटम् ॥ २९ ॥
बिन्द्वादि कसमनान्तं क्रमेण तार्तीयमुच्चरेन्नादम् ।
उन्मन्यन्तर्लीनं विभावयेदेतदुच्चरणम् ॥ ३० ॥
१-३. षट्चक्रनिरूपण ४. कथिता

प्रथमोऽंशः १४७
(नाद एवं बिन्दु का स्वरूप)
मूलाधार-चक्र से ऊर्ध्वोत्थित 'नाद' वर्णों के मध्य सञ्चरण करता हुआ ऐसा
प्रतीत होता है मानों (किसी पुष्प-माला के मध्य सञ्चरण करता हुआ कोई) सूत
हो। मस्तक के मध्य स्थित 'बिन्दु' ऐसा प्रतीत होता है मानों कोई वृत्ताकार
दीपक हो ॥ २२ ॥
(अर्द्धचन्द्र एवं रोधिनी का स्वरूप)
उसके (बिन्दु के) ऊर्ध्व में स्थित 'अर्द्धचन्द्र' अपनी प्रभा एवं आकार में
अन्वर्थक (आकार एवं दीप्ति दोनों दृष्टियों से समतुल्य) है। उसके उपरान्त स्थित
त्रिभुज की आकृति वाली 'रोधिनी' ज्योत्स्नावत दीप्तिमान है ॥ २३ ॥
(नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना का स्वरूप)
'नाद' पद्मराग मणि की दीप्ति वाला, अण्डद्वितय के मध्य वर्तमान नाडिका
के समान है। 'नादान्त' विद्युत के समान उद्दीप्त है और वामभागवर्ती बिन्दु से
युक्त हल की भाँति आकृति वाला है ॥ २४ ॥
'शक्ति' दो बिन्दुओं के वाम भाग से उदित होने वाली सिरा के आकार वाली
है। 'व्यापिका' बिन्दु एवं उसके ऊपर आरूढ़ त्रिकोण के समतुल्य आकार वाली
कही गई है ॥ २५ ॥
'समना' का आकार रेखा के ऊर्ध्व एवं अधोभाग में स्थित बिन्दु द्वय (के
आकार के समान) है। ऊर्ध्ववर्ती बिन्दु द्वय से रहित वही ('समना') 'उन्मना' है।
उसके ऊर्ध्व भाग में 'महाबिन्दु' स्थित है ॥ २६ ॥
'शक्ति' आदि (शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मना) का शरीर (स्वस्वरूप)
बारह सूर्यों के प्रकाश-समूह के समान देदीप्यमान है। इस प्रकार वर्णों के स्थान
का ज्ञान प्राप्त करके उनका यत्न (आभ्यन्तर एवं बाह्य) के अनुसार उच्चारण
करना चाहिए ॥ २७ ॥
(नादोच्चारण की प्रक्रिया)
प्राथमिक कूट के नाद का उच्चारण द्वितीय कूट के साथ करना चाहिए।
द्वितीय कूट के नाद का उच्चारण तृतीय कूट के साथ करना चाहिए, अलग
नहीं ॥ २८ ॥
तृतीय कूट को पूर्ववर्ती कूटद्वय के बिन्द्वादि नवों के गण के संमेलन द्वारा
शबल रूप में कल्पित करना चाहिए ॥ २९ ॥
'बिन्दु' से आरंभ करके क्रमानुसार 'समना' में पर्यवसित होने वाले तृतीय
कूट के नाद का उच्चारण करना चाहिए एवं इसे 'उन्मनी' में अन्तर्लीन कल्पित
करना चाहिए ॥ ३० ॥

अत्रेयं शब्दसृष्टिप्रक्रिया—वटबीजान्तर्गतवटवृक्षीयसूक्ष्मरूपतुल्यशब्दसृष्टिसूक्ष्म-
रूपशालिनी पूर्वोक्तरूपा त्रिपुरसुन्दर्यैव तादृशसूक्ष्मरूपवत्त्वप्रवृत्तिनिमित्तकपरापदवाच्या।
सैव च माति तरति कायतीति च व्युत्पत्त्या मातृकेत्युच्यते । तस्यां च निर्विकाराया-
मप्यनादिसिद्धप्राण्यदृष्टवशात् स्वान्तः-संहतविश्वसिसृक्षोत्पद्यते । ततः स्रष्टव्यपदार्थना-
लोचयति, 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' इति श्रुतेः । तादृशमीक्षणमेव प्रवृत्तिनिमित्तीकृत्य
तस्यां पश्यन्तीति पदं प्रवर्तते । सैव च पश्यन्त्याख्या मातृका करणसरणित
उत्तीर्णात्वादुत्तीर्णेत्युच्यते । तदवयवाश्च वामादयोऽष्टौ शक्तयोऽन्यत्र प्रपञ्चिताः । अतः सैव
व्यष्टिसमष्टिवेषेण नवविधा । ततो नव नादा अविकृतशून्यादयो जाताः । तत्समष्टिश्च
नादध्वन्यादिपदवाच्या नातिसूक्ष्मा परावन्नातिस्थूला वैखरीवदतो मध्यमाख्या मातृका
मध्यमावयवरूपमविकृत-शून्यस्पर्शनादध्वनिबिन्दुशक्तिबीजाक्षराख्यं नादनवकं मूला-
धारादिषट्के नादे नादान्ते ब्रह्मरन्ध्रे च स्थितम् । नवभिर्नादैरकचटतपयशळाख्यवर्ग-
नवकवती वैखर्याख्या मातृका जाता, वै निश्चयेन स्पष्टतरत्वात् खं कर्णविवरवर्तिन-
भोरूपश्रोत्रेन्द्रियं राति गच्छति, तज्जन्यज्ञानविषयो भवतीति व्युत्पत्तेरित्याद्यन्यतो
विस्तरः । एवं च ककारादौ कत्वादिधर्मणां षड्जत्वादिध्वनिधर्माणां चानुभूयमान-
त्वात् परिणामे परिणामिनो ऽनुस्यूतताया मृद्धटे दर्शनाच्च वर्णेषु नादोऽनुस्यूतः । तन्तु-
विशेषजन्यः पटविशेषो वर्णकपद्वाच्यः । तत्र कप्रत्यय-परित्यागेन प्रयोगस्त्वक्षर-
वाचकवर्णपदेन श्लेषार्थः । गुण इव वर्णकाख्यपटविशेषोपादानभूततन्तुविशेषवन्माला-
मण्याधारसूत्रवच्चेत्यर्थः । वर्णमध्यगत इत्यस्य द्वयोर्वर्णयोर्मध्यभागे वर्णशरीरान्तर्भागे च
स्थित इत्यर्थः । अयं भावः—द्वयोर्वर्णयोर्मध्यभागे मणिद्वयमध्यभागस्थशुद्धसूत्रवच्छुद्ध-
नादस्य भानम्, वर्ण-शरीरान्तर्भागे तु पटाभेदेन संवलिततन्तुवद्धटान्तर्मृद्वच्च तत्तद्वर्णा-
भेदेनैव नादस्य भानम्, न पुनस्तत्र मण्यन्तर्गतसूत्रदृष्टान्तः, तस्य मणितोऽत्यन्तभिन्न-
त्वादिति ॥ २१- ॥
मध्येफालं फालस्य मध्ये । 'पारे मध्ये षष्ठ्या वा' इति समासः । कान्त्या,
आकृत्या चान्वर्थः; अर्धचन्द्रवत्कान्तिराकारश्चेत्यर्थः । अण्डस्थानीयौ द्वौ बिन्दू सिरा-
स्थानीया मध्यरेखा चेति त्रयं संहृत्य नादस्याकारः, 'बिन्दुद्वयान्तरे दण्डः शेवरूपो
मणिप्रभः' इति चक्रसङ्केतोक्तेः । शेवो मुष्कद्वयमध्यवर्तिनी नाडी, मणिः पद्मराग इति तु
सांप्रदायिकी व्याख्या । दण्डस्य शेवरूपत्वविशेषणं घनतादार्ढ्योर्निरासाय, केशतुल्य-
पिष्टविकारेषु पायसोपयुक्तेषु शेवपदप्रयोगादित्यपि व्याख्या नातीव विरुद्धा । ऊर्ध्वगं
दक्षिणारं लाङ्गलम्, वामभागे बिन्दुरेक इति नादान्ताकारः । विसर्जनीयवदूर्ध्वाधो
बिन्दुद्वयमिति भ्रमनिरासायाह—तिर्यगिति । वामाद्वामभागस्थबिन्दुमारभ्योर्ध्वं गच्छन्ती
निःसरन्ती या सिरा रेखा तदाकारेत्यर्थः । 'शक्तिर्वामस्थबिन्दूत्थसिराकारा' इति चक्र-
सङ्केते । आर्षत्वात् समस्तस्यापि बिन्दुपदस्य पूर्वपदेन सह बहुव्रीह्यवयवत्वेन, उत्तरपदेन
सह पञ्चमीतत्पुरुषावयवत्वेनापि काकाक्ष्यन्यायेनान्वय इति सांप्रदायिकैर्व्याख्यानात् ।
उद्यत्पदस्य सामान्यवाचकस्यापि बिन्दुद्वयादिति विशेषे लक्षणायां वामस्थादिबिन्दोरुद्यत्याः
सिराया आकारो यस्या इत्येव विगृह्य बिन्दोर्वामस्थत्वविशेषणबलादेव दक्षिणदिग्भागे
निःसिराक एको बिन्दुरस्तीति गम्यत इति व्याख्यायां वा न कोऽपि क्लेशः । बिन्दु-
संस्पृष्टाग्रकत्रिकोणाकारा व्यापिका । 'बिन्दुद्वयान्तरालस्थऋजुरेखामयी पुनः । समना'

प्रथमोऽंशः १४९
इति वचने शक्तिवद्बिन्दुद्वयं तिर्यग्रूपं मा भूदित्यतः संप्रदायमनुसरन्नाह—ऊर्ध्वाध इति ।
संयुता अग्रमूलभागयोः संश्लिष्टा, न त्वस्पृशन्ती स्थिता । इयं च ब्रह्मरन्ध्रसंस्थाना ।
इयमेव च मनोन्मनीत्यपि व्यवह्रियते । मनसो यथास्थितरूपस्यैवाभ्यासविशेषेणै-
तावत्पर्यन्तवृत्त्युद्गमः सुसाध इत्यतः समनेत्युच्यते । एतदुपरि तु रूपान्तरं प्राप्तस्यैव
मनसो धृतिविषयतेत्यत उत्क्रान्तमनस्कत्वादुन्मना । प्रकृतानुपयुक्तमप्युन्मनोपरिस्थानं
चक्रराजस्य त्रिविधभावनान्तर्गतनिष्कलभावनायामुपयुक्तत्वेन प्रसङ्गादाह—तदूर्ध्वं महा-
बिन्दुरिति ॥ शक्त्यादीनामिति । समनान्तानां तिसृणामिति संप्रदायः । 'शक्त्यादीनां
तिसृणां द्वादशरवितुल्य कान्तयस्तनवः' इति पाठो युक्तः । बिन्दादिस्वरूपाङ्गविस्तरः
स्वच्छन्दसंग्रहे द्रष्टव्यः ॥ २२-२६ ॥
स्थानं कण्ठाद्युत्पत्तिस्थानं मूलाधारादि स्थितिस्थानं च । यत्नादान्तरबाह्ययत्न-
पूर्वकम् । इदं च मानसजपातिरिक्तविषयम् । तत्र तत्तत्स्थानयत्नविभावनमात्रस्योपयोग
इति द्रष्टव्यम् । नादो बिन्दादिनवकम् । पूर्वपूर्वकूटस्थनादस्योत्तरोत्तरकूटोच्चारणे-
नैवोच्चरितप्रायत्वान्न तत्र पार्थक्येन यत्नः कालविलम्बो वा कार्य इत्यर्थः । तृतीयकूटे
तूत्तरकूटाभावात्तदुभयमपेक्षितमित्याह—बिन्दादिकेति ॥ २७-३० ॥

  • सरोजिनी *
    'बिन्दु'—क्रियाशक्ति का दूसरा नाम ही 'बिन्दु' है । ज्योतिस्वरूप बिन्दु ही
    ईश्वर तत्त्व की अधिष्ठान भूमि है । बिन्दु ही शुद्धाशुद्ध अध्वा का उपादान है ।
    बिन्दु से समना तक मात्रांश को जोड़ दिया जाय तो मात्र एक मात्रा होती
    है । उसी से 'बिन्दु' अर्धमात्रा एवं 'नाद' १।१६ मात्रा है । प्रणव के अवयवों की
    दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो अ-उ-म-बिन्दु-अर्धचन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-
    शक्ति-व्यापिनी-समना-उन्मना—ये प्रणव के अवयव हैं जिनमें 'बिन्दु' एवं 'नाद'
    दोनों हैं । इनकी मात्रायें निम्न हैं—बिन्दु १।२ मात्रा, अर्धचन्द्र—१।४ मात्रा,
    निरोधिनी—१।८ मात्रा, नाद—१।१६ मात्रा, नादान्त—१।३२ मात्रा, शक्ति १।६४
    मात्रा, व्यापिनी १।१२८ मात्रा, समना—१।१२८ मात्रा । सबका योग = १ मात्रा ।
    'बिन्दु' का स्वरूप—'बिन्दु' वह अवस्था है जिसमें एक मात्रा का अर्धांश
    है । बिन्दु रूप ज्योति में समग्र विश्व अभिन्न रूप से भासमान होता है । यह प्रणव
    का चतुर्थावयव है । समस्त आगमों का प्रधान लक्ष्य 'बिन्दु' ही है । यह समस्त
    जगत् का आधार भी है । भ्रूमध्य के किंचित् ऊर्ध्वदेश में 'बिन्दु' अवस्थित है ।
    'Introduction To Tantraśāstra' में जान बुडरफ कहते हैं कि 'बिन्दु' शिव के
    नाद की प्रकृति एवं शक्ति का बीज है अतः इसे 'नाद' एवं 'बीज' का या
    शिव-शक्ति के अन्तर्संबंध का द्योतक कहा गया है—'Bindu is the nature of
    Nāda of Śiva and Bīja of Śakti and has been said to be the relation of
    these to be those who are viewed in all the Āagmas.'
    आचार्य भास्कर 'सौभाग्यभास्कर' (ललिता स०भाष्य) में कहते हैं कि जगद्गुरु
    ही कन्दरूप होने के कारण 'बिन्दु' कहलाता है—"प्रलये सृज्यमान प्राणिकर्मणाम्

१५० वरिवस्यारहस्ये
परिपाकद्शायाम् तादृशकर्माभिन्न मायावच्छिन्नं ब्रह्म घनीभूतमित्युच्यते । स एव
जगदंकुरु कन्दरूपत्वाद्बिन्दुपदेन व्यवहियते ॥''
आचार्य शङ्कर प्रपञ्चसार में कहते हैं कि सिसृक्षु एवं विचिकीर्षु परमात्मा की
घनीभूता चितशक्ति ही 'बिन्दु' बन जाती है—
'विचिकीर्षुर्घनीभूता सा चिदभ्येति बिन्दुताम् ।'
सृष्टि का प्रथम चरण तो बिन्दु है किन्तु द्वितीय चरण का आरंभ करने हेतु
शक्ति 'बिन्दु' से पृथक होकर नाद को जन्म देती है । यह 'बिन्दु' की शब्दात्मिका
वृत्ति है जिसके 'परा', 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' एवं वैखरी, चार रूप हैं । दूसरी दृष्टि
से विचार करने से प्रथम 'नाद' आता है और उसके बाद 'बिन्दु'—'आसीच्छक्ति-
स्ततो नादः, नादाद्बिन्दु समुद्भवः ॥'१ चक्र की दृष्टि से विचार करें तो श्रीचक्र
का नवमावरण ही 'बिन्दुचक्र' है । इसी का नाम है—'सर्वानन्दमय चक्र' बिन्दु ही
सर्वातिशायी है । निर्गुण, निराकार, निरञ्जन ब्रह्म जो परमशिव या परा श्रीसुन्दरी हैं
उनका जगन्निर्माण की दिशा में उठाया गया प्रथम कदम 'बिन्दु' ही है । परम तत्त्व
में 'एकोऽहं बहुस्याम' रूप सिसृक्षा के उदय होते ही 'बिन्दु' का प्रादुर्भाव हो जाता
है । 'बिन्दु' ही है कामेश्वर एवं कामेश्वरी के स्वारसिक सामरस्य का स्वरूप । यही
सर्वोच्च सत्ता है और इसी के अन्तर में समस्त विश्व बीजात्मना अन्तर्गर्भित है ।
यह विश्वोत्तीर्ण है । यह अनुत्तर शक्तिसम्पन्न एवं समस्त रचना-शक्तियों का स्वगृह
है । इसी घनीभूत तेज के पुञ्ज को ही 'चिद्घन' या 'परासंवित्' भी कहते हैं ।
इसी की द्वितीया आख्या है—
'अनुस्वार' जो कि समस्त वाङ्मय को जन्म देता है । महामन्त्र रूप मातृका
का जप भी बिन्दु से युक्त करते ही किया जाता है । 'अहं' के 'अकार' (शिव)
एवं 'हकार' (शक्ति) की एकात्मता का सम्पादक भी यही 'बिन्दु' है ।
तन्त्र-दर्शन में 'बिन्दु' की वही स्थिति है जो वेदान्त में ईश्वर की है ।२ जिस
प्रकार 'नाद' शक्ति का एक रूप है उसी प्रकार 'बिन्दु' भी शक्ति का ही एक रूप
है ।३ शक्ति के इन दोनों स्वरूपों (नाद एवं बिन्दु) में क्रिया-शक्ति निहित है । जो
कि सृष्टि-विकास में सहायक हैं ।४ राघवभट्ट ने 'शारदातिलक' की टीका में कहा है
कि 'नाद' एवं 'बिन्दु' शक्ति की वे अवस्थायें हैं जो सृष्टि को जन्म देने के लिए
समुत्सुक रहती हैं । 'बिन्दु' घनावस्था है । 'प्रपञ्चसार' में कहा गया है कि जब
शक्ति में सिसृक्षा उत्पन्न होती है तब शक्ति घनीभूत हो जाती है और उससे सृष्टि
का विकास उसी प्रकार होता है यथा दूध के घनीभूत होने पर दही, मक्खन, मट्ठा
आदि का जन्म होता है ।
———————————————————————
१. वाक्यपदीय (भर्तृहरि)
२. आर्थर ऍवेलान—दि गारलैण्ड ऑफ लेटर्स, पृ० १११, ११६, १२२
३-४. तत्रैव (पृ० १२४, १२५)

प्रथमोंऽशः १५१
'तोडल तन्त्र' में कहा गया है कि बिन्दु में शून्यता एवं गुण दोनों की एक
साथ प्रतिष्ठा पाई जाती है ।१ तन्त्र में बिन्दु की स्थिति वही है जिस प्रकार पुराणों
के मत में महाविष्णु की है ।२ तन्त्र मत में बिन्दु सत्यलोक की विभूति है और
मानव पिण्ड में यह सहस्रार में स्थित है । इसमें शिव एवं शक्ति अपनी मायाशक्ति
से उसी प्रकार आवृत्त रहते हैं यथा चने के छिलके में उसके दोनों दल आवृत्त
रहते हैं ।३
तांत्रिक मतानुसार 'परबिन्दु' सृष्टि-विकास का मूल कारण है । सृष्टि इसी का
परिणाम है ।४ 'परबिन्दु' के दो भाग हैं—(१) दक्षिण भाग = पुरुषरूप = 'ह'
(२) वामभाग = नारीरूप = 'सा'—दोनों मिलकर 'हंस' बन गए । हंस = पुरुष
एवं प्रकृति संयोगावस्था है ।५ अन्य तन्त्रों के अनुसार 'परबिन्दु' काल के द्वारा
तीन भागों में विभाजित कर दिया जाता है जो निम्न हैं—(१) 'बिन्दु' (२) 'नाद'
(३) 'बीज' । 'शारदा तिलक' के मतानुसार 'हंस' एक प्रकार का वह सम्बंध है
जिसे 'नाद' कहा जाता है । 'बीज' में बिन्दु एवं नाद दोनों रहते हैं । इस प्रकार
एक ही 'परा बिन्दु' (क) नाद एवं (ख) बीज—में विभाजित हो जाता है ।६
'शारदातिलक' में इसी बात को इस प्रकार व्यक्त किया गया है—
'बिन्दुःशिवात्मको बीजशक्तिर्नादः तयोर्मिथः ।
सर्वागम विशारदैः समवायः समाख्यातः ॥'७
अर्थात् आगमिक बिन्दु को शिव एवं बीज को शक्ति एवं नाद को उन दोनों
का समवाय स्वीकार करते हैं । 'परबिन्दु' में बीज एवं बिन्दु (शक्ति एवं शिव)
समवाय सम्बंध से रहते हैं । यह समवाय सम्बन्ध ही 'नाद' है । इसीलिए बहुत से
आचार्य नादाविर्भाव मानते हैं । बीज बिन्दु एवं नाद की समन्वितावस्था ही 'त्रिबिन्दु'
है । इसे ही अन्य तांत्रिकों ने 'कामकला' का अभिधान दिया है । 'कामकला'—
मातृकाओं का उदय—स्थूल वर्ण—वर्णों से मन्त्र । इस प्रकार नाद से मन्त्रों का
अविनाभाव सम्बंध है । 'त्रिबिन्दु' = सूर्य-चन्द्र-अग्नि । इच्छा-ज्ञान-क्रिया । सत्-रज-
तम—इन त्रिकों की समष्टि ही त्रिबिन्दु है । परबिन्दु—त्रिबिन्दु । त्रिबिन्दु (१) श्वेत
बिन्दु (२) रक्त बिन्दु (३) मिश्र बिन्दु ॥ आर्थर एवेलॉन कहते हैं कि—'परबिन्दु'
शिव एवं शक्ति की अविभाजितावस्था है । विस्फोट होने पर इसके तीन भाग हो
जाते हैं—(१) 'बिन्दु' (२) 'बीज' (३) 'नाद' । 'नाद', 'बिन्दु' एवं 'बीज' तीनों
क्षोभावस्था के परिणाम हैं । क्षोभ-प्रक्रिया में बिन्दु एवं बीज में से एक क्षोभक एवं
एक क्षोभ्य है ।
१. कालीचरण : षट्चक्र निरूपण की टीका
२. तत्रैव
३. दि गारलैण्ड ऑफ लेटर्स, पृ० १२६
४. तत्रैव (१२८) ५. प्रपञ्चसार तन्त्र
६. गा० आ० ले० (पृ० १२९) ७. शारदातिलक

१५२ वरिवस्यारहस्ये
‘बिन्दु’ की चार शब्दात्मिका शक्तियाँ हैं । इन वृत्तियों के भेद से ही जीवों में
ज्ञान का भेद रहता है । इसका अतिक्रम करके ही साधक शिवत्व प्राप्त करता है ।
बिन्दु की शब्दात्मिका वृत्तियाँ निम्न हैं—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४)
वैखरी । कुछ लोग पश्यन्ती को ही ‘अक्षर बिन्दु’ कहते हैं । अधिकांशः तांत्रिक
आचार्य ‘परावाक्’ से ही इच्छा-ज्ञान-क्रिया के रूप में स्थित त्रिबिन्दु का उद्भव
मानते हैं । त्रिबिन्दु से ही ५ पञ्चाशत मातृकाओं का उद्भव होता है । इनमें स्वर
वर्णों में ‘बीज’ (शिवांश) स्थित है तो व्यञ्जनों में (योनि शक्त्यांश) स्थित हैं ।
सारा विश्व इसी वर्णमाला से आबद्ध है ।
सृष्टि के मूल में ‘बिन्दु’ अवस्थित है । परमशिव के स्वातंत्र्य के कारण
स्पन्दन जब इस बिन्दु का स्पर्श करता है तो यह बिन्दु रेखारूप में परिणत हो
जाता है । इन तीन रेखाओं के संयोग से जो त्रिकोण उत्पन्न होता है वही सृष्टि
का मूल योनिरूप है जो इस प्रकार है—
त्रिकोण का केन्द्र ‘बिन्दु’ है ∇
‘नाद’ का स्वरूप—शिव और शक्ति का प्रथम विकास ‘नाद’ के रूप में ही
माना गया है ।¹ सर आर्थर एवलॉन कहते हैं "From the union of Śiva and
Śakti arrises creative ideation This union and mutual relalion is
called"—‘नाद’ अर्थात् शिव एवं शक्ति के संयोग से जो सृष्टि की कल्पना की
गई है उसमें शिव-शक्ति का संयोग एवं उन दोनों का पारस्परिक सम्बंध ‘नाद’
कहलाता है । जब शिव और शक्ति स्थिर शक्ति से क्रियात्मक रूप में रूपान्तरित
होने लगते हैं तभी नाद का उदय होता है । उनमें विकास की चेतना जाग्रत होती
है इसीलिए नाद क्रियारूप माना जाता है । इसी नाद से विश्व का विकास होता
है । शिव-शक्ति में नादोद्भव तब होता है जब उसमें विकास की चेतना जागती है ।
तात्विक धरातल पर जिसे ‘सदाख्यतत्त्व’ कहते हैं मन्त्रक्षेम में उसे ही ‘नाद’ कहा
जाता है ।² जिस प्रकार शिव-शक्ति से ‘सदाख्यतत्त्व विकसित होता है उसी प्रकार
क्रियाशक्ति रूप पर नाद (ब्रह्म) से ‘नाद’ विकसित होता है । ‘प्रयोगसार’ में कहा
गया है कि—‘‘हे देवि ! अंतरात्मा नाद के रूप में प्रस्फुटित होती है वही वायु
(जीवों में प्राणवायु) से पैरित होकर अक्षरों का रूप धारण करती है ।’’
तन्त्र शास्त्र के मन्त्र पक्ष में ‘नाद’ एवं ‘बिन्दु’ अहं एवं इदं के प्रतीक के
रूप में प्रयुक्त हुए हैं ।³ कतिपय तन्त्रग्रन्थों में ‘नाद’ को विराट शक्ति के रूप में

१. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (डी०एन० बोस) पृ० ११९
२. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११२, ११४)
३. आर्थर एवेलॉन ‘सर्पेण्ट पावर’ (पृ० ३४)

प्रथमोऽंशः १५३
स्वीकार करके उसे सृष्टि-विकास का केन्द्र माना गया है ।¹ कतिपय तन्त्रों के
अनुसार सच्चिदानन्द सगुण परमात्मा शिव से शक्ति का एवं शक्ति से नाद-बिन्दु
की उत्पत्ति हुई है । इसी बिन्दु से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है ।² अन्य
द्वैतवादी तांत्रिकों के मतानुसार 'शिव' एवं 'शक्ति' नामक दो तत्त्व हैं । शिव शक्ति
में प्रवेश करता है और बाद में बिन्दु का रूप धारण कर लेता है । बिन्दु का
प्रथम विकास 'नाद' के रूप में होता है और फिर सृष्टि का विकास होता है ।³
कुछ भेदवादी तांत्रिक शिव एवं शक्ति को समवाय सम्बन्ध से संयुक्त एक तत्त्व
तथा बिन्दु का दूसरा तत्त्व मानते हैं ।⁴ बौद्धतन्त्रों में 'बिन्दु' ज्ञान के प्रतीक एवं
हठयोगिक ज्योति के रूप में कल्पित किया गया है ।⁵ शैव तन्त्रों में 'नाद' 'बिन्दु'
को शिव-शक्ति के परिकल्पित स्वीकार किए गए हैं । बौद्ध तांत्रिकों ने इन्हें प्रज्ञा
एवं उपाय का वाचक भी माना है । तांत्रिक एवं हठयौगिक ग्रन्थों में (क) 'बिन्दु'
को—रसना, सूर्य, रवि, प्राण, शमन, काली, यमुना, रज, पुरुष, नाद एवं व्यञ्जन
(ख) 'नाद' को—ललना, चन्द्रा, शशि, अपान, घमन, अली, गङ्गा, शुक्रा, तमस्
अभाव, प्रकृति, ग्राहक एवं स्वर के रूप में गृहीत किया गया है ।⁶
'कौलज्ञाननिर्णय' में एक स्थल पर बिन्दु को महालिङ्ग की शक्ति एवं दूसरे
स्थल पर उसे शिव की सृजन-शक्ति कहा गया है । इसमें बिन्दु से ही नादोत्पत्ति
बताई गई है । योग उपनिषदों में 'बिन्दु' मन⁷ वायु⁸ बुद्धि⁹ एवं महेश्वर¹⁰ के अर्थ
में स्वीकार किया गया है ।
'शारदातिलक' के अनुसार—शब्दब्रह्मरूपिणी कुण्डलिनी से शक्ति, शक्ति से
ध्वनि, ध्वनि से नाद, नाद से निरोधिका, निरोधिका से अर्द्धेन्दु, अर्द्धेन्दु से बिन्दु
की उत्पत्ति होती है । 'शक्ति' = शुद्ध सत्त्व में प्रविष्ट चित्, रजोनुबिद्ध एवं सत्व
प्रविष्ट चित् शक्ति = 'ध्वनि' तमोनुविद्ध चित् शक्ति = 'नाद' । तमसप्राचुर्याचित्
शक्ति = निरोधिका । सत्वप्राचार्या चित् शक्ति = 'अर्द्धेन्दु' । सत्व + तमस से
विशिष्ट होने पर वही चित् शक्ति 'बिन्दु' कहलाती है । बिन्दु का स्थान सहस्रार
है । बिन्दु ही शब्दब्रह्म है । मन्त्र में नाद एवं बिन्दु दोनों प्रतिष्ठित हैं । इनमें
'नाद' नीचे एवं 'बिन्दु' ऊपर स्थित होता है । 'नाद' रूपा कुण्डलिनी मूलाधार में
(नीचे) एवं 'बिन्दु' रूपी शब्द ब्रह्म (ऊपर) सहस्रार में रहते हैं । ये ही दोनों शक्ति
एवं शिव हैं और इनका सम्मिलत कराना ही तान्त्रिकों का लक्ष्य है ।
नाद के कई स्वरूप हैं यथा—
(क) 'महानाद' या नादान्त = शब्दब्रह्म का प्रथम क्रियात्मक विकास
१-२. तन्त्राज़ देयर फिलॉसफी एण्ड औकल्ट सीक्रेट्स (पृ० १०७)
३. कलेक्टेड वर्क्स आफ आर० जी० भण्डारकर, पृ० २१९
४. गोपीनाथ कविराज—'तान्त्रिक दृष्टि' ५-६. इन्ट्रोडक्शन टू तान्त्रिक बुद्धिज्म
७. योगकुण्डल्योपनिषद ८. योगशिखोपनिषद
९-१०. ध्यानबिन्दूपनिषद

१५४ वरिवस्यारहस्ये
(ख) 'नाद' = नादान्त की पूर्वावस्था । जो विश्व को नादान्त से भरे हुए हैं ।
'निरोधिनी'—नाद की वह अवस्था निरोधिनी है जिसमें बिन्दु का विकसित
करने की क्षमता निहित हो ।१ नाद की अत्यन्त सूक्ष्म अवस्थायें हैं उनमें 'निष्कल
उन्मनी' अन्यतम हैं । 'उन्मनी' निराकार निरुच्चार, निरूप एवं विशेषणशून्य वह
अव्यक्तवस्था है जो अवाङ्मनसगोचरा है । यह अनुत्पन्न निष्पन्द वाक् है । यह
कारणरूपा शक्ति की अवस्था है । इस अवस्था में काल, कला एवं देवता आदि
का भान नहीं होता ॥ “उन्मनी is Nirākār and Niruchchār (निराकार, निरुच्चार)
roundless and without ulternate defind by any adjective, being for
beyound mind and speech and universe"२ यह निर्वाणपद है एवं निर्विकल्प
निरञ्जन शिवशक्ति है ।३
बिन्दु से नादाविर्भाव—कतिपय तांत्रिकों का कथन है कि बिन्दु से भी नादों
का उदय होता है जो निम्न है—(१) 'सूक्ष्मनाद'—बिन्दु का प्रथम स्तर, अचिन्त्य
तत्त्व एवं अभिधेय बुद्धि का कारण है । (२) 'अक्षरनाद'—यह परामर्श ज्ञान
समन्वित एवं सूक्ष्मनाद का कार्य है । (३) 'वर्णनाद'—यह आकाश एवं वायु से
उत्पन्न होता है । कुण्डलिनी को भी 'नाद' कहा गया है ।४
तांत्रिकों के अनुसार 'नाद' से बिन्दु का उद्भव होता है । 'नाद' एवं 'बिन्दु'
ये दोनों शक्ति के रूप हैं । शक्ति के इन दोनों रूपों में क्रिया शक्ति स्थित है ।५
'अहं' द्रष्टा है और 'इदम्' दृश्य है । द्रष्टा की दृश्यरूपी शून्य पर दृष्टि
पड़ने पर उस शून्य से एक अव्यक्त नाद ध्वनि झंकृत होती है जिसे 'आदिनाद' या
'परनाद' कहते हैं । नाद की स्फूर्ति के साथ ही ज्योति का भी विकास होता है ।
नाद एवं ज्योति दोनों एक ही महासत्य की दो अवस्थायें हैं । शक्ति की क्रियावस्था
ही नाद है और निष्क्रिय अवस्था 'कला' है । 'शक्ति' स्वरूपनिष्ठ क्रिया द्वारा
कार्योंन्मुख होकर 'नाद' के रूप में आत्मप्रकाश करती है । 'नाद' घनीभूत होकर
साम्यावस्था में 'परमविन्दु' के रूप में प्रकाशित होता है । पर बिन्दु जब महानाद
में से अपर बिन्दु में अवतीर्ण होता है तब बिन्दु जब बीज का स्पर्श करता है तब
सारे बीज बिन्दुयुक्त होकर गुञ्जन करते रहते हैं—यही 'नाद' है । मानव-हृदय में
अस्फुटभाव से जो चिन्ताएँ क्रीड़ा करती हैं वह नाद की ही क्रीड़ा है । किसी
वृत्तिरूप में अन्तःकरण का जो परिणाम होता है वह 'नाद' से व्याप्त होता है ।
महानाद पर 'प्रणव' है । शक्ति की बहिर्मुख अवस्था ही नाद एवं ज्योति है ।
'बिन्दु' ही क्षुब्ध होकर नादरूप में परिणत होता है । 'नाद' वायु के सङ्घर्ष के
कारण वर्णमाला रूप में प्रकाशित होता है । 'पादुकापञ्चक' में कहा गया है कि—
'पराशक्ति' ही बिन्दु है और उसका रूपान्तरण है—बिन्दु, नाद एवं 'बीज'
'बिन्दु'—रक्तवर्ण है और सूर्य है । 'नाद'—श्वेतवर्ण है और चन्द्रमा है । ये दोनों
ही मिलकर आनन्दमय कोश का निर्माण करते हैं 'कारणबिन्दु' जब प्रस्फुटित होता
१-५. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११४-१३०)

प्रथमोऽंशः १५५
है सृजनार्थ तीन भागों में विभक्त हो जाता है जो निम्न है—१. ‘बिन्दु’ २. ‘नाद’
३. ‘बीज’। वाचकों की महासमष्टिरूप से एकीभूत स्थिति का नाम नाद है।
(१) मूलाधार से समुत्थित ‘नाद’ वर्णों के मध्य सञ्चरण करता हुआ माला के
सूत की भूमिका का निर्वाह करता है। जिस प्रकार मनकों की पृथकता को एकता
में रूपान्तरित करने वाला सूत्र मनकों के मध्य रहता है उसी प्रकार प्रत्येक वर्ण की
विभिन्नता को नाद एकता में रूपान्तरित करके उन सभी को आपस में एकसूत्रता
में पिरो देता है। ‘बिन्दु’ मस्तक के मध्य वृत्ताकाररूप में दीपक की भाँति
प्रकाशित रहता है ॥ २२ ॥
(२) उसके ऊपर ‘अर्धचन्द्र’ स्थित है। वह आकृति एवं कान्ति दोनों दृष्टियों
से अर्धचन्द्रमा की भाँति है।
(३) इसके ऊपर त्रिभुज के आकार की ‘रोधनी’ शक्ति विद्यमान है। यह
चाँदनी के सौन्दर्य से मण्डित है ॥ २३ ॥
भास्कर कहते हैं—वट बीज के अन्तर्गत वटवृक्षीय सूक्ष्मरूप के तुल्य
शब्दसृष्टि सूक्ष्मरूपशालिनी पूर्वोक्तरूपा त्रिपुरसुन्दरी ही तादृशसूक्ष्मरूपवत् प्रवृत्ति-निमित्त
क परा पद वाच्या है। वही त्रिपुरसुन्दरी—‘माति तरति कायतीति च व्युत्पत्या
मातृकेति’—मातृका है। उसके भीतर निर्विकार होने पर भी अनादिसिद्ध अदृष्ट के
कारण स्वान्तः संहृतविश्व की सिसृक्षा उत्पन्न होती है। अतः वह स्रष्टव्य पदार्थों का
आलोचन करती है—‘तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय’ तादृश ईक्षरम ही प्रवृत्ति का निमित्त
बनकर ‘पश्यन्ती’ बन जाता है। वही पश्यन्ती मातृकाकरण को उत्तीर्ण करने
कारण ‘उत्तीर्णा’ कही जाती है। उसके अवयव हैं—वामादिक अष्ट शक्तियाँ; अतः
वही व्यष्टि समष्टिवेष से नवविध हैं। उनसे अविकृत शून्यादिक नाद उत्पन्न होते
हैं। उनकी समष्टि ही नादध्वनि आदि कहलाती है। ‘मध्यमा मातृका’—
मध्यमावयवरूप अविकृत शून्य स्पर्श नाद ध्वनि बिन्दु शक्ति बीजाक्षर नाम वाला
नाद नवक मूलाधार आदि ६ चक्रों में नाद, नादान्त एवं ब्रह्मरंध्र में स्थित है। ९
नादों द्वारा अ-क-च-ट-त-प-य-श-ल नाम वाले ९ वर्गों वाली वैखरी मातृका उत्पन्न
होती है। वर्णों में नाद अनुस्यूत है—‘‘वर्णेषु नादो अनुस्यूतः ।।’’ दोनों वर्णों के
मध्यभाग में मणिद्वय मध्यभाग में स्थित शुद्धसूत्र की भाँति शुद्ध नाद का मान है।
वर्णशरीर के अन्तर्भाग में पराभेद द्वारा संवालित तन्तुबद्ध परान्तभूद्वत उन उन वर्णों
के साथ अभेद के द्वारा ही नाद का मान है किन्तु यहाँ मण्यन्तर्गत सूत्र दृष्टान्त
उचित नहीं है क्योंकि सूत्र तो मणि से पृथक् रहता है किन्तु इस प्रसङ्ग में तो
मणि से सूत्र के अभिन्नत्व की प्रतीतिवत नाद के स्वरूप का वर्णन किया गया है।
अर्द्धचन्द्र—बिन्दु से सहस्रार में उठने के मार्ग में कपाल में जो सोमरस
दृष्टिगत होता है वही ‘अर्द्धचन्द्र’ है। इसके भीतर त्रिविधात्मक वर्णमाला (सौम्य,
सौर, आग्नेय) चिद् बीज में सहस्रार के दलों में प्रकाश पाता है। स्थान की दृष्टि
से बिन्दु के अनन्तर अर्धचन्द्र है। अर्थात् यह द्वितीय भूमि है और इसकी मात्रा
१।४ है यदि बिन्दु पूर्णचन्द्र या चन्द्रबिन्दु है तो अर्धचन्द्र उसका अर्धांश है। यह

१५६ वरिवस्यारहस्ये
बिन्दु के ऊपर स्थित है । इसके चतुर्दिक चार एवं मध्य में एक अर्थात् सब
मिलाकर पाँच कलाएँ स्थित हैं । अर्धचन्द्र में जो कि ललाट में स्थित है ज्ञेय
प्रधानभाव नहीं है । यह शून्य भी नहीं है । यह आकार में अर्धचन्द्र के समान एवं
प्रकाश में चन्द्रमा के समान है—
'तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या तथा कृत्या ।' (वरि०र०)
यद्यपि बिन्दु ही वास्तविक अर्धमात्रा है किन्तु बिन्दु के पश्चात् प्रत्येक परवर्ती
मन्त्रावयव में उसके पूर्ववर्ती की अर्धमात्रा (अर्धांश) निहित है । जैसे बिन्दु में एक
मात्रा का अर्धांश है तो अर्धचन्द्र में बिन्दु का अर्धांश है, निरोधिका में अर्धचन्द्र
का अर्धांश है, नाद में निरोधिका का, नादान्त में नाद का, शक्ति में नादान्त का,
व्यापिनी में शक्ति का, समना में व्यापिनी का अर्धांश निहित है । 'अर्धचन्द्र' में
काल की स्थिति है किन्तु इसकी मात्रा ६४ लवों की है—'चन्द्रे तद्द्विगुणा लवाः ।'
जब सृष्टिकारक 'शिवामृत' मूर्धा में गिरता है तब वह अवस्था 'अर्धचन्द्र' कहलाती है—
'यदा शिवामृतं मूर्ध्नि पतति सृष्टिकारणम् ।
आप्यायस्तु भवेत्तेन सोऽर्धचन्द्र इति स्मृतः ॥'१
यह समस्त भूतों की सृष्टि एवं संहार का भी कारक है—“संहारः सर्वभूतानां
सृष्टिः कारणमेव च ॥”२
अर्धचन्द्र की कलायें निम्नांकित हैं—ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा
विमला शिवाः 'ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा । अर्धचन्द्रकला
ह्येताः सर्वज्ञपद संस्थिताः ।। विद्यावरणसंबद्धा मन्त्रकोटि विभूषिताः । क्रिया
शक्तिस्वरूपास्तु संस्थिता विमला शुभः ॥'३
यहाँ नादात्मक शिव का सदाशिव सम्बन्धी, स्फुट इदन्ताभासात्मक
सृष्टिवीर्यरूपात्मक पीयूष का उन्मेष होता है ।
'अर्द्धचन्द्र' दीपक के समान प्रभास्वर है । इसका अवस्थान ललाट में ही
बिन्दु के किंचित् ऊर्ध्वदेश में है । इसका उच्चारणकाल मात्रा का चतुर्थभाग है ।
बिन्दु के ऊपर 'अर्धचन्द्र' दीप्ति एवं आकृति में अन्वर्थक (आकृति एवं कान्ति
दोनों ही दृष्टियों से अर्द्धचन्द्र के समान) है ।
“तदुपरि गतोऽर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या तथाकृत्या ।"४
'अर्द्धचन्द्र' की कलायें निम्नांकित हैं—
ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा ।
अर्द्धचन्द्रकला ह्येताः सर्वज्ञ पदसंस्थिता ॥५
१-५. दी गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (पृ० ११४-१३०)
१-३. नेत्रतन्त्र ४. वरिवस्यारहस्यम्
५. नेत्रतन्त्र

प्रथमोऽंशः १५७
दीपिकाकार अर्धमात्रा की व्याख्या करते हुए कहते हैं—अर्धमात्रः ह्रस्वस्य
उच्चारण कालो मात्रेत्युच्यते । मात्राया अर्ध मुच्चारणकालो यस्य सोऽर्धमात्रः ।।”
अर्थात् ह्रस्व वर्ण का उच्चारण काल मात्रा कहलाता है । इस मात्रा का अर्द्धांश
‘अर्धमात्रा’ है ।
आचार्य भास्करराय ‘सेतुबंध’ में अर्धमात्रा की व्याख्या करते हुए कहते है —
‘अर्धमात्रा यस्य सोऽर्धमात्रः । मात्रा नाम ह्रस्वस्योच्चारण कालः स च षट्पञ्चाशदुत्तर
शतद्वयलवैर्भवति । लवो नाम काल परमाणुः नलिनीपत्रसंहत्याः सूक्ष्मसूच्यभिभेदने ।
दले दले तु यः कालः स कालो लव संज्ञितः ॥’
‘अर्द्धचन्द्र’ की निम्न कलायें हैं—(१) ज्योत्स्ना (२) ज्योत्स्नावती (३) सुप्रभा
(४) विमला (५) शिवा ॥
मन की मात्रा जितनी ही प्रसृत होती है उतना ही मन का अंश क्षुद्रतर होता
है और उतना ही चिदालोक उज्ज्वलतर होता है अर्द्धमात्रादि में जो प्रतिफलित
चैतन्य है वही ‘मन्त्र’ है । एक मात्रा ही अर्द्धमात्रा में परिणत हो जाती है । स्थूल
विश्व अनुभूति मन की जिस मात्रा से होती है उसे एक मात्रा कहते हैं । जगत् की
अनुभूति का आरंभ इसी एक मात्रा में होता है । मात्रा का अधिक्य जड़ता के
अधिक्य का कारण है । साधक का कर्तव्य है कि वह मन को एकाग्र करे (केन्द्र
में स्थापित करे) अर्थात् एक मात्रा में अवस्थित करे । सामान्यतः मन एक मात्रा में
नही रहता । विक्षिप्त एवं क्षिप्त अवस्था में मात्राओं की बहुलता रहता है ।
‘बिन्दु’ मात्रा से मात्राहीन की ओर जाने का द्वार है । इस स्थान में ज्ञाता—
ज्ञेय-ज्ञान एकाकार हो जाते हैं । मात्रा-भङ्ग के फलस्वरूप अर्द्धमात्रा का उदय होता
है । बिन्दु से सहस्रार में उठने के मार्ग में कपाल प्रदेश में जो सोम दृष्टिगत होता
है वही ‘अर्द्धचन्द्र’ है ।
‘अर्धचन्द्र’ एवं ‘रोधिनी’ आदि में पूर्व ध्वनि की आधी-आधी मात्रा समझना
चाहिए । ‘रोधिनी’ = अर्द्धचन्द्र का १/२; ‘नाद’—‘रोधिनी’ का १/२; इसी प्रकार
परवर्ती ध्वनि अपने-अपने पूर्ववर्ती ध्वनि का १/२ भाग होती है । काल परमाणु
ही ‘लव’ है । २५६ लव = १ मात्रा । बिन्दु का उच्चारणकाल १२८ लव है ।
अर्द्धचन्द्र का उच्चारण काल ६४ लव है । इसी प्रकार ‘रोधिनी’ का ३२; ‘नाद’
का १६; ‘नादान्त’ का ०८; ‘शक्ति’ का ४, ‘व्यापिका’ का ०२ एवं ‘समना’ का
उच्चारण काल १ लव है ।
‘उन्मना कालहीन है । ‘उन्मना’ में क्षण से परार्द्धान्तकाल, निवृत्ति से लेकर
शान्त्यतीतादि कलायें, प्राणाचार, भुवन एवं देवों की गति नहीं है । ‘उन्मना’ =
‘गुरुवक्त्र’ है एवं परमशिव की प्राप्ति का द्वार है । इससे आगे अनामय पर तत्व
मात्र शेष है—
‘यावत्सा समना शक्तिः तदूर्ध्वं चोन्मना स्मृता ।
नात्र कालः कलाक्षारो न तत्त्वो न च देवताः ॥ १२७६ ॥

१५८ वरिवस्यारहस्ये
सुनिर्वाणं परं शुद्धं गुरुवक्त्रं तदुच्यते ।
तदतीतं वरारोहे परं तत्त्व मनामयम् ॥ १२७७ ॥१
'योगिनीहदय' का मत—इसके अनुसार उन्मनी भी कालात्मक है—शक्त्यादीनां
तु मात्राशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ।२
'स्वच्छन्दतन्त्र' का मत—उन्मनी में काल नहीं है—नात्र कालः कलाश्चारो न
तत्त्वो न च देवताः ॥३
निरोधिका—अर्धचन्द्र के बाद तृतीय भूमि के रूप में 'निरोधिका' आती है ।
इसकी मात्रा १/८ है । समग्र विश्व के प्रशासक ब्रह्मादिक पञ्च कारणों की भी
ऊर्ध्वगति को अग्रपद होने से रोकने वाली भूमि का नाम ही रोधिनी या निरोधिका
है । यह भी बिन्द्रावरण की शेष प्रान्तभूमि है । इस भूमि का अतिक्रमण कर लेने
पर विश्व प्रशासन का कार्य संभव नहीं रह जाता । यह योगिमात्रैक लंघ्य दुर्लंघ्य
भूमि है । कपाल के ऊर्ध्व में (ब्रह्मरंध्र के नीचे त्रिकोण के मध्य) 'रोधिनी' स्थित
है । इसका अभिधान 'रोधिनी' इसलिए है क्योंकि यह ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-ईश्वर-सदाशिव
नामक कारण पञ्चक को उनकी ऊर्ध्व गति से रोके हुए है । रोधिनी तक ही
'बिन्द्रावरण' है । यह भी शून्य है । इस भूमि में दिशा एवं काल की पृथकता
दृष्टिगत नहीं होती । यहाँ निम्नाभिमुखी मन एवं प्राण की भी अनुभूति नहीं होती ।
'रोधिनी' में काल विद्यमान है किन्तु इसकी मात्रा ३२ लव है—'द्वात्रिंशदेव
रोधिन्यां' । अध्वगत ध्वनि जहाँ विश्राम करने लगती है, जो सर्वदेवनिरोधिका है, जो
ब्रह्मादिक, सुराधियों की गति को भी निरुद्ध कर देती है वही निरोधिकाख्यामांत्री
कला है—
'ध्वनिरध्वगतो यत्र विश्राम्यत्यनिरोधतः ।
निरोधिनीति विख्याता सर्वदेव निरोधिका ॥ ६४ ॥
निरोधयति या देवान्ब्रह्मादींश्च सुराधिपे ।४
निरोधिकेति साख्याता.......................॥
निरोधिका की कलायें निम्नांकित हैं—रुन्धनी, रोधनी, रौद्री, ज्ञानबोधा,
तमोपहा । (रुंधनी रोधनी रौद्री ज्ञानबोधा तमोपहा । निरोधिका कला ह्येताः सर्वदेव-
निरोधिकाः ।। नेत्रतन्त्र) । यहाँ अनाहतनादात्मा सदाशिव विश्राम ग्रहण करते हैं ।
'निरोधिका' या 'निरोधिनी' त्रिकोणाकार है और चन्द्रिकावत प्रभास्वर है । इसका
उच्चारण-काल मात्रा का अष्टम भाग है ।
अर्धचन्द्र के अनन्तर त्रिभुज के आकार की 'रोधिनी' है—जो कि चन्द्रिका की
कान्ति से समन्वित है । "अथ रोधिनी तदूर्ध्वं त्रिकोणरूपा च चन्द्रिका कान्तिः ।"५
कपाल के ऊर्ध्व में (ब्रह्मरन्ध्र) के नीचे त्रिकोण के मध्य 'रोधिनी' स्थित है ।
१. स्वच्छन्दतन्त्र (१० पटल) २. योगिनीहृदय
३. स्वच्छन्दतन्त्र ४. नेत्रतन्त्र
५. वरिवस्यारहस्यम्

प्रथमोऽंशः १५९
निरोधिका की कलायें निम्न हैं—
रुन्धनी रोधनी रौद्री ज्ञानबोधा तमोपहा ।
निरोधका कला, ह्येताः सर्व देव निरोधिकाः ॥
'ब्रह्मादिपरमेशानां पर प्राप्ति निरोधनात् ।
‘निरोधिनीतिसा प्रोक्ता'—निरोधिनी का यही अर्थ है । १. रुन्धनी २. रोधनी
३. रौद्री ४. ज्ञानबोधा ५. तमोपहा—यही हैं निरोधिका की कलाएँ ॥ २२ ॥
‘व्यापिनी' के विषय में 'नेत्रतन्त्र' में कहा गया है—सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च
ह्यमृतामृतसंभवाः ॥ ४२ ॥ व्यापिनी चैव विख्याता शक्तितत्व समाश्रिताः । अलुप्त
शक्ति संबंधच्चिच्छक्तिसधिष्ठिताः ॥ ४३ ॥ शक्तितत्त्वे स्थिता ह्येताश्चिन्मात्रा डिप-
लक्षिताः । व्यापिनी व्योमरूपा च ह्यनन्तानाथ संज्ञिता । अनाश्रिता महेशानि
व्यापिकान्यास्तु कलाः स्मृताः ॥”
'समनाशक्ति'—सर्वज्ञा सर्वगा दुर्गा सवना स्पृहणा धृतिः। समना चेति विख्याता
एताः शिवकलाः स्मृताः । इच्छाशक्तिसमधिष्ठाय इच्छा सिद्धि प्रदायिकाः ॥ ४६ ॥
शिवतत्त्व समाश्रित्य सुसम्पूर्णार्णवप्रभाः । अनन्तशक्ति संस्थानाः सूक्ष्माश्चात्यन्त-
निर्मलाः ॥ समनान्तं वरारोहे पाश जालमनेन्तकम् । वट्कारणा पदाक्रान्तं स्थूलसूक्ष्म
प्रभेदतः ॥ शक्त्यादि समनान्तं हि सूक्ष्मविज्ञान गोचरम् । तदूर्ध्वं तु परं शान्तम-
प्रमेयमनामयम् ॥ ४९ ॥
समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् (स्व० ४।४२९) मस्तक में इन्दु है
उसके ऊपर है बोधिनी और उसके ऊपर है 'नाद' और उसके ऊपर है 'महानाद'
उसके ऊपर है 'कला' (आञ्जी) और उसके ऊपर है 'उन्मनी' । 'अर्धमात्रा' =
बोधिनी ॥ 'बिन्दु' बोधिनी और नाद—बिन्दुमयी परा प्रकृति के पृथक् पृथक् पक्ष
हैं । 'भूतशुद्धितन्त्र' में 'बोधिनी' के नीचे 'बिन्दु' माना गया है ।
कुण्डलिनी एवं नाद—वर्ण रूप १०० कुण्डलों को धारण करने से =
'कुण्डलिनी'—ॐकार—५२ मातृकायें—(१) ५० अक्षरमय (२) ५१वीं मातृका
प्रकाशरूपा (३) ५२वीं मातृका—प्रकाश—प्रवाह : १७ वीं ५० मातृकायें जीवन
कला = लोम + विलोम से १००/१०० मातृकायें = १०० कुण्डल
(१) 'चतुष्पदी नाद'—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४) वैखरी —
पाद 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । तानि विदुर्ब्राह्मणे ये मनीषिणः ॥'
(२) 'पञ्चपदी नाद'—नाद—(१) सूक्ष्मा (२) परा (३) पश्यन्ती (४)
मध्यमा (५) वैखरी ।² आचार्यपद्मपाद
(३) 'सप्तपदी नाद'—(१) शून्य (२) संवित् (३) सूक्ष्मा (४) परा (५)
पश्यन्ती (६) मध्यमा (७) वैखरी—आचार्य पद्मपाद ।


१. सम्मोहनतन्त्र २. प्रपञ्चसारतन्त्र विवरण-पद्मपादाचार्य

१६० वरिवस्यारहस्ये
आदिनाद = आदि मन्त्र
"ॐ" शब्दब्रह्म परावाक्
[चित्र विवरण:]
ॐ
नाद
↓
बिन्दु
↓
जगत्
कुण्डलिनी का फूत्कार
कुण्डलिनी — [सर्पाकार वलय]
कुण्डलिनी के ३ वलय — स्वयंभू लिङ्ग
मूलाधार चक्र त्रिकोण
[दाहिनी ओर प्रवाह:]
प्राणापान का आघात
↓
कुण्डलिनी का जागरण
↓
फूत्कार
महाबिन्दु का विस्फोट | सप्तपदी नाद | सहस्रारचक्र में
↓ | ↓ | (अव्यक्त नाद)
मूलाधार चक्र में = परावाक् | शून्य | ↓
नाभि से नीचे | ↓ | आज्ञा चक्र में
↓ | संवित् | (ॐ)
| ↓ | ↓
नाभि = पश्यन्ती वाक् | सूक्ष्मा | ५२ मातृकाएँ
↓ | ↓ |
हृदय = मध्यमा वाक् | परा |
↓ | ↓ |
कण्ठ = वैखरी वाक् | पश्यन्ती |
↓ | ↓ |
जिह्वादि उच्चारण स्थान = वर्णमाला | मध्यमा |
| ↓ |
| वैखरी |
वाक्
↓
┌───────────────────────┴───────────────────────┐
निस्पन्द वाक् सस्पन्द वाक्
↓ ↓
परा वाक् ┌───────────────┴───────────────┐
मध्यमा वाक् वैखरी वाक्

प्रथमोऽंशः १६१
(१) बिन्दोस्तस्माद्भिद्यमाना द्रवोऽव्यक्तात्मको भवेत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः
'शब्दब्रह्मेति । कथ्यते ॥
(२) मूलाधारात् प्रथममुदितो यस्तु भावः पराख्यः ।
पश्चात् पश्यन्त्यथ हृदयगो बुद्धियुङ्मध्यमाख्यः ॥
वक्त्रे वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तोः सुषुम्ना ।
बद्धस्तस्माद् भवति पवन प्रेरितो वर्ण संङ्घः ॥ ४३ ॥¹
(१) 'शून्य' = अनुत्पन्न, निस्पन्द (२) 'संवित' = वागुत्पित्सु (३) 'सूक्ष्मा'
= उत्पत्यवस्था (४) परा मूलाधार से प्रथम उदित (५) 'पश्यन्ती'—नाभिस्थिता
(६) 'मध्यमा' = हृदयस्थिता (७) वैखरी = कण्ठस्थिता ॥ अभिनव गुप्त पादाचार्य
ने नादादिक का सूक्ष्म वर्णन किया है । 'तन्त्रालोक' में उनका स्वरूप इस प्रकार
निरूपित किया गया है ।
अर्धचन्द्र की कलायें—ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावली, कान्ति, प्रभा एवं विमला =
(५ कलायें) ॥²
बिन्दूर्द्धेऽर्धेन्दु रेतस्य कला ज्योत्स्ना च तद्गता ।
कान्तिः प्रभा च विमला पञ्चैता रोधिकास्ततः ॥ २८।३८३ ॥³
रोधिका (रेखिनी/रोधिनी) की कलायें⁵—रुन्धिनी । रोधनी । रोदध्री ।
ज्ञानबोधा । तमोपहा = ५कलायें ॥ ये ५ कलायें निरोधिका के आवरण की हैं ।⁴
अर्धचन्द्र की अष्टमांश निरोधिका शक्ति होती है ! निरोधिनी शक्ति ब्रह्मा आदि
कारण तत्त्वों को भी आगे बढ़ने से रोक देती है । इसी कारण इसे 'निरोधनी'
कहते हैं । रुन्धनी रोधनी रोदेध्री ज्ञानबोधा तमोपहा एताः पञ्चकलाः प्राहुर्निरोधिन्यां
गुरुत्तमाः ॥ ३८४ ॥⁶
इसके बाद सादाख्य परम भुवन का परिवेश आता है । सादाख्यपरा सदाशिव
देव मन्त्र शरीर है । निरोधिका के ऊपर 'नाद' का आवरण आता है । 'बिन्दु'
अर्धमात्र एवं चतुष्कल होता है उसका आधा 'अर्धचन्द्र' होता है—'अर्धमात्रःस्मृतो
बिन्दुर्व्योमरूपी चतुष्कलः ।' अर्धचन्द्र का अष्टमांश 'निरोधिका शक्ति' होती है ।
'तदर्धमर्धचन्द्रस्तदष्टांशेन निरोधिका'⁷ ॥ ३८५ ॥
निरोधिका आवरण के ऊपर नाद का आवरण है । 'नाद' किञ्जल्क परागवत
रमणीय है । मन्त्रमहेश्वर सदृश सूर्यप्रभ पुरुषों से यह भुवन भरा हुआ है ।
'इन्धिका । दीपिका । रोचिका । मोचिका एवं ऊर्ध्वगा'—ये पाँच नायिकायें वहाँ सदा
सक्रिय रहती हैं ⁸—'नादः किञ्जल्कसदृशो महद्भिः पुरुषैर्वृतः । चत्वारि भुवनान्यत्र
१. शङ्कराचार्य—'प्रपञ्चसारतन्त्र'
२. हेतुन्ब्रह्मादिकान् रुन्द्धे रोधिकां तां त्यजेत्ततः ।
निरोधिकामिमां भित्वा सादाख्यं भुवनं परम् ॥ ३८६ ॥ (तन्त्रालोक)
३-८. तन्त्रालोक
११ वरि.

१६२ वरिवस्यारहस्ये
दिक्षु मध्ये च पञ्चमम् ॥ ३८८ ॥ इन्धिका दीपिका चैव रोधिका मोचिकोर्ध्वगा ।
मध्येऽत्र पदं तत्रोर्ध्वगामी तच्छक्तिभिर्वृतः ॥१' इनमें चार तो चारों दिशाओं को
प्रकाशित करती है किन्तु 'ऊर्ध्वगा' मध्य में राजित रहती है ।२
ऊर्ध्वगामी, विकसित, सौषुम्न अरबिन्द कोश में स्थित नाद इन शक्तियों से
आवृत्त रहते हैं । ये इड़ा-पिङ्गला से संवलित हैं । नाद के ऊर्ध्वभाग में ऊर्ध्वगा
शक्तिधाम में ही ऊर्ध्वगेश नादान्त देव शाश्वत रूप में स्थित है ।२
नाद एवं नादान्त के ऊपर सौषुम्न भुवन का आवरण है । सुषुम्णा शशिप्रभा
महादेवी है । इसके स्वामी सुषुम्नेश अनिशसुषुम्ना विहार करते हैं ।३ सुषुम्नेश
इड़ा-पिङ्गला से घिरे हैं । सुषुम्नेश के अङ्क में देवी सुषुम्ना स्थित है । यही शक्ति
नाद की आश्रय शक्ति है । 'नादः सुषुम्नाधारस्तु भित्वा विश्वमयं जगत्'—नाद
सुषुम्ना में दो काम करता है—प्रथम—अधः शक्ति के द्वारा मूलाधार से उद्गत
होता है ।४ फिर ऊर्ध्वरूपा प्राणात्मिका शक्ति का आश्रय लेकर ऊपर उठता है ।
ऊर्ध्वगामिनी शक्ति में ऊर्ध्वगेश स्थित हैं सारा विश्व-शरीर नाद शक्ति की अधः ऊर्ध्व
शक्तियों से व्याप्त है ।
नाड्या ब्रह्मविले लीनः सोऽव्यक्त ध्वनिरक्षरः ।
नदन्सर्वेषु भूतेषु शिवशक्त्या ह्यधिष्ठितः ॥
नाड्याधारस्तु नादो वै भित्वा सर्वमिदं जगत् । अधः शक्त्या विनिर्गत्य
यावद्ब्राह्मणमूर्द्धतः । नाड्या ब्रह्मबिले लीनस्त्व व्यक्तध्वनिरक्षरः । नदते सर्वभूतेषु
शिवशक्त्या त्वधिष्ठितः ॥ (स्व० १०।१२३३)
इनकी पराशक्ति ब्रह्माणी है जो कि मोक्षद्वार को अवरुद्ध करके स्थित है ।
किन्तु वह मोक्षदा भी है । इस आवरण का भेदन करके शक्ति व्यापिनी धाम समना
में प्रवेश करती है ।५
समना के ऊर्ध्व में कुण्डली भूमि है । वह सुषुप्ता सर्पिणी की भाँति कुण्डली
मारकर बैठी है । इसी शक्तितत्त्व में—सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, एवं अमिता नामक
चार देवियाँ चारों दिशाओं में एवं व्यापिनी मध्योर्ध्व में स्थित है । व्यापिनी के
स्वामी व्यापिनीश भी यहीं स्थित हैं । 'तस्यां सूक्ष्मा सुसूक्ष्मा च तथान्ये अमृतासिते ।
मध्यतो व्यापिनी तस्यां व्याजीशो व्यापिनीधरः ॥' 'सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च तथा चैवा-
मृतामिता । व्यापिनी मध्यतो ज्ञेया शेषाः पूर्वांदितः क्रमात् ॥' (स्व० १०।१२९०)६
शक्तितत्त्व में—(१) सूक्ष्मा (२) सुसूक्ष्मा (३) अमृता (४) अमिता—ये चार
देवियाँ चार दिशाओं में एवं 'व्यापिनी' मध्योर्ध्व में स्थित हैं । वही व्यापिनी के
स्वामी व्यापिनीश भी स्थित है ।७
'व्यापिनी' का अवस्थान शक्तितत्त्व में है । शक्ति अनाश्रित भुवन के रूप में
भी स्वीकृत है । शक्ति का आश्रय लेकर शिवत्व भी विश्वोल्लास में संलग्न है ।
१-७. तन्त्रालोक

प्रथमोऽंशः १६३
व्यापी, व्योमात्मक, अनन्त एवं अनाथ—ये चार दिग्देव हैं । ऊर्ध्व दिग्देव अनाश्रित
है । इसी नाम से वहाँ देवाधिदेव भी स्थित हैं । अनाश्रित प्रभु अनन्त कोटि सूर्यों
के प्रकाश से भासमान है और अपनी अङ्कशोभिता अनाश्रिता शक्ति से सुशोभित है
अनाश्रित, शक्तितत्त्व में स्थित है शिव में नहीं । ब्रह्मबिल—शक्ति—व्यापिनी—
समना—उन्मना—का क्रम है ।१
अनाश्रित शिवतत्त्व से ऊर्ध्व आवरण 'समना' नामक पराशक्ति का भुवन है—
शिवतत्त्वोर्ध्वतः शक्तिः परा सा समनाह्वया ।
सर्वेषां कारणानां सा कर्तृभूता व्यवस्थिता ॥ ४०० ॥
विभर्त्यण्डान्यनेकानि शिवेन समधिष्ठता ।
तदारूढः शिवः कृत्य पञ्चकं कुरुते प्रभुः ॥ ४०१ ॥
(१) यह समस्त कारणों की कारणरूपा भूमि है ।२
(२) यह शिवाधिष्ठिता क्रियारूपा पराशक्ति अनन्त अण्डकराओं को धारण
करती है और उनका पोषण करती है ।३
(३) समना में अधिष्ठित । शिव पञ्चकृत्य (सृष्टि। स्थिति। संहार तिरोधान।
अनुग्रह) का सम्पादन करते है । इन्हें ही ३६ तत्त्वमय विभु शिव कहते हैं ।
पञ्चकृत्य करने का आधार यह है कि प्रमाता और कर्ता शिव की सृष्टि क्रिया में
'समना' ही कारणरूपा है—समना करणं तस्य हेतुकर्तुर्महेशितुः ।१ परमात्मा शिव
पहले स्वातन्त्र्यवश शून्यात्मकता को अवभासित करता है और परिणामत अनाश्रित
शिव हो जाता है ये उसी शिवेच्छा से पञ्चकृत्य का सम्पादन करते हैं—
'अतश्चानाश्रितादस्तदिच्छयैन सृष्ट्यादि करोति—अनाश्रित भूमिका स्थित शिव 'अनाथ'
भूमिका का निर्वाह करते हैं । 'अनाश्रित' अनाथ को पैरित करते हैं एवं
'अनाथ'—'अनंतेश' को पैरित करते हैं । अनन्तेश व्योमविग्रह व्योमात्मा शिव को
व्योमव्यापी, व्यापी शिव को पैरित करते हैं ।४ व्यापिनी ही इनकी करण शक्ति है ।
माया इनकी कर्मरूपा शक्ति है । उसी के अधिकार में विश्वगर्भा कुण्डलिनी स्थित
है । नाद, निरोधिनी, अर्धचन्द्र एवं बिन्दु आदि इसी के कार्य हैं । अनाश्रित,
अनाथ अनन्त, व्योमात्मा एवं व्यापी—ये ही पञ्चकारण हैं । ये क्रमशः बिलग्रन्थि,
नादोर्ध्वत, सुषुम्ना, बिन्दु एवं शक्ति के स्वामी है । अनाश्रित, ब्रह्मा, अनाथ विष्णु,
अनन्त रुद्र, व्योम भट्टारक ईश्वर, व्यापी-सदाशिव रूप है ५ ॥ २४-२७ ॥
'नाद'—'शारदातिलक' में कहा गया है कि 'पर बिन्दु' जो कि पराशक्ति से
समन्वित है अपने को तीन भागों में विभाजित करता है जो निम्न है—(१) बिन्दु
(२) नाद (३) बीज । 'बिन्दु' शिवरूप 'बीज' शक्तिरूप एवं 'नाद' शिवशक्तिरूप
है—शिव-शक्ति दोनों की प्रकृति से युक्त है—शिवशक्ति का पारस्परिक सम्बंध या
दोनों का 'मिथःसमवायः' है । 'नाद'—शिव एवं शक्ति के पारस्परिक सम्बंध का
१-५. तन्त्रालोक